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महान सिदुवा-बिदुवा और खैंट पर्वत की परियाँ

बहुत समय पहले तिब्बत में सोनपाल नाम का एक राजा राज करता था. उसकी सात बेटियाँ थीं, जिनमें सबसे बड़ी थी जोत्रामाला. उसकी सुंदरता ऐसी थी जैसे पूर्णिमा का चाँद धरती पर उतर आया हो. जोत्रामाला हर दिन देवी गंगा की आराधना करती और एक ही वर माँगती, “हे देवी, मुझे ऐसा वर मिले जो मुझ जैसा सुंदर और दिव्य हो.”
(Siduwa-Biduwa story in hindi)

गंगा देवी प्रसन्न हुईं और वर दिया कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उसके पति बनेंगे. दूसरी ओर,  द्वारका में श्रीकृष्ण ने भी एक रात स्वप्न में जोत्रामाला को देखा, और उसी क्षण उन पर उसका जादू चल गया. उन्होंने अपने भाई सुरजू, जो विमलकोट नामक स्थान पर रहता था, को एक पत्र भेजा लेकिन यह कोई साधारण संदेश नहीं था. कृष्ण ने काले भौंरों को दूत बनाकर भेजा. भौंरे उड़ते-उड़ते विमलकोट पहुँचे, सुरजू के कंधे पर बैठे और पत्र उसकी गोद में गिरा दिया.

पत्र पढ़कर सुरजू ने अपनी माँ को बताया. माँ ने कहा, “बेटा, तिब्बत जादू-टोने की भूमि है, वहाँ से कोई लौटकर नहीं आता, मत जा.” लेकिन सुरजू दृढ़ था, “मैं अपने बड़े भाई की आज्ञा नहीं टाल सकता.” यात्रा शुरू हुई, पर रास्ते में कई अशुभ संकेत मिले, कपड़े धोया पानी काले की जगह लाल हो गया, उसकी बकरी ने जोर से छींक मारी, और उसके सिर के बाल झड़ने लगे. फिर भी सुरजू रुका नहीं, घोड़े पर सवार होकर उत्तर की ओर निकल पड़ा.

कैलाश पर्वत के पास उसे एक सात जादूगरनियों का घर दिखा. उन्होंने बड़े आतिथ्य से उसे भोजन कराया और जैसे ही वह सोया, जादूगरनी ने जादुई डोरी से उसे नापा और उसे एक चित्तीदार मेढ़े (नर भेड़) में बदल दिया. उसी रात सुरजू की पत्नी बिजोरा जो खुद एक शक्तिशाली तांत्रिक थी, ने यह दृश्य स्वप्न में देखा.

वह तुरन्त पुरुष का वेश धरकर, जादुई औज़ारों के साथ, घोड़े पर सवार होकर कैलाश पहुँची. वहाँ उसने अपने घोड़े को मधुमक्खी बना दिया और एक पेड़ पर बैठकर बाँसुरी बजाने लगी. उसकी बाँसुरी की धुन सुनकर सारी जादूगरनियाँ सम्मोहित हो गईं.
(Siduwa-Biduwa story in hindi)

बिजोरा ने उन्हें वश में कर लिया और उनसे सुरजू को छुड़ा लिया , फिर उसे मनाया कि अब घर लौट चलो. लेकिन सुरजू ने कहा , “मुझे द्वारका जाना होगा, यह मेरे प्रभु का आदेश था.”

द्वारका पहुँचकर श्रीकृष्ण ने उसका आदरपूर्वक स्वागत किया और उसे आदेश दिया कि वह फिर से तिब्बत जाकर जोत्रामाला को द्वारका लाए. सुरजू ने सहमति दी, पर कहा , “मेरे साथ रामोलगढ़ के सिदुवा को भेजिए, बिना उसके यह यात्रा असंभव है.” कृष्ण ने फिर भौंरों के ज़रिए सिदुवा को बुलाया.

सिदुवा और उसका भाई बिदुवा दो महान योद्धा थे, वो शेर की खाल ओढ़ते, नौ मन का कंबल पहनते, और सात मुखों वाली शंख फूँकते थे. सिदुवा तुरन्त तैयार हुआ और जादुई शक्ति से द्वारका पहुँच गया. वहां सुरजू की माँ ने बेटे को जाते देखा तो फिर रो पड़ी. सुरजू ने कहा, “मैं यहां पर दूध, तलवार और फूलमाला रखकर जा रहा हूँ, यदि मैं मर जाऊँ, तो तुम्हें संकेत मिल जाएगा, दूध खून बन जाएगा, तलवार नीचे गिर जाएगी, और फूल मुरझा जाएँगे.”

यात्रा शुरू हुई. वे सौदानखाल तक पहुँचे, जहाँ से अपने देश की आख़िरी झलक मिलती थी. फिर आगे रिखनिखाल में रात को जब सब सो गए, तब खैंट पर्वत की परियाँ सुरजू को उठा ले गईं. सिदुवा ने शंख फूँका, जिसकी गूँज से परियाँ लौट आईं और सुरजू को वापस किया, लेकिन सुरजू का आधा सौंदर्य खो गया था. फिर उन्हें ऐसा राज्य मिला जहां सभी के पास सिर्फ एक पाँव था, उन्होंने उनको भी हराया. फिर आगे पीपलधार पहुँचे, जहाँ सिदुवा ने बाँसुरी बजाई और जिससे परियां आ गई, उसने परियों को जाल में पकड़ा और कहा , “सुरजू को पूरा सुंदर बनाओ!” परियां मान गईं, शर्त यह थी कि लौटते वक्त सुरजू उनसे भी विवाह करेगा, और उसने वचन दिया.
(Siduwa-Biduwa story in hindi)

आख़िरकार वे तिब्बत पहुँचे , जहाँ बिखवत संक्रांति के मेले में जोत्रामाला हमेशा आती थी. मेला शुरू हुआ, सिदुवा मज़ाक में बीमार होने का बहाना कर सो गया. तभी जोत्रामाला पालकी में आई, जो चाँद जैसी सुंदर. सुरजू ने आगे बढ़कर श्रीकृष्ण का संदेश दिया. जोत्रामाला ने उसे अपने महल बुलाया, और वहाँ उसका स्वागत किया. पर जोत्रामाला की छह बहनों को यह रिश्ता पसंद नहीं आया. उन्होंने ईर्ष्या में सुरजू को भोजन में ज़हर दे दिया और उसके शरीर को नमक से भरे तहखाने में दफ़ना दिया. उसी समय द्वारका में, दूध खून में बदल गया, तलवार गिर पड़ी और फूल मुरझा गए.

कृष्ण समझ गए, “मेरा दूत सुरजू अब नहीं रहा.” उन्होंने सिदुवा के भाई बिदुवा को बुलाया और कहा, “जा, अपने जादू से सुरजू को पुनः जीवित कर ला.” बिदुवा साधु का वेश धरकर निकला, मार्ग में अनेक संकट झेले, और कैलाश पहुँचा जहाँ सिदुवा अब भी नींद में था. उसे जगाया, डाँटा और कहा,  “तेरे साथी की मृत्यु हो गई है!”

दोनों तिब्बत पहुँचे. उन्होंने राजा सोनपाल की बेटियों को पकड़ लिया और धमकाया कि “हमें सुरजू का शव दिखाओ.” डरी हुई राजकुमारियों ने तहखाना दिखाया. सिदुवा और बिदुवा ने अपने जादुई मंत्रों से सुरजू को पुनर्जीवित कर दिया. फिर उन्होंने उन छह बहनों और राजा सोनपाल को मार दिया और उसके पुत्र अजयपाल को तिब्बत का नया राजा बनाया. जोत्रामाला को वे द्वारका ले गए, जहाँ उसका विवाह श्रीकृष्ण से हुआ.

सिदुवा भी अपने वचन के अनुसार खैंट पर्वत की सात परियों को साथ लाया और उनका भी विवाह करवाया. कहा जाता है, आज भी तिब्बत की हवाओं में जोत्रामाला का नाम गूंजता है और हर पूर्णिमा की रात कोई न कोई बाँसुरी बजती है. शायद ये वही सुरजू है, जो अब भी अपने वचन निभा रहा है.
(Siduwa-Biduwa story in hindi)

अंग्रेजी भाषा में छपी इस लोककथा का हिन्दी अनुवाद काफल ट्री फाउंडेशन के लिये मंजुल पन्त ने किया है. यह कथा ई. शर्मन ओकले और तारादत्त गैरोला की 1935 में छपी किताब ‘हिमालयन फोकलोर’ के आधार पर है. इस पुस्तक में इन लोक कथाओं को अलग-अलग खण्डों में बांटा गया है. प्रारम्भिक खंड में ऐतिहासिक नायकों की कथाएँ हैं जबकि दूसरा खंड उपदेश-कथाओं का है. तीसरे और चौथे खण्डों में क्रमशः पशुओं व पक्षियों की कहानियां हैं जबकि अंतिम खण्डों में भूत-प्रेत कथाएँ हैं.

-काफल ट्री फाउंडेशन

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