भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में यदि किसी हिमालयी समुदाय का उल्लेख सबसे प्राचीन स्रोतों से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर मिलता है, तो उनमें खस (Khasa) प्रमुख हैं. महाभारत, विभिन्न पुराणों, बृहत्संहिता, राजतरंगिणी, तिब्बती अभिलेखों, नेपाली इतिहास तथा मध्यकालीन भारतीय स्रोतों में खसों का उल्लेख विभिन्न संदर्भों में मिलता है. वर्तमान समय में उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, नेपाल तथा कश्मीर के अनेक समुदाय अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खस परंपरा से जुड़े माने जाते हैं. यही कारण है कि खस समुदाय की उत्पत्ति, विस्तार और ऐतिहासिक विकास लंबे समय से इतिहासकारों, भाषाविदों और मानवशास्त्रियों के लिए आकर्षण का विषय रहा है.
किन्तु एक प्रश्न आज भी पूरी तरह हल नहीं हो पाया है, खसों की उत्पत्ति कहाँ हुई?
इस प्रश्न के अनेक उत्तर प्रस्तुत किए गए हैं. कुछ विद्वानों का मत है कि खस हिमालय के अत्यंत प्राचीन निवासी थे. कुछ उन्हें उत्तर-पश्चिम से आए इंडो-आर्य भाषी समूहों से जोड़ते हैं. कुछ इतिहासकारों ने उन्हें मध्य हिमालय में विकसित एक मिश्रित सामाजिक समुदाय माना है, जबकि कुछ शोधकर्ता यह मानते हैं कि “खस” मूलतः एक सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान थी, जो समय के साथ विस्तृत होती गई.
इन सभी मतों का आधार अलग-अलग प्रकार के प्रमाण रहे हैं, जैसे: प्राचीन साहित्य, अभिलेख, भाषाई अध्ययन, लोक परंपराएँ और पुरातात्विक साक्ष्य. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से इस विषय में एक नया स्रोत जुड़ा, मानव आनुवंशिकी (Human Genetics). डीएनए आधारित अध्ययनों ने वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर दिया कि विभिन्न समुदायों के बीच जैविक संबंध क्या हैं, उनके पूर्वजों का आनुवंशिक योगदान किन प्राचीन मानव समूहों से आया है, और हजारों वर्षों में विभिन्न आबादियों के बीच किस प्रकार का आनुवंशिक मिश्रण (Genetic Admixture) हुआ.
यहीं से एक नई समस्या भी उत्पन्न हुई है. इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रसार के साथ अनेक लोगों ने आनुवंशिक अध्ययनों के निष्कर्षों को अधूरा पढ़कर व्यापक दावे करने शुरू कर दिए हैं. कहीं यह दावा किया जाता है कि खस “शुद्ध आर्य” थे, कहीं उन्हें पूर्णतः “स्थानीय हिमालयी” सिद्ध करने का प्रयास होता है, तो कहीं किसी एक हैप्लोग्रुप (Haplogroup) को पूरे समुदाय का प्रतिनिधि घोषित कर दिया जाता है. इनमें से अधिकांश दावे आधुनिक आनुवंशिकी की कार्यप्रणाली के अनुरूप नहीं हैं. दुर्भाग्य से इसी तरह के आँकड़ों का सहारा लेकर दुनिया भर में कई बार “वैज्ञानिक नस्लवाद” जैसी विचारधाराओं को भी बढ़ावा दिया गया है, जो इन अध्ययनों का घोर दुरुपयोग है.
वास्तव में, आधुनिक मानव आनुवंशिकी किसी समुदाय की जातीय, भाषाई या सांस्कृतिक पहचान निर्धारित नहीं करती. वह केवल यह अध्ययन करती है कि किसी समुदाय के पूर्वजों का जैविक इतिहास किन प्राचीन आबादियों से जुड़ा है. किसी समुदाय की भाषा, संस्कृति, धर्म, सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक इतिहास उसके डीएनए से स्वतंत्र रूप से भी विकसित हो सकते हैं. इसलिए आनुवंशिक परिणामों को इतिहास का अंतिम प्रमाण मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है.
दक्षिण एशिया विश्व के सबसे अधिक आनुवंशिक विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है. पिछले दस हजार वर्षों में यहाँ अनेक प्रवास, स्थानीय विकास, कृषि का प्रसार, व्यापारिक संपर्क, साम्राज्यों का विस्तार और विभिन्न समुदायों के बीच अंतर्विवाह हुए. परिणामस्वरूप आज का कोई भी बड़ा समुदाय किसी एक “शुद्ध” प्राचीन जनसमूह का प्रतिनिधित्व नहीं करता. यही सिद्धांत खस समुदाय पर भी लागू होता है.
इस लेख का उद्देश्य किसी विशेष मत का समर्थन करना नहीं है. इसका उद्देश्य केवल यह देखना है कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध वास्तव में क्या कहते हैं. इस समीक्षा में केवल पीयर-रिव्यू (Peer-reviewed) वैज्ञानिक शोधपत्रों, प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं और प्रकाशित आनुवंशिक अध्ययनों का उपयोग किया गया है. प्रत्येक अध्ययन का विश्लेषण निम्न आधारों पर किया गया है —
इसी क्रम में हम यह भी देखेंगे कि अब तक प्रकाशित शोधों में उत्तराखण्ड के पारंपरिक खस समुदायों का कितना प्रतिनिधित्व है, और नेपाल के खस-सम्बद्ध समुदायों पर हुए अध्ययनों को किस सीमा तक व्यापक खस समुदाय पर लागू किया जा सकता है.
आनुवंशिकी के माध्यम से किसी मानव समुदाय का अध्ययन करना एक अत्यंत जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है. सामान्यतः लोग समझते हैं कि वैज्ञानिक किसी व्यक्ति का डीएनए देखकर उसकी पूरी जातीय या ऐतिहासिक पहचान बता सकते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है.
मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में लगभग तीन अरब (3 Billion) डीएनए अक्षर (Base Pairs) होते हैं. इनका अधिकांश भाग सभी मनुष्यों में समान होता है. केवल एक बहुत छोटा भाग ऐसा होता है, जिसमें विभिन्न व्यक्तियों के बीच अंतर पाया जाता है. वैज्ञानिक इन्हीं सूक्ष्म अंतरों का अध्ययन करके विभिन्न समुदायों के आनुवंशिक संबंधों का अनुमान लगाते हैं.
Y-क्रोमोसोम अध्ययन — Y-क्रोमोसोम केवल पुरुषों में पाया जाता है और लगभग अपरिवर्तित रूप से पिता से पुत्र तक पहुँचता है. इसलिए इसका उपयोग पितृवंश (Paternal Lineage) के अध्ययन में किया जाता है. यदि किसी समुदाय के सौ पुरुषों में अधिकांश का संबंध किसी एक हैप्लोग्रुप से मिले, तो इसका अर्थ केवल इतना है कि उनके पितृवंश में किसी समय उस हैप्लोग्रुप का विस्तार हुआ. इसका अर्थ यह नहीं कि वह समुदाय किसी एक जाति, भाषा या ऐतिहासिक समूह का प्रतिनिधि है.
माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mtDNA) — यह केवल माता से संतान में जाता है और मातृवंश (Maternal Lineage) के अध्ययन में उपयोगी होता है. कई बार किसी समुदाय का पितृवंश और मातृवंश अलग-अलग ऐतिहासिक घटनाओं का संकेत देते हैं, इसलिए आधुनिक आनुवंशिकी दोनों का संयुक्त अध्ययन करती है.
ऑटोसोमल डीएनए — यदि किसी समुदाय की समग्र आनुवंशिक संरचना समझनी हो, तो वैज्ञानिक ऑटोसोमल डीएनए का अध्ययन करते हैं, जिसमें माता और पिता दोनों का आनुवंशिक योगदान सम्मिलित होता है. आज अधिकांश बड़े जनसंख्या अध्ययन Whole Genome या Genome-wide SNP विश्लेषण पर आधारित होते हैं.
Genome-wide SNP Analysis — इसमें वैज्ञानिक पूरे जीनोम में लाखों आनुवंशिक बिंदुओं (Single Nucleotide Polymorphisms – SNPs) की तुलना करते हैं, जिससे यह देखा जाता है कि दो आबादियाँ आनुवंशिक रूप से कितनी निकट हैं और उनके पूर्वजों का मिश्रण किन स्रोतों से हुआ होगा. इसी तकनीक से PCA (Principal Component Analysis), ADMIXTURE और qpAdm जैसे सांख्यिकीय मॉडल बनाए जाते हैं, जिनका उपयोग आज अधिकांश बड़े शोधपत्रों में होता है.
खस समुदाय की आनुवंशिक संरचना को समझने के लिए अब तक अनेक अध्ययन हुए हैं, किन्तु इन सभी का उद्देश्य समान नहीं था. कुछ शोध केवल रक्त समूहों की तुलना तक सीमित थे, कुछ ने Y-क्रोमोसोम अथवा माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का अध्ययन किया, जबकि नवीनतम अध्ययनों में पूरे जीनोम (Whole Genome) का विश्लेषण किया गया है. इसलिए प्रत्येक शोधपत्र को उसकी वैज्ञानिक पद्धति और उद्देश्य के संदर्भ में ही समझना उचित है. इन अध्ययनों को मोटे तौर पर चार चरणों में बाँटा जा सकता है.
पहला चरण (1970–1985): रक्त-आधारित आनुवंशिक अध्ययन. यह वह समय था जब आधुनिक डीएनए तकनीकें उपलब्ध नहीं थीं. वैज्ञानिक रक्त समूहों, एंजाइमों तथा अन्य जैव-रासायनिक संकेतकों के आधार पर विभिन्न समुदायों की तुलना करते थे.
दूसरा चरण (1985–2005): Y-क्रोमोसोम और mtDNA अध्ययन. PCR तथा डीएनए विश्लेषण तकनीकों के विकास के बाद वैज्ञानिकों ने पितृवंश और मातृवंश का अध्ययन शुरू किया. इस काल के अधिकांश अध्ययन अपेक्षाकृत छोटे नमूनों पर आधारित थे.
तीसरा चरण (2005–2015): प्रारम्भिक Genome-wide अध्ययन. उच्च घनत्व (High-density) SNP Genotyping तकनीक के विकास ने मानव आनुवंशिकी में क्रांतिकारी परिवर्तन किया. नेपाल के विभिन्न समुदायों को धीरे-धीरे वैश्विक मानव आनुवंशिक डेटासेट में सम्मिलित किया जाने लगा.
चौथा चरण (2016 से वर्तमान): व्यापक हिमालयी जीनोमिक अध्ययन. इस अवधि में बड़े नमूनों पर आधारित Whole Genome अध्ययन प्रकाशित हुए, जिनमें हिमालयी समुदायों की उत्पत्ति, मिश्रण और ऊँचाई के अनुकूलन (High-Altitude Adaptation) का विस्तृत विश्लेषण किया गया.
| वर्ष | अध्ययन | तकनीक | खस-सम्बद्ध समुदाय / नमूना |
| 1979 | Genetic Studies on Some Nepalese Populations (Saglio et al., Journal of Human Evolution) | रक्त समूह (ABO) एवं एंजाइम मार्कर (UMPK, PGD, GLO, LDH) | Chetri, Magar, Gurung, Thakali (काली गंडकी घाटी); Sherpa (सोलु-खुम्बु) |
| 2010 | Toward a More Uniform Sampling of Human Genetic Diversity (Xing et al., Genomics) | High-density SNP Genotyping (~250,000 SNPs) | काठमांडू से 25 नेपाली नमूने, जिनमें केवल 2 Chhetri और 16 Brahman शामिल |
| 2018 | Demographic History and Genetic Adaptation in the Himalayan Region (Arciero, Kraaijenbrink et al., Molecular Biology and Evolution) | Whole-Genome SNP Analysis (500,000+ SNPs, 738 व्यक्ति, 49 आबादियाँ) | Chetri, Damai, Majhi, Sarki, Sonar (5 इंडो-यूरोपीय भाषी नेपाली समुदाय) |
| 2022 | नेपाल की मातृवंशीय आनुवंशिकी पर अध्ययन (Basnet et al., BHU–CCMB–त्रिभुवन विश्वविद्यालय सहयोग, Human Genetics) | Whole mtDNA Analysis (999 व्यक्ति) | Newar, Magar, Sherpa, Brahmin, Tharu, Tamang तथा काठमांडू व पूर्वी नेपाल की आबादियाँ |
पहला, खसों पर सीधे केन्द्रित अध्ययन अपेक्षाकृत कम हैं. अधिकांश शोध व्यापक हिमालयी अथवा नेपाली आबादी के अध्ययन थे, जिनमें Chetri या Bahun जैसे खस-सम्बद्ध समुदाय भी सम्मिलित थे — लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े नमूने के भाग के रूप में.
दूसरा, पुराने और नए अध्ययनों की तुलना सावधानी से करनी चाहिए. 1979 के रक्त-समूह अध्ययन और 2018 के Whole Genome अध्ययन की तकनीक, क्षमता और निष्कर्षों की प्रकृति एक जैसी नहीं है.
तीसरा, उत्तराखण्ड के पारंपरिक खस समुदायों पर प्रत्यक्ष Whole Genome अध्ययन अभी भी बहुत कम उपलब्ध हैं. इस कारण नेपाल के Chetri समुदाय पर आधारित निष्कर्षों को बिना अतिरिक्त प्रमाण के सम्पूर्ण खस समुदाय पर लागू करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा.
यदि खस-सम्बद्ध समुदायों पर आधुनिक वैज्ञानिक शोध का इतिहास लिखा जाए, तो उसका पहला अध्याय 1979 से प्रारम्भ होता है, जब Journal of Human Evolution में G. Saglio, G. Antonini, P. Arese, M. Beretta, G. Modiano, A.S. Santachiara-Benerecetti तथा G.P. Morpurgo का शोधपत्र “Genetic Studies on Some Nepalese Populations” प्रकाशित हुआ.
आज के दृष्टिकोण से यह अध्ययन तकनीकी रूप से सीमित प्रतीत हो सकता है, क्योंकि इसमें न डीएनए अनुक्रमण था, न ही Whole Genome विश्लेषण. फिर भी उस समय उपलब्ध तकनीकों के आधार पर यह एक अत्यंत उन्नत Population Genetics अध्ययन था.
उद्देश्य. शोधकर्ताओं का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि नेपाल के विभिन्न हिमालयी समुदाय, जो भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के निकट रहते हैं, क्या आनुवंशिक दृष्टि से भी समान हैं या उन्होंने अपनी अलग-अलग पहचान बनाए रखी है. शोध का उद्देश्य किसी समुदाय की “उत्पत्ति” सिद्ध करना नहीं था.
समुदाय एवं तकनीक. काली गंडकी घाटी से Chetri, Magar, Gurung और Thakali, तथा सोलु-खुम्बु से Sherpa समुदाय को अध्ययन में सम्मिलित किया गया. वैज्ञानिकों ने रक्त में पाए जाने वाले आनुवंशिक संकेतकों; ABO, UMPK, PGD, GLO तथा LDH; की जीन आवृत्तियों (Gene Frequencies) की तुलना की.
प्रमुख निष्कर्ष. अध्ययन में पाया गया कि काली गंडकी घाटी में रहने वाले Chetri, Magar, Gurung और Thakaliसमुदायों में ABO जीन आवृत्तियाँ अलग-अलग थीं, जबकि वे भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के अत्यंत निकट, कई बार एक ही गाँव में, निवास करते थे. शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि ये समुदाय सामाजिक ही नहीं, बल्कि आनुवंशिक दृष्टि से भी अलग-अलग पहचान रखने वाले समूह थे, अर्थात केवल भौगोलिक निकटता का अर्थ आनुवंशिक समानता नहीं होता.
क्या यह अध्ययन खसों की उत्पत्ति बताता है? नहीं. आज इंटरनेट पर कई बार इस अध्ययन का उल्लेख इस प्रकार किया जाता है मानो इससे खसों की उत्पत्ति सिद्ध हो गई हो, जबकि मूल शोधपत्र में ऐसा कोई दावा नहीं है. इसने केवल इतना दिखाया कि अध्ययन में सम्मिलित Chetri समुदाय कुछ रक्त-आधारित संकेतकों में अपने पड़ोसी समुदायों से भिन्न था. इस आधार पर उत्पत्ति या पूर्वजों के बारे में निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है, इसके लिए बाद में Y-क्रोमोसोम, mtDNA तथा Genome-wide अध्ययनों की आवश्यकता पड़ी.
वैज्ञानिक सीमाएँ. इस अध्ययन में डीएनए का प्रत्यक्ष विश्लेषण नहीं था, केवल कुछ सीमित आनुवंशिक संकेतक थे. इसका उद्देश्य व्यापक ऐतिहासिक पुनर्निर्माण भी नहीं था, इसलिए इसमें प्रवास, मिश्रण अथवा प्राचीन पूर्वज आबादियों का विश्लेषण नहीं हुआ. आज लाखों SNP का विश्लेषण होता है, जबकि उस समय केवल कुछ आनुवंशिक प्रणालियों की तुलना संभव थी.
फिर भी, यही वह अध्ययन था जिसने पहली बार व्यवस्थित रूप से हिमालयी समुदायों के बीच आनुवंशिक अंतर का दस्तावेजीकरण किया, और बाद के लगभग सभी हिमालयी Population Genetics अध्ययनों ने किसी न किसी रूप में इस प्रारम्भिक कार्य का उल्लेख किया है.
1979 के बाद मानव आनुवंशिकी का क्षेत्र तीव्र गति से विकसित हुआ. 1980 और 1990 के दशक में PCR (Polymerase Chain Reaction) तकनीक के विकास ने पहली बार वैज्ञानिकों को डीएनए के छोटे-छोटे भागों का विश्लेषण करने की सुविधा दी. इसी काल में Y-क्रोमोसोम तथा माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए पर आधारित अध्ययन प्रारम्भ हुए, जिनसे यह समझना संभव हुआ कि किसी समुदाय के पितृवंश और मातृवंश का संबंध किन प्राचीन आबादियों से रहा होगा.
धीरे-धीरे Whole Genome SNP विश्लेषण विकसित हुआ, जिसमें पूरे जीनोम के लाखों आनुवंशिक बिंदुओं का अध्ययन किया जाने लगा. इससे पहली बार यह समझना संभव हुआ कि किसी समुदाय में विभिन्न प्राचीन पूर्वज समूहों का योगदान कितना है, और अलग-अलग आबादियाँ समय के साथ किस प्रकार एक-दूसरे से मिलीं. यहीं से खस-सम्बद्ध समुदायों के अध्ययन में भी एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ, अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि विभिन्न समुदाय अलग हैं या नहीं, बल्कि यह था कि वे आनुवंशिक रूप से किन प्राचीन आबादियों से जुड़े हैं और उनके बीच ऐतिहासिक मिश्रण कब और कैसे हुआ.
वर्ष 2010 में Jinchuan Xing और सहयोगियों का शोधपत्र “Toward a More Uniform Sampling of Human Genetic Diversity” पत्रिका Genomics में प्रकाशित हुआ. इसका उद्देश्य विश्व की उन आबादियों को वैश्विक आनुवंशिक डेटासेट में शामिल करना था, जिनका प्रतिनिधित्व अब तक बहुत कम था; विशेषकर दक्षिण और मध्य एशिया की आबादी.
इस अध्ययन में काठमांडू से संग्रहित नेपाली नमूने भी सम्मिलित थे, जिनमें 16 Brahman, 2 Magar, 2 Chhetri, 2 Newar, 1 Madhesi तथा कुछ अज्ञात-जातीयता के व्यक्तियों के कुल मिलाकर लगभग 25 नमूने शामिल थे.
यहाँ एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सावधानी आवश्यक है: इस अध्ययन में Chhetri समुदाय के केवल दो व्यक्तियों के नमूने थे. इतने छोटे नमूने के आधार पर किसी पूरे समुदाय के बारे में ठोस निष्कर्ष निकालना सांख्यिकीय दृष्टि से संभव नहीं है. दुर्भाग्यवश यह ठीक वही अध्ययन है जिसके PCA (Principal Component Analysis) चित्रों को इंटरनेट पर, विशेषकर कुछ नस्लवादी और “human biodiversity” विचारधारा से जुड़े मंचों पर, बार-बार गलत तरीके से उद्धृत किया गया है ताकि किसी समुदाय के बारे में सरलीकृत और भ्रामक दावे किए जा सकें. एक जिम्मेदार पाठक के लिए यह समझना आवश्यक है कि दो व्यक्तियों का आँकड़ा एक समुदाय का प्रतिनिधि नहीं हो सकता.
इस अध्ययन का सकारात्मक योगदान यह था कि इसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि नेपाल कोई एक समान आनुवंशिक इकाई नहीं है, वहाँ की विभिन्न आबादियों में स्पष्ट आनुवंशिक विविधता मौजूद है, और कुछ व्यक्तियों में पूर्व एशियाई (East Asian) समूहों से तथा कुछ में दक्षिण/मध्य एशियाई समूहों से अधिक निकटता देखी गई. किन्तु खस-सम्बद्ध समुदाय की उत्पत्ति के बारे में इस अध्ययन के आधार पर कोई ठोस निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा.
यदि खस-सम्बद्ध समुदायों के आनुवंशिक अध्ययन में किसी एक शोधपत्र को सबसे अधिक महत्व दिया जाए, तो वह है Elena Arciero, Thirsa Kraaijenbrink और सहयोगियों (Asan, Marc Haber, Massimo Mezzavilla, Chris Tyler-Smith आदि) का शोधपत्र, जो 2018 में Molecular Biology and Evolution में प्रकाशित हुआ; “Demographic History and Genetic Adaptation in the Himalayan Region Inferred from Genome-Wide SNP Genotypes of 49 Populations”
अध्ययन का आकार. शोधकर्ताओं ने 883 व्यक्तियों के नमूनों का विश्लेषण किया. गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) के बाद 738 व्यक्तियों के Genome-wide SNP डेटा (5 लाख से अधिक SNP) का विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण किया गया, जिसमें नेपाल, भूटान, उत्तर भारत तथा तिब्बत की कुल 49 आबादियाँ शामिल थीं.
क्या खस-सम्बद्ध समुदाय शामिल थे? हाँ. इस अध्ययन में नेपाल के पाँच इंडो-यूरोपीय भाषी समुदायों, Chetri, Damai, Majhi, Sarki तथा Sonar को सम्मिलित किया गया और उनकी तुलना 44 तिब्बती-बर्मी भाषी आबादियों से की गई. यह पहला बड़ा Genome-wide अध्ययन था जिसमें खस-सम्बद्ध समुदायों को इतने व्यापक हिमालयी संदर्भ में देखा गया.
क्या इस अध्ययन ने खसों की उत्पत्ति सिद्ध कर दी? नहीं, और यही इस पूरे लेख का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है. इस अध्ययन ने कहीं भी यह निष्कर्ष नहीं दिया कि खस किसी एक विशिष्ट प्राचीन जातीय समूह के प्रत्यक्ष वंशज हैं या उनकी उत्पत्ति किसी एक स्थान से हुई. इसके विपरीत, अध्ययन यह दर्शाता है कि हिमालयी समुदायों का इतिहास जटिल है और उनमें विभिन्न कालों में अनेक स्रोतों से आनुवंशिक योगदान हुआ है. आधुनिक आनुवंशिकी खस समुदाय को भी इसी व्यापक हिमालयी ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा मानती है.
यह 2018 का शोध आज भी हिमालयी Population Genetics का आधारभूत संदर्भ माना जाता है, और इसके बाद प्रकाशित अनेक शोधों ने इसी अध्ययन के आँकड़ों या विधियों का उपयोग किया है.
2022 में Human Genetics पत्रिका में Banaras Hindu University, CSIR-CCMB तथा त्रिभुवन विश्वविद्यालय (नेपाल) के शोधकर्ताओं, जिनमें प्रमुख शोधकर्ता Rajdip Basnet शामिल थे — का एक अध्ययन प्रकाशित हुआ, जिसमें नेपाल की विभिन्न आबादियों (Newar, Magar, Sherpa, Brahmin, Tharu, Tamang, तथा काठमांडू व पूर्वी नेपाल के समुदाय) के 999 व्यक्तियों के सम्पूर्ण माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (Whole mtDNA) का विश्लेषण किया गया. इस अध्ययन से यह संकेत मिला कि अधिकांश नेपाली आबादियों का मातृवंशीय योगदान मुख्यतः निचले मैदानी क्षेत्रों की आबादियों से आया, न कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों से, अर्थात पितृवंश और मातृवंश का इतिहास एक जैसा नहीं रहा. यह अध्ययन विशेष रूप से Chetri/खस-सम्बद्ध समुदाय पर केंद्रित नहीं था, लेकिन यह नेपाल की व्यापक जनसंख्या संरचना को समझने में सहायक है.
पिछले दो दशकों में मानव इतिहास के अध्ययन की सबसे बड़ी वैज्ञानिक क्रांति Ancient DNA के रूप में आई है. वैज्ञानिक अब हजारों वर्ष पुराने मानव कंकालों से भी डीएनए निकाल पाते हैं और उनकी तुलना आधुनिक आबादियों से करते हैं. हालाँकि भारत और हिमालय के अधिकांश भागों की गर्म व आर्द्र जलवायु के कारण प्राचीन डीएनए का संरक्षण कठिन है, इसलिए दक्षिण एशिया से प्राप्त Ancient DNA अभी भी यूरोप या मध्य एशिया की तुलना में सीमित है.
वर्तमान वैज्ञानिक मॉडल विशेषकर David Reich की पुस्तक “Who We Are and How We Got Here” (2018) तथा Vagheesh Narasimhan और सहयोगियों के शोधपत्र “The Formation of Human Populations in South and Central Asia” (Science, 2019) में प्रस्तुत मॉडल के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश आबादियाँ अनेक प्राचीन मानव समूहों (प्राचीन ईरानी कृषक-सम्बद्ध वंश, दक्षिण एशियाई शिकारी-संग्राहक वंश, तथा मध्य एशियाई स्टेपी-सम्बद्ध वंश) के मिश्रण का परिणाम हैं. सरल शब्दों में, आधुनिक दक्षिण एशियाई समुदाय किसी एक पूर्वज से नहीं बने, बल्कि हजारों वर्षों तक चले प्रवास, स्थानीय विकास और अंतर्विवाह से उनका निर्माण हुआ.
अब तक उपलब्ध अधिकांश Ancient DNA अध्ययनों का उद्देश्य किसी एक विशेष आधुनिक जातीय समुदाय (जैसे खस) का इतिहास लिखना नहीं रहा, बल्कि यह समझना रहा है कि दक्षिण एशिया की वर्तमान आबादियों में विभिन्न प्राचीन समूहों का कितना योगदान है. इसलिए इन शोधपत्रों में “खस” को अलग श्रेणी के रूप में सामान्यतः नहीं देखा गया.
यह प्रश्न सामान्य पाठकों द्वारा सबसे अधिक पूछा जाता है. आधुनिक आनुवंशिकी का उत्तर अपेक्षाकृत सीधा है, “किसी भी आधुनिक समुदाय को केवल एक प्राचीन समूह का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता”. यदि किसी समुदाय में किसी विशेष पितृवंशीय हैप्लोग्रुप की अधिकता पाई जाती है, तो उसका अर्थ केवल इतना है कि उस वंशरेखा का ऐतिहासिक विस्तार हुआ, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उस समुदाय की भाषा, संस्कृति और सामाजिक पहचान भी उसी स्रोत से आई. इसी प्रकार यदि किसी समुदाय में स्थानीय हिमालयी आनुवंशिक योगदान मिलता है, तो यह भी सिद्ध नहीं होता कि उसके सभी पूर्वज केवल वहीं के थे. वास्तविक इतिहास इन दोनों सरलीकृत दावों के बीच स्थित है, दीर्घकालीन संपर्क, मिश्रण और सांस्कृतिक परिवर्तन का इतिहास.
उत्तराखण्ड के पारंपरिक खस समुदायों पर प्रत्यक्ष Whole Genome अध्ययन अभी भी सीमित हैं. इस कारण अधिकांश वैज्ञानिक निष्कर्ष नेपाल के खस-सम्बद्ध समुदायों, विशेषकर Chhetri और Bahun, पर आधारित अध्ययनों से प्राप्त होते हैं. यहाँ सावधानी आवश्यक है, उत्तराखण्ड और नेपाल के खस समुदायों का ऐतिहासिक संबंध अवश्य रहा है, किन्तु दोनों क्षेत्रों का सामाजिक और राजनीतिक विकास अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. इसलिए किसी एक क्षेत्र के निष्कर्षों को दूसरे पर स्वतः लागू करना उचित नहीं होगा.
भविष्य में यदि उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों; कुमाऊँ, गढ़वाल, जौनसार, रवाईं तथा अन्य के पारंपरिक खस समुदायों पर बड़े पैमाने पर Genome-wide अध्ययन किए जाएँ, तो इस विषय पर कहीं अधिक स्पष्ट वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने आ सकेंगे.
खस समुदाय का अध्ययन केवल डीएनए से पूरा नहीं हो सकता. यदि इतिहासकार केवल प्राचीन ग्रंथ पढ़े और आनुवंशिकी की उपेक्षा करे, तो उसका निष्कर्ष अधूरा होगा. यदि आनुवंशिकी विशेषज्ञ केवल डीएनए देखे और भाषा, संस्कृति तथा इतिहास की उपेक्षा करे, तो उसका निष्कर्ष भी अधूरा रहेगा. इसी प्रकार यदि लोकपरंपराओं को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया जाए, तो समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति को समझना कठिन हो जाएगा.
इसलिए खस समुदाय के अध्ययन में चार प्रकार के प्रमाण समान रूप से आवश्यक हैं, प्राचीन साहित्य, अभिलेख एवं पुरातत्व, भाषाविज्ञान, और आधुनिक आनुवंशिकी. इन सभी स्रोतों के संयुक्त अध्ययन से ही संतुलित निष्कर्ष निकाला जा सकता है.
पिछले लगभग पचास वर्षों में खस-सम्बद्ध समुदायों पर वैज्ञानिक अनुसंधान ने उल्लेखनीय प्रगति की है. रक्त समूहों के प्रारम्भिक अध्ययनों से लेकर Whole Genome और Ancient DNA विश्लेषण तक, प्रत्येक चरण ने इस विषय की समझ को अधिक परिपक्व बनाया है.
अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि खस समुदाय को किसी एक “शुद्ध” मूलवंश से जोड़ना उचित नहीं है. इसके विपरीत, यह समुदाय हिमालय की दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं, मानव प्रवासों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा आनुवंशिक मिश्रण का परिणाम प्रतीत होता है. साथ ही यह भी स्पष्ट है कि आनुवंशिकी किसी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का स्थान नहीं ले सकती. भाषा, परंपरा, सामाजिक संगठन और ऐतिहासिक अनुभव किसी भी समुदाय की पहचान के उतने ही महत्वपूर्ण आधार हैं जितना उसका जैविक इतिहास.
अंततः यही कहा जा सकता है कि खसों की उत्पत्ति का प्रश्न अब पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट अवश्य हुआ है, किन्तु अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. विशेषकर उत्तराखण्ड के पारंपरिक खस समुदायों पर व्यापक Genome-wide और Ancient DNA आधारित अनुसंधान भविष्य में इस विषय को और अधिक स्पष्ट कर सकते हैं.
(नोट: कुछ ऑनलाइन स्रोतों पर 2018 के हिमालयी अध्ययन को गलती से “Jeong et al.” के नाम से उद्धृत किया जाता है. मूल शोधपत्र के प्रथम लेखक Elena Arciero और Thirsa Kraaijenbrink हैं — Cheol‑Woong Jeong की टीम ने इसी क्षेत्र पर अन्य महत्वपूर्ण अध्ययन किए हैं, परंतु यह विशेष शोधपत्र Arciero व सहयोगियों का है. पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ सही आधिकारिक उद्धरण दिया गया है.)
मंजुल
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