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बचपन से छीन ली गई बचपन की तस्वीर

यह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर है. इस से पहले मैंने ऐसी तस्वीर नहीं देखी, जिस का हर जर्रा मुझे रोमांचित कर देता हो. इस का कोई कोना ऐसा नहीं है, जिस के पेड़, पत्ते, कंकड़ और पत्थर में मेरी जड़ें न समाई हों. तस्वीर में दिख रही हर चीज से मैं अगाध प्रेम करता हूँ और इन्हें देख कर जलन भी होती है. परिवर्तन शब्द तो बहुत क्रांतिकारी है, लेकिन जब अतीत की ऐसी समूची तस्वीर दिखती है तो लगता है, ये कहाँ आ गए हम. (Memoir by Rajiv Pandey)

मैं तीस साल से भटकते-अटकते ही चल रहा हूँ मगर मेरे बचपन की यह तस्वीर आज भी उतनी ही ताज़ा है. मैं शुक्रगुज़ार हूँ तस्वीर में दिख रहे तमाम टेढ़े-मेढ़े रास्तों का, जो हमेशा मेरे साथ चले जब तक मैं खुद इन्हें छोड़कर नहीं आया. सुबह-सुबह स्कूल जाते वक्त इन्होंने मेरा साथ दिया और मैं एक छात्र बन पाया. दिन-दोपहर में इन्हीं रास्तों पर दौड़कर मैं कई मेले-ठेले और लोकपर्वों का हिस्सा भी बना. इन में हिलजात्रा सब से खास थी. आज भी दिवाली-होली से ज्यादा मुझे यह पर्व ही रोमांचित करता है. रात को इन ही रास्तों से मैं रामलीला देखने जाता था. आज भी जब मैं रामलीला देखने के लिए इन रास्तों पर चलता हूँ तो तीस-पैंतीस साल पीछे लौट जाता हूँ.

मुझे जीवन की राह दिखाने वाले इन रास्तों के लिए मैं कभी कुछ नहीं कर पाया, इस के बावजूद ये मुझ से कभी नाराज़ नहीं हुए. अचम्भा होता है इस दौर में ऐसे रास्तों को देखकर. इन्हीं रास्तों से मैं स्कूल के बाद अपनी दूसरी पाठशाला पहुँचा. इस तस्वीर में दिख रहा एक छोटा सा मैदान मेरे लिए माँ की गोद से कम नहीं था. इस मैदान की घास आज भी हर मखमली गद्दे पर भारी है. इस की भीगी घास और नम मिट्टी पर मैं घंटों लेटा रहता था. दूध सी धुली चाँदनी रातें, कड़कती धूप और झमाझम बारिश, हम ने सब साथ देखा है. इस छोटे से मैदान ने मुझे बहुत बड़ी-बड़ी चीजें सिखाई हैं. हार-जीत का पहला सबक यहीं मिला. यहीं मैंने सीखा कि हार केवल एक पड़ाव है और जीत एक सपना. पड़ाव पार करने और सपने पूरे करने के लिए सब से ज़रूरी है खेलते रहना. तब से मैं हार-जीत की चिंता किए बिना खेलता हूँ.

तस्वीर में फैले काले पहाड़ों और सीढ़ीदार खेतों ने भी मुझे बहुत कुछ सिखाया. तेज़ धूप में इन ही पहाड़ों पर मेरी माँ अक्सर अकेली घास काटने जाती थीं. उन के लिए चाय लेकर जाना उन दिनों मेरा सबसे प्रिय काम हुआ करता था. यही वह वक्त था जब मुझे लगा था कि मैं भी अपनी माँ के लिए कुछ कर सकता हूँ. जब माँ मांगे (घास के मैदान) में घास काटने की शुरुआत करती थीं तो तपड़ पर फैले घास के जंगल को देख कर लगता था कि वे असंभव काम की शुरुआत कर रही है. लेकिन जुनून से कुछ भी जीता जा सकता है इन पहाड़ों पर घास के मैदान साफ करती अपनी माँ को देखकर ही मैंने जाना था.

तस्वीर में बिखरे पड़े तमाम खेतों से भी मैंने बहुत कुछ सीखा. श्रम और संगठन इन में सबसे महत्वपूर्ण थे. इस श्रम के कई चरण होते थे. खेतों को हरा-भरा करने की कोशिश, फिर हरे खेतों को बचाने के लिए हाड़-तोड़ मेहनत. मैंने उन लोगों को देखा जो न दिन की कड़कती धूप की परवाह करते थे और न रात घिर जाने पर घर जाने की चिंता. लक्ष्य—बारिश, धूप और सर्दी की फिक्र नहीं करता, इन ही खेतों में जुटे लोगों के कारण मैं जान पाया था.

बचपन की यह तस्वीर इतनी व्यापक है कि इस पर लिखने के लिए अब भी बहुत कुछ बचा है. इतना कि जिसे लिखने में सारी उम्र गुजर  जाए. आगे लिखूँगा भी. लेकिन अपने आस-पास के बच्चों को देख कर सोचता हूँ कि हम ने उनके लिए ऐसी कोई तस्वीर बनाई नहीं बल्कि और बिगाड़ ही दी. उन के लिए सुविधाएँ तो बहुत जुटा दीं, पर अनुभव के मौके समाप्त कर दिए. हम ने उन से इन रास्तों के साथ-साथ उन पर अकेले चलने के मौके भी छीन लिए, सामूहिक परिवार छीन लिए, खेत-खलिहान छीन लिए, लोकपर्व छीन लिए, बोली-भाषा छीन ली, मैदान छीन लिए और इन सब के बदले उन्हें दे दिए ‘बड़े-बड़े’ लक्ष्य. (Memoir by Rajiv Pandey)

राजीव पांडे की फेसबुक वाल से, राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, के उत्तराखण्ड सम्पादक  हैं.

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Sudhir Kumar

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  • जननी जन्मभूमि स्वर्ग के समान, मेरा भी केवल जन्म हुआ था मनकोट ननिहाल में, सालों में जब भी जाता हूँ तो दहली को नमन करता हूं। वही पुराना पहाड़ी घर मुझे आधुनिक से अच्छा लगता है।

  • यहीं मैंने सीखा कि हार केवल एक पड़ाव है और जीत एक सपना --- क्या लेखक को पूरा भरोसा है कि वे जीवन का जो यह सिद्धांत वाक्य के रूप में ढाल कर उसे मुद्रित करके, ऑनलाइन इसका प्रचार एवं प्रसार कर रहे हैं, वह चट्टान सदृश दृढ़ है? प्रश्न इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि बहुत से भोले पाठकों को, क्योंकि यह ऑनलाइन मुद्रित हो चुका है, एक आप्त वाक्य ही लगेगा और वह इसे जीवन के बड़े सत्यों में से एक मान लेंगे। मुद्रण की माया ही ऐसी है 😄। इस सिद्धांत को प्रकाशित करने से पहले अपने आप को गहरे से जानना (यानि, आचार्य प्रशांत को पढ़ना व सुनना) अत्यंत आवश्यक है। एक बार यह हो गया तो ऐसे सिद्धांतों और मान्यताओं को पढ़ते ही आप इस तरह के प्रश्न तुरंत ही खुद करने लगेंगे। आपको या किसी और को ठेस पहुंचाने का मेरा उद्देश्य नहीं था।

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