घुटनों का दर्द और हिमालय की पुकार
मॉं वर्षों पहले दुनिया छोड़ चली गई और उसके जाने के बाद मुझे पता चला कि वह मुझसे बहुत प्रेम करती थी. गठिया, ब्लड प्रेशर समेत अपनी तमाम बीमारियां परिवार में सबसे छुपाकर चुपचाप मुझे सौंप गई. अक... Read more
“.. बहुत हुआ हे इष्ट देबो, जिन्होंने मेरे परिवार के साथ अन्याय किया, उनको अब तू ही समझना… गोल्ज्यू मेरा इंसाफ़ करना, तुम्हारे मंदिर में अर्ज़ी लगाने आ रही हूँ मैं…” माथे पर... Read more
पुष्पदन्त और माल्यवान को मिला श्राप
महान हिमवत्, पर्वतों के राजा के रूप में प्रसिद्ध हैं और किन्नरों, गंधर्वों तथा विद्याधरों का निवास स्थान हैं. वे इतने महान हैं कि तीनों लोकों की जननी भवानी उनकी पुत्री के रूप में जन्मी थीं.... Read more
डुंगरी गरासिया-कवा और कवी: महाप्रलय की कथा
यह कहानी है बहुत पुराने जमाने की, जब जंगल घने हुआ करते थे और उनमें भालू, भेड़िये, शेर, चीते, सियार और जंगली सूअरों का बसेरा था. ये जानवर जंगली जरूर थे, पर सिर्फ जीवन-यापन के लिए शिकार करते थ... Read more
हर साल 14 नवंबर देश में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन नेहरू केवल बच्चों के चाचा ही नहीं थे वो प्रकृति, विशेषकर हिमालय और भ... Read more
जीवन की सबसे गहरी कहानियाँ अकसर वो होती हैं जो शब्दों में नहीं, रिश्तों की गंध में बसती हैं. ‘झंझावात’ ऐसी ही एक कथा है. एक स्त्री की, जो न केवल परिवार की धुरी थी, बल्कि उस लोक स... Read more
महान सिदुवा-बिदुवा और खैंट पर्वत की परियाँ
बहुत समय पहले तिब्बत में सोनपाल नाम का एक राजा राज करता था. उसकी सात बेटियाँ थीं, जिनमें सबसे बड़ी थी जोत्रामाला. उसकी सुंदरता ऐसी थी जैसे पूर्णिमा का चाँद धरती पर उतर आया हो. जोत्रामाला हर... Read more
उत्तराखंड में वित्तीय अनुशासन की नई दिशा
उत्तराखंड जैसे संसाधन सीमित हिमालयी राज्य के लिए वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता केवल प्रशासनिक विषय नहीं बल्कि विकास का मूल आधार है. अरुण जेटली राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंधन संस्थान (ऐ जे एन आई ए... Read more
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” हमारी भारतीय संस्कृति में माँ और जन्म भूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ माना गया है — यह श्लोक केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का आत्म स्वर है. माँ... Read more
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सामाजिक चिंतक प्रो. पी. सी. जोशी का यह कथन बेहद प्रासंगिक है कि ‘‘….यह स्वीकार करते हुए अत्यंत लज्जा महसूस करता हूँ कि मैंने देश-दुनिया में अर्थशास्त्र के क्षे... Read more



























