बर्बर इतिहास का नाम क्यों ढो रहा है ‘खूनीबढ़’
कोटद्वार में बाबा की दुकान का नाम बदले जाने और बजरंग दल से भिड़ने वाले मोहम्मद दीपक के मामले ने अचानक सियासी तापमान बढ़ा दिया. एआई से बनाई गई तस्वीरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, नेशनल मीडि... Read more
कौन थे पाशुपत संप्रदाय के पुरोधा ‘लकुलीश’?
पाशुपत संप्रदाय के पुरोधा भगवान लकुलीश को भारतीय शैव परंपरा के विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माना जाता है. वे उस दौर के आचार्य थे, जब शिव की उपासना लोक आस्था से आगे बढ़कर संगठित... Read more
नारायण आश्रम उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में धारचूला से ऊपर, ऊँचे पहाड़ों और गहरी घाटियों के बीच स्थित है. आज यह स्थान शांति, साधना और अध्ययन के बड़े केंद्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन इ... Read more
घमंडी पिता और उसकी सीख
हिमालय की ऊँची पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा गाँव था. पत्थर के घर, देवदार के जंगल और पास ही बहती ठंडी नदी; यही वहाँ की पहचान थी. उसी गाँव में एक किसान रहता था. मेहनती था, लेकिन उससे भी ज़्यादा... Read more
उत्तराखंड के पेड़-पौधे: लोकज्ञान और औषधीय सत्य
कहा जाता है कि एक बार हिमालय में एक वैद्य गुरु अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी होने पर अंतिम परीक्षा ले रहे थे. गुरु ने सब शिष्यों से कहा “हिमालय से ऐसा कोई पेड़ या पौधा खोजकर लाओ जो किसी काम का... Read more
सामाजिक उत्पीड़न कुमाऊँ के लोकगीतों में अनेक प्रकार से उभरा है. इन गीतों का कोई अंग यदि इस उत्पीड़न को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है तो वह है कुमाऊँ के ‘जागर गीत’. आंचलिक देवी-दे... Read more
परंपरा और इतिहास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण यह लेख पल्टन बाज़ार, अल्मोड़ा प्रभात कुमार साह गंगोला जी द्वारा 2011 में लिखा गया है. श्री नंदा स्मारिका 2011 में ‘न... Read more
‘काल्द’ यानी भैरव पहली बार कैसे प्रकट हुए?
इस कहानी को विलियम एस. सैक्स की पुस्तक God of Justice से लिया गया है. यह पुस्तक गढ़वाल और मध्य हिमालय क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं और लोकदेवताओं पर आधारित एक अध्ययन है. पुस्तक में भैरव जैसे द... Read more
कैसा था नंदा देवी में गायब हुआ परमाणु डिवाइस?
नंदा देवी में गायब हुआ परमाणु डिवाइस बीसवीं शताब्दी के शीत युद्ध काल की एक गंभीर और गोपनीय घटना से जुड़ा है. यह वह समय था जब परमाणु तकनीक का उपयोग राज्यों द्वारा ऊर्जा उत्पादन, वैज्ञानि... Read more
उपकोशा और उसके वर
उपकोशा और उसके वर वररुचि जब अपने गुरुओं व्यादि और इन्द्रदत्त के साथ विद्याध्ययन कर रहे थे, उसी समय एक दिन इन्द्रोत्सव के दौरान उनकी दृष्टि एक अत्यंत सुंदर युवती पर पड़ी. वह सौंदर्य में ऐसी थ... Read more


























