नगरूघाट मेला : यहाँ लगती है “मितज्यू” की अनूठी डोर
उत्तराखंड की मिट्टी में लोक परंपराओं की खुशबू रची-बसी है. हर पर्व, हर मेला यहाँ सिर्फ उत्सव नहीं होता, बल्कि सामाजिक एकता और मानवता का प्रतीक भी बन जाता है. ऐसी ही एक अद्भुत परंपरा का गवाह ह... Read more
वह रील्स भी बनाती है और रन भी: आज की बेटी जेमिमाह
“रन बनाना? वो क्या होता है! मेरा क्रिंज रील देखो और गाना सुनो.” ये शब्द एक जमाने में उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर हथियार की तरह इस्तेमाल होते थे. लेकिन आज, DY पाटिल स्टेडियम में लिख... Read more
उत्तराखंड का कुमाऊं अंचल अपनी अनूठी और प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है. समय के साथ यहां के सामाजिक ताने-बाने और रीति-रिवाजों में कई बड़े बदलाव आए हैं. कुमाऊं के वैवाहिक इतिहा... Read more
उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ जिलों में रहने वाले लोग कुमाऊनी कहलाते हैं. नैनीताल जिले के पर्वतीय हिस्सों में रहने वाले लोग भी इसी कुमाऊनी समाज का हिस्सा माने... Read more
कुमाऊं में प्रचलित महाभारत कथाओं पर शोध अलग-अलग समय और हिस्सों में हुआ है. अब तक डॉ. रामसिंह, पद्मादत्त पन्त और स्मृति शान्ति साह द्वारा कुमाऊं में प्रचलित महाभारत कथाओं पर काम किया गया है.... Read more
जनपद पिथौरागढ़ के मेले
लोक जीवन में मेलों का एक अलग स्थान है. मेले, कष्टसाध्य जीवन जीते पर्वतीय लोगों को अपने प्रियजनों, नाते-रिश्तेदारों और मित्रों आदि से मिलने का सुअवसर होते हैं. मेले, वर्षभर अपने खेतों और जंगल... Read more
पहाड़ की शादियां
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की शादियां और वहां के रीति-रिवाज अपने आप में बहुत अनोखे हैं. समय के साथ शादियों के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है. चलिए आज बात करते हैं कुमाऊं की पुरानी ‘... Read more
सीएमएस की कुर्सी और सिस्टम का पोस्टमार्टम ?
इन दिनों बागेश्वर जिला अस्पताल भीतर ही भीतर सुलग रहा है. सिस्टम किसी के भी संभालते सँभल नहीं पा रहा है. अस्पताल की सभी व्यवस्थाओं की देखरेख के लिए ज़रूरी सीएमएस की कुर्सी खाली पड़ी है. कहा ज... Read more
‘मनमोहन सिंह’ उम्मीदों से भरा सफर :
1991 से देश में आर्थिक क्रांति हुई जो निःसंदेह 1947 में नेहरू द्वारा की गई राजनीतिक क्रांति से कहीं अधिक असरदार थी. अस्सी के दशक में देश आतंरिक अस्थायित्व यानी बेरोजगारी और मुद्रा स्फीति के... Read more
‘भूतगांव’ पहाड़ की नब्ज पकड़ता उपन्यास
पत्रकार -उपन्यासकार नवीन जोशी के उपन्यास पढ़ना, पहाड़ की नब्ज पकड़ कर शिद्दत से उसके हाल-हालात जानना और महसूस करना है. फिर चाहे वह उनका चर्चित उपन्यास ‘दावानल’ हो, ‘टिकटशुद... Read more


























