उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ जिलों में रहने वाले लोग कुमाऊनी कहलाते हैं. नैनीताल जिले के पर्वतीय हिस्सों में रहने वाले लोग भी इसी कुमाऊनी समाज का हिस्सा माने जाते हैं. अपनी भौगोलिक एकरूपता के कारण इस क्षेत्र के लोगों की संस्कृति, खान-पान, वेशभूषा और लोक परम्पराओं में एकरूपता की झलक साफ़ देखने को मिलती है. इन पर्वतीय क्षेत्रों से लगा तराई-भाबर क्षेत्र लम्बे समय तक कुमाऊनी समाज का शीतकालीन प्रवास रहा. मध्यकाल में तराई क्षेत्र को कुमाऊं सरकार कहा गया. कुमाऊनी समाज की संस्कृति, खान-पान, वेशभूषा और लोक परम्पराओं की उपस्थिति तराई-भाबर क्षेत्र में भी मजबूती से दिखती है.
मूल रूप से कुमाऊनी ग्रामीण सभ्यता के लोग हैं. दशकों से दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ और गाजियाबाद जैसे बड़े शहरों में बसे कुमाऊनियों ने अपने साथ लाई कुमाऊं की खुशबू को नहीं छोड़ा. एक नये शहर में अनजान लोगों के बीच उन्होंने अपने त्यौहार और परम्पराओं के सांस्कृतिक बीज बोये. इतने बड़े शहरों में कुमाऊं के लोग ऐसे दिखे जैसे पर्वतों में खिलने वाले मासी के फूल हों. इन शहरों में बसी पहली पीढ़ी के कड़े प्रयासों के बाद भी त्यौहार और परम्पराओं के मामले में अगली पीढ़ी को कुछ कमतर ही स्थान्तरित हुआ. भागती ज़िन्दगी और पहाड़ से दूरी ने आने वाली पीढ़ी में अपने त्यौहार और परम्पराओं के अंश मात्र ही छोड़े.
इन वर्षों में अपने त्यौहार और परम्पराओं की जड़ों को मजबूत करने का जिम्मा कुमाऊं के पहाड़ के जिला मुख्यालय और उनके आस-पास नये बस रहे कस्बों में रह रहे लोगों ने लिया. एक लम्बे समय तक यहां लोक त्यौहार और परम्पराओं की धमक खूब देखने को मिलती थी लेकिन जैसे जिला मुख्यालयों और उनके साथ बसे नये कस्बों में भी शहरीकरण पैर पसारता है त्यौहार और परम्पराओं की यह धमक कमजोर होती चली जाती है. इन जिला मुख्यालयों और नये कस्बों में शहरीकरण के प्रभाव में एक पूरी ऐसी पीढ़ी पल बढ़ रही है जिनके जीवन में अपने त्यौहार और पारंपरिक जड़ों से पर्याप्त दूरी साफ देखी जा सकती है.
कुमाऊं के त्यौहार और परम्पराओं को अब भीतरी ग्रामीण इलाकों में खूब देखा जा सकता है. कठिन श्रम और कष्टों पर चलने वाले पहाड़ से जीवन को ग्रामीण इलाकों में आज भी पूरी रंगत के साथ जीया जाता है. इन इलाकों में त्यौहार और परम्पराओं की मजबूत जड़ों को देख फिर से मजबूत वृक्ष की उम्मीद की जा सकती है. बसंत पंचमी, फूलदेई, हरेला जैसे अनेक ऐसे पर्व हैं जिनके सांस्कृतिक महत्व पर तो चर्चा होती है लेकिन इनके माध्यम स्थापित प्रकृति और मानव संबंध जैसे विषयों पर कोई अध्ययन नहीं है. प्रो. डी. डी. शर्मा के अनुसार इस क्षेत्र के अनेक ऐसे अनेक उत्सव हैं जो अब या तो समाप्त हो चुके हैं या केवल प्रतीकात्मक तौर पर मनाये जाते हैं.
पिथौरागढ़ के वरिष्ठ लेखक पद्मादत्त पन्त की किताब ‘जागर एक लोक गाथा’ में महाभारत का कुमाऊनी स्वरूप है. कुमाऊनी लोकजीवन पर आधारित इस संस्करण को आज भी कुमाऊनी जागर गाथाओं में भारत नाम से गाये जाने की परम्परा है.
पूरे भारत में मनाये जाने वाले त्यौहारों का कुमाऊनी समाज में एक अलग मिजाज रहता है. मसलन इस क्षेत्र में होने वाली होली पर इतिहासकार और पर्यावरणविद शेखर पाठक कहते हैं- पहाड़ी समाज का सामूहिक पर्व है होली, जो शहरों की हुड़दंगी और फूहढ़ होली से कहीं दूर, परंपराओं और शास्त्रीय एवं लोक संगीत के रस में रची-बसी है. आज भी इस पर्व पर लोग साल भर की नाराज़गी भुलाकर आपस में गले लग जाते हैं.
ग्रामीण क्षेत्र के त्यौहार और परम्पराओं के विषय में अध्ययन सामान्यतः पूर्वाग्रहों के साथ किया जाता है. इनके सांस्कृतिक पक्ष पर तो अतिरेक चर्चा होती है लेकिन व्यवहारिक, सामजिक और वैज्ञानिक पक्ष छूट जाते हैं. अन्य पक्षों पर चर्चा न होने से नई पीढ़ी इनकी ओर न तो झुकाव महसूस करती है न इसके साथ ख़ास लगाव ही रख पाती है.
इतने सारे बदलाव और बिखराव के कारण अधिकांश क्षेत्रों में कुमाऊं के त्यौहार और परम्पराएं अतीत का हिस्सा होते जा रहे हैं. विज्ञान के इस युग में संस्कृति और परम्परा की बात केवल एक प्रकार के नोस्टाल्जिया के सर्जन के लिये हो रही है. कुमाऊनी परम्पराओं के सम्पूर्ण पक्षों पर अध्ययन नई पीढ़ी के सम्मुख रखे जाने की जरूरत है. आवश्यकता है कि इसका एक गंभीर, तार्किक और गहन अध्ययन कर वर्तमान पीढ़ी को इसका महत्त्व बताया जाये. भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं जो संस्कृतियों के मूल्यों को संजोता है वह शांतिवादी होने में असफल नहीं हो सकता.
–रमेश
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