इस बार करीब 9 साल बाद पिथौरागढ़ जाकर एक बात साफ दिखी कि यहां कुछ बदल रहा है. आदि कैलाश और ओम पर्वत यात्रा में अचानक तीर्थयात्रियों की भारी संख्या, होटल उद्योग में हलचल, पर्यटन व्यवसाय में नई जान. यह देखकर मन में एक विचार कौंधा कि अगर राज्य सरकार थोड़ी और गंभीरता दिखाए, थोड़ी गहराई से सोचे, तो उत्तराखंड यूरोप के स्विट्ज़रलैंड जैसा बन सकता है. पहाड़, नदियां, बर्फ से ढकी चोटियां, शांति – सब कुछ यहां पहले से मौजूद है. कमी केवल दृष्टि और इच्छाशक्ति की है.
पर एक पुरानी सच्चाई अभी भी वैसी ही है. पिथौरागढ़ के युवाओं के लिए करियर का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता आज भी रक्षा सेवाएं हैं. पहले फौज में सीधे कमीशन की तैयारी होती थी, आज अग्निवीर बनने की होड़ है. मेरा अपने छात्र जीवन में भी एक ही सपना था – सेना में अधिकारी बनना. 1992 में मेरे स्कूल से एक ही साथ तीन लड़के OTA पास करके कमीशंड अधिकारी बने थे. यह कोई संयोग नहीं था. यह पिथौरागढ़ और उत्तराखंड की मिट्टी का स्वभाव है. अनुशासन, साहस और देशभक्ति यहां की हवा में है. पर सवाल यह है कि क्या एक ज़िले के युवाओं के पास केवल एक ही विकल्प होना चाहिए?
शिक्षा व्यवस्था को देखिए. सरकारी स्कूलों की मशीनरी जर्जर है. शिक्षकों की कमी है, संसाधनों की कमी है. जब तक बुनियादी शिक्षा मज़बूत नहीं होगी, तब तक प्रतिभा को सही दिशा नहीं मिलेगी. यह सुधार तुरंत और प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए. टुकड़ों में नहीं, समग्र रूप से. प्रकृति के संसाधनों का भी यही हाल है. पहाड़ की नदिया, जंगल, खनिज आदि अमूल्य संपदा हैं. पर जब इनका दोहन माफिया तंत्र के हाथों होता है, तो यह संपदा शाप बन जाती है. खनन माफिया पर सख्त नियंत्रण ज़रूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरती बची रहे.
और खेल की बात करें तो वे यहां की सबसे अनदेखी संभावना हैं. उत्तराखंड के पहाड़ी युवा स्वाभाविक रूप से बेहतरीन खिलाड़ी होते हैं. ऊंचाई पर जीवन जीने से जो फेफड़ों की क्षमता और शारीरिक सहनशक्ति विकसित होती है, वह किसी प्रशिक्षण से नहीं मिलती. वह जन्मजात है. क्रिकेट के मैदान पर ऋषभ पंत का आक्रामक खेल पूरी दुनिया देख चुकी है, और उनके पूर्वजों की जड़ें पिथौरागढ़ ज़िले के गंगोलीहाट क्षेत्र के पाली गांव से जुड़ी हैं. यह इस मिट्टी का गौरव है. पैरा-बैडमिंटन में मनोज सरकार ने पचास अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर उत्तराखंड का नाम रोशन किया है.
पिथौरागढ़ का श्री हरि सिंह थापा स्पोर्ट्स कॉलेज मुक्केबाज़ी, एथलेटिक्स और फुटबॉल के उभरते खिलाड़ियों के लिए एक प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र है और इस ज़िले का सेना के लिए खिलाड़ी तैयार करने का समृद्ध इतिहास रहा है. यह दिखाता है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं. कमी केवल अवसर, सुविधाओं और सतत प्रशिक्षण ढांचे की है. अगर सरकार यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल अकादमियां बनाए – एथलेटिक्स,फुटबॉल, मुक्केबाज़ी, पर्वतारोहण, स्कीइंग, बैडमिंटन आदि की, तो यह ज़िला केवल फौजी अफसर नहीं, ओलंपिक खिलाड़ी भी बड़ी संख्या में पैदा कर सकता है.
कुल मिलाकर यह कि पिथौरागढ़ के पास सब कुछ है – सुंदरता, प्रतिभा, परिश्रम और आध्यात्मिक गहराई. बस चाहिए एक ज़िम्मेदार और दूरदर्शी सरकार जो इस पहाड़ को उसका असली हक दे. स्विट्ज़रलैंड कोई दूर का सपना नहीं है. वह यहीं छिपा बैठा है, बस जागने और जगाने की देर है.
सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.
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