मनुष्य होने का मतलब क्या है? एआई से पूछें? लगता तो ऐसा ही है कि उसे ही यह ज़हमत देनी पड़ेगी. जब यह कविता लिख सकता है, संगीत रच सकता है, तर्क-कुतर्क खड़ा कर सकता है यानी हर वह काम करने पर आमादा है जो इंसान को जानवर से एक पायदान आगे रखता है तो यह भी समझा ही सकेगा कि इसकी दुनिया में इंसान का मतलब क्या होगा भला? वह इतना काबिल हो चला है कि कुछ न कुछ तो बता ही देगा. एआई के ईश्वर या कि शैतान बताने तक खिंची इस बात का एक उधड़ा हुआ सिरा है- मशीन को इतनी अक़्ल आख़िर दे कौन रहा है? (Machines Make Humans)
अरण्या सहाय की फ़िल्म `ह्यूमंस इन द लूप’ इस छूट गए सिरे को पकड़ती है. फ़िल्म ई-मैग्जीन `फिफ्टी टू डॉट इन’ में प्रकाशित करिश्मा मेहरोत्रा के लिखे एक शानदार आलेख `ह्यूमन टच’ पर आधारित है. दोनों को साथ रखकर देखें तो तकनीक की इस ग्लॉसी दुनिया के पीछे की सिलाई-बुनाई साफ़ दिखाई देती है. वहां रोबोट नहीं इंसान हैं- गाँव-गिराँव की कुछ साधारण स्त्रियाँ. उनके सामने कंप्यूटर की स्क्रीन है जिसपर उन जैसे हाड़-मास के बने इंसानों के जीवन की तस्वीरें हैं. स्त्रियों का काम है इन तस्वीरों को पहचानना, छांटना और नाम देना. डेटा लेबलिंग! तकनीक की दुनिया का शब्द- एनोटेशन! एनोटेशन या डेटा लेबलिंग टेक्स्ट, इमेज, वीडियो या ऑडियो यानी हर किस्म के रॉ डेटा को लेबल करने, टैग करने या उसमें मेटाडेटा जोड़ने की एक प्रक्रिया है ताकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग मॉडल इसे समझ सकें. हम इंसान तो स्वाभाविक रूप से समझ जाते हैं कि किसी फोटो या वाक्य का क्या मतलब है कंप्यूटर को केवल रॉ पिक्सल, नंबर या कोड ही दिखाई देते हैं. एनोटेशन उसके पीछे का `ग्राउंड ट्रुथ’ प्रदान करता है जो एआई एल्गोरिदम को इंसानों जैसी समझ बनाने में प्रशिक्षित करता है.
दुनिया जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहकर चमत्कृत हो रही है उसकी बुनियाद में इन स्त्रियों की बिल्कुल वास्तविक इंटेलिजेंस लग रही है. फ़िल्म की नायिका नेहमा झारखंड के आदिवासी समाज से है. उसकी अपनी वास्तविक दुनिया है. जंगल, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, रिश्ते-नाते सबकुछ. इन सबके बीच उपजा जीवन, जीवन की समझ, जीवन का ज्ञान. जिसे अर्जित करने के लिए किसी तकनीक, डिग्री या ट्रेनिंग की ज़रुरत नहीं पड़ती. पीढ़ियों के अनुभव से उपजा यह ज्ञान जीवन जीने के साथ मिलता चलता है. नेहमा जब डेटा-लेबलिंग के काम से जुड़ती है तो पहली बार उसकी इस दुनिया का सामना एक दूसरी दुनिया से होता है. ऐसी दुनिया जिसमें हर वस्तु का एक निश्चित नाम है, श्रेणी है और इन्हें श्रेणियों में बाँधने के लिए किसी अनजान शक्ति द्वारा निर्धारित नियम हैं. यह एक परेशान कर देने वाली बात है— निर्धारित नियम अनजान शक्तियों द्वारा बनाए-बिगाड़े जा सकते हैं!
नेहमा और उस जैसी अन्य आदिवासी युवतियों का काम तस्वीरों को देखकर उनमें मौजूद चीज़ों की पहचान करना है- यह पेड़ है- यह आदमी है- यह फलाना जानवर है- यह हँसी है- यह उपयोगी है- यह ख़तरा है, सबकुछ. मामूली काम है. जैसे किसी छोटे बच्चे को तस्वीरों वाली किताब दिखाकर सिखाया जाए कि यह बिल्ली है- यह कुत्ता है- यह चिड़िया है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि यहाँ बच्चा एक मशीन है जिसकी स्मरणशक्ति असाधारण है और जिसे बड़ा होकर पूरी दुनिया के बारे में फ़ैसले लेने हैं!
मुश्किल तब शुरू होती है जब नेहमा को पता चलता है कि दुनिया को देखने का उसका तरीक़ा और मशीन को सिखाया जा रहा तरीक़ा एक नहीं है. फ़िल्म में एक दृश्य है. स्क्रीन पर एक कीड़ा दिखाई देता है. निर्देश है कि इसे `पेस्ट’ यानी हानिकारक कीट की श्रेणी में रखा जाए. नेहमा असहमत है. उसका जीवनानुभव कहता है कि वह कीड़ा पौधे के सड़े हुए हिस्से को खाकर उसकी सफ़ाई कर रहा है. वह नुक़सान नहीं पहुँचा रहा बल्कि प्रकृति की ज़रूरी प्रक्रियाओं में अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहा है. मशीन के लिए निर्धारित नियम में- कीड़ा पेस्ट है तो पेस्ट है!
यह दो ज्ञान-परंपराओं का टकराव है. एक ज्ञान वह है जो अनुभव, परिवेश और सह-अस्तित्व से पैदा हुआ है. दूसरा वह जिसे दुनिया को निश्चित श्रेणियों में बाँटकर, मानकीकृत करके और अपनी ज़रुरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है. संदर्भ को हटाकर सार्वभौमिक होने का दावा पेश करता यह ज्ञान अंततः किन ताकतों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य के साथ रचा जा रहा है, हम सब जानते हैं.
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दिलचस्प बात यह है कि नेहमा तकनीक का विरोध नहीं कर रही, कर ही नहीं सकती शायद, वह केवल यह कह रही है कि उसकी जानकारी को भी जानकारी माना जाए. मसला यही है. दुनिया की अधिकांश बड़ी एआई प्रणालियाँ कुछ गिने-चुने विकसित देशों की कंपनियों द्वारा बनाई जा रही हैं यह बात हम जानते हैं. यह सच है कि इनकी ट्रेनिंग दुनिया भर से जुटाए गए डेटा पर होती है. लेकिन क्या यह जानना इतना मुश्किल है कि डेटा का चयन, उसकी श्रेणियाँ और उसके मानदंड कौन तय करता है? किस समाज का अनुभव सार्वभौमिक ज्ञान बन जाता है और किस समाज का अनुभव स्थानीय, अपवादस्वरूप या अप्रासंगिक मानकर अलग रख दिया जाता है? दुनिया की किसी बड़ी भाषा में विकसित एआई प्रणाली किसी आदिवासी समुदाय के जंगल को पहचान तो सकती है लेकिन क्या वह उस जंगल के साथ समुदाय के संबंध को भी समझ सकती है? वह पेड़ की प्रजाति बता सकती है लेकिन क्या यह जान सकती है कि किसी विशेष पेड़ का उस समाज की स्मृतियों, अनुष्ठानों और जीवन-व्यवस्था में क्या स्थान है? वह जानकर करेगी भी क्या जब यह सब जानकारियाँ उसके मॉडल की ज़रूरतों में हैं ही नहीं? नेहमा का वह छोटा-सा कीड़ा इन जैसे अनेक सवालों के एक बड़े जाल में तब्दील होता दीखता है!
`ह्यूमन टच’ इस जाल का एक और पहलू सामने लाता है. एआई के पीछे काम करने वाले वास्तविक मनुष्य के नगण्य होते जाने का पक्ष. डेटा को लेबल करने वाली वे स्त्रियाँ जिनके श्रम से मशीनें सीखती हैं उनकी अपनी उपस्थिति तकनीक की उपलब्धियों के विवरण से लगभग ग़ायब है. तकनीक की दुनिया में मनुष्य की भागीदारी के लिए एक रेशमी-मुलायम पद प्रचलित है- ह्यूमंस इन द लूप! वास्तविकता में यह भागीदारी बेहद दोहरावपूर्ण, कम वेतन वाले और अदृश्य श्रम के रूप में सामने आती है. मनुष्य मशीन को प्रशिक्षित करता है, मशीन अधिक सक्षम होती जाती है. कंपनी मुनाफ़ा कमाती जाती है, तकनीक का मूल्य बढ़ता जाता है. लेकिन मशीन को सशक्त करने वाले मनुष्य का मूल्य? क्या यह महज़ आशंका है कि जिस श्रम के आधार पर भविष्य की स्वचालित दुनिया बनाई जा रही है उसी श्रम को भविष्य में अनावश्यक बना देने का सपना भी बुना जा रहा है? यह चिंता अरण्या सहाय की फ़िल्म से बने सवालों के जाले के केंद्र में है. भले ही वह उतनी रेज़ोनेटिंग न हो.
नैरेटिव कंट्रास्ट से कहानी कहने का सुंदर इस्तेमाल हुआ है फ़िल्म में. नेहमा अपने बच्चों की माँ है और एक अर्थ में उस एआई की भी जिसे वह रोज़ ट्रेनिंग दे रही है. वह दोनों के सामने अपने अनुभव रखती है लेकिन दोनों के सीखने की प्रक्रिया में एक बुनियादी अंतर है. यह अंतर तकनीकी कम दार्शनिक अधिक है. नई दुनिया में ज्ञान को सूचना के पर्याय की तरह इस्तेमाल करने का दबाव है. जबकि सूचना और ज्ञान में, ज्ञान और समझ में और समझ तथा संवेदना में पर्याप्त अंतर है. किसी जीव-जंतु-परिंदे की प्रजाति पहचान लेना एक बात है- उसके व्यवहार, उसके पूरे इकोसिस्टम और उस इकोसिस्टम में मनुष्य के साथ इंटरेक्शन को समझना दूसरी बात. इस दूसरी बात के आधार पर जीव के अस्तित्व को महत्त्व देना शायद तीसरी और सबसे ज़रूरी बात.
एआई पहली में आश्चर्यजनक प्रगति कर चुका है. दूसरी में उसकी उपलब्धियाँ लगातार बढ़ रही हैं. मसला तीसरी का है. मशीन किसी जीव के संरक्षण के पक्ष में तर्क तो दे सकती है लेकिन क्या वह स्वयं उसके अस्तित्व के प्रति कोई नैतिक उत्तरदायित्व महसूस करती है? विलुप्त होने की कगार पर खड़ी भाषाएँ, संस्कृतियाँ और जीवन कलाएँ रिसीविंग एंड पर इस बात का मुकम्मल जवाब हैं अगर कोई सुनना चाहे.
फ़िल्म में नेहमा की बेटी धानू का जंगल में खो जाना और साही का उसे रास्ता दिखाना एक सुंदर रूपक है. उसे इसी संदर्भ में दर्ज किया जाना चाहिए. जंगल की अपनी एक भाषा होती है. यह दृश्य संकेतों, व्यवहारों और संबंधों में अभिव्यक्त होती है. जीव-निर्जीव दोनों के संबंधों में. इसे सुनने-गुनने के लिए केवल आँखें होना पर्याप्त नहीं है. व्यक्ति को उस दुनिया का हिस्सा होना भी ज़रूरी है. एआई की सिखलाई में उस भाषा का कितना हिस्सा है जिसमें सभी जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं? और क्या इसमें अलग-अलग ज्ञान-परंपराओं के बीच संवाद की गुंजाइश बची हुई है?
एक आदिवासी स्त्री का कीड़े को पेस्ट मानने से इंकार करना ज्ञान के केंद्रीकरण के विरुद्ध एक छोटी लेकिन ज़रुरी आपत्ति दर्ज कराने जैसा है. दुनिया के बड़े सवाल कभी-कभी छोटी असहमतियों से शुरू होते हैं!
नेहमा के निजी हालात को एक इमोशनल सबप्लॉट बनाया जा सकता था पर खूबसूरती यह है कि वे उस नाटकीय आधार का काम करते हैं जिस पर फिल्म का व्यापक दार्शनिक तर्क टिका हुआ है. `दुकू’ विवाह के टूटने से उपजी नेहमा की वैवाहिक स्थिति और उसके काम के बीच एक समानता है. दोनों ही ढांचों के भीतर अपने फैसले मनवाने के लिए संघर्ष करती है मोटे तौर पर जो उसके अधिकारों को सीमित कर रहे हैं. वह एक यात्रा तय कर रही है. खुद को परिभाषित करने का अधिकार वापस पाने की यात्रा. एक ऐसा अधिकार जो घूमकर फिल्म के मुख्य विषय से जुड़ा है कि आखिर वास्तविकता को परिभाषित करने की शक्ति किसके पास है.
फिल्म देखते हुए कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म एक ऑडियो-विज़ुअल ट्रेनिंग है दर्शकों के लिए- कि इस मीम/शॉर्ट्स/रील की दुनिया में दरअसल उन्हें कैसे देखना और सुनना चाहिए! झारखंड के घने जंगल में पत्तों के बीच से छनकर आती धूप, स्टैंड स्टिल इलाकों के जीवन की नीरवता, कीड़े-मकोड़ों-पक्षियों-जानवरों की हलचल सबकुछ इतनी संवेदनशीलता से फिल्माया गया है कि पूरा परिवेश जीवंत हो उठा है. कैमरा अक्सर उन छोटी-छोटी और मामूली लगने वाली चीज़ों पर ठहर जाता है जो अमूमन छूट जाती हैं. इसके बिल्कुल उलट डेटा-एनोटेशन सेंटर के नीरस, ठन्डे और आर्टिफीसियल रोशनी से जगमगाते भीतरी हिस्से टेक्नीकल डिटैचमेंट की एक अलग ही दृश्य-भाषा गढ़ते हैं. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इस विरोधाभास को और निखारता है. रोज़मर्रा जीवन की लय फिल्म के संगीत का एक अभिन्न हिस्सा है. प्राकृतिक ध्वनियों और बहुत ही हल्के संगीत के साथ खामोशी का एक बेहद असरदार इंटरप्ले है जो फ़िल्म को शुरुआत से अंत तक एक मधुर लय में बांधे रखता देता है.
फ़िल्म समाप्त होने के बाद जंगल, नेहमा और कंप्यूटर की स्क्रीन एक साथ स्मृति में बने रहते हैं. यह एक बेचैन कर देने वाला अनुभव है. हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें मशीनें लगातार अधिक बुद्धिमान होती जाएँगी. लेकिन इसासे यह नहीं साबित होता कि जीवन के हर अनुभव को डेटा में बदलकर उसकी आइडेंटिटी, उसकी सुन्दरता और उसकी पूर्णता सुरक्षित रखी जा सकती है. नेहमा का कीड़ा हमें इस डार्क फ्यूचर की कौंध देता है!
यही कौंध लगभग दस मिनट की एक शॉर्ट ड्रामा फ़िल्म में उठती दिखती है. डार्क ह्यूमर से भरी वह फ़िल्म है प्रणव भसीन की `वी वर हियर’. नेह्मा की असहमति से आगे बढ़ते हुए इस फिल्म में कुछ लोग रोबोटों के ख़िलाफ़ बाक़ायदा आंदोलन छेड़ देते हैं. उनकी नौकरियाँ मशीनों ने छीन ली हैं और अब वे सड़कों पर ‘रोबोट गो बैक’ के नारे लगा रहे हैं! मज़ेदार प्लॉट है. ख़ासा दिलचस्प और उतना ही सीरियस भी. इंसानों को मालूम है कि मशीनें उनसे अधिक उपयोगी साबित हो रही हैं लेकिन यह बात स्वीकार कर लेना और इसके सामने आत्मसमर्पण कर देना दो अलग-अलग बातें हैं. फ़िल्म का सीरियस एंगल इसके बीच की ज़मीन का है- हम जानकर भी क्या कर सकते हैं?
तीन अधेड़ उम्र के दोस्त मशीनों के विरुद्ध मोर्चा खोलते हैं. उनके आंदोलन का एक हथियार मशीनों को ग़लत जानकारी देना भी है. मशीन मनुष्यों से सीखती है. उसकी सारी परफॉरमेंस सिखलाई में ही है. अगर उसे ग़लत ही सिखा दिया जाए तो? आंदोलनरत दोस्त मशीनों को ग़लत जानकारियाँ देने लगते हैं. मशीन ग़लत आउटपुट देने लगती है.
कहानी में एक मोड़ आता है जब एक आंदोलनकारी का अपना बेटा एआई के साथ काम करने का फ़ैसला करता है. पिता जिस तकनीक के विरुद्ध लड़ रहा है, बेटा उसी में अपना भविष्य तलाश रहा है. तकनीकी बदलाव के प्रति दो अलग-अलग मानवीय प्रतिक्रियाओं का टकराव है यह. उसी तरह से जैसे `ह्यूमंस इन द लूप’ में नेहमा की बेटी धानू नई पीढ़ी का परसेप्शन लेकर आती है. फ़िल्म इस स्ट्रगल को एक हास्यास्पद विद्रोह की तरह प्रस्तुत करती है लेकिन इस हास्य के पीछे एक गहरी आशंका छिपी है. इंसान के अप्रासंगिक हो जाने की आशंका.
बहुत छोटे स्पेस में बनाई गयी इस फिल्म की चाभी बाग्ची के कहे में है- “रोबोट एकदम सटीक लाइन बनाते हैं, लेकिन जब मैं लाइन बनाता हूँ, तो वह उतनी सटीक नहीं होती क्योंकि मैं साँस ले रहा होता हूँ इसलिए हाथ हिल जाता है.” उसकी इस काँपती हुई रेखा में ही उसके होने का प्रमाण छिपा है. तकनीकी पूर्णता के सामने मानवीय अपूर्णता का इससे सुंदर बचाव नहीं हो सकता.
रोचक बात यह है कि `ह्यूमंस इन द लूप’ और यह `वी वर हियर’ एक ही समस्या के समाधान के लिए दो अलहदा सिरों पर खड़ी दिखाई देती हैं. पहली फ़िल्म में नेहमा मशीन को दुनिया पहचानना सिखा रही है दूसरी में मनुष्य मशीन को यह याद दिलाने पर आमादा है कि दुनिया केवल पहचानने की चीज़ नहीं है! नेहमा का कीड़े को ‘पेस्ट’ मानने से इंकार करना और दूसरी फ़िल्म के कलाकार का अपनी काँपती हुई रेखा पर गर्व करना वस्तुतः एक ही तरह की दो असहमतियाँ हैं लेकिन कितने अलग स्तरों पर! दोनों उस मानकीकरण का प्रतिरोध करते हैं जिसमें सही होने का अर्थ एक निश्चित, निर्दोष और पूर्वनिर्धारित परिणाम तक सीमित हो जाता है. हालांकि एक विरोधाभास है. जिस मानवीय स्पर्श को दूसरी फ़िल्म में मशीनों के विरुद्ध सबसे बड़े तर्क की तरह प्रस्तुत किया गया है, पहली फ़िल्म बताती है कि मशीनों की बुद्धिमत्ता स्वयं उसी मानवीय स्पर्श की देन है. एक में यह साबित करने का प्रयास है कि मशीन को सिखाने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, दूसरी में समझाने की कोशिश है कि स्थितियां इतनी विकट हो उठी हैं कि मनुष्य मशीन के आगे बेबस है. वह अपनी यूटिलिटी साबित करने के लिए संघर्ष कर रहा है. एक फ़िल्म इस प्रक्रिया की त्रासदी दिखाती है दूसरी विडंबना! दोनों को साथ रखकर देखने पर लगता है कि तकनीक के साथ मनुष्य की असली लड़ाई इंटेलिजेंस से ज़्यादा डिज़ायरबिलिटी की, उपयोगिता और विशिष्टता की हो चुकी है. अब तक मनुष्य की श्रेष्ठता का प्रमाण उसकी बुद्धि, उसकी दक्षता और उसकी रचनात्मकता में खोजा गया था और इन सबकी वजह से ही वह प्रकृति में सबसे आगे चलने के लायक समझा गया है अब एआई इन सभी में प्रवेश कर चुका है. ऐसे में क्या मनुष्य होने का प्रमाण अंततः उसकी अपूर्णताओं में खोजा जाएगा? क्या वह काँपती हुई रेखा हमारी पहचान का आख़िरी हस्ताक्षर बन जाएगी? और वह कैसी विडंबना होगी यदि कल मशीनें हमारी तरह काँपती हुई रेखा भी खींचने लग जाएं? एआई से पूछें? (Machines Make Humans)

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक प्राचीन शहर जौनपुर में जन्मे अमित श्रीवास्तव भूमंडलीकृत भारत की उस पीढ़ी के लेखकों में शुमार हैं जो साहित्य की विधागत तोड़-फोड़ एवं नव-निर्माण में रचनारत है. गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में समान दख़ल रखने वाले अमित की अब तक छः किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- बाहर मैं, मैं अंदर (कविता संग्रह), पहला दख़ल (संस्मरण) और गहन है यह अंधकारा (उपन्यास) , कोतवाल का हुक्का (कहानी संग्रह), कोविड ब्लूज और सिराज- ए-दिल जौनपुर. सम सामयिक राजनीति, अर्थ-व्यवस्था, समाज, खेल, संगीत, इतिहास जैसे विषयों पर अनेक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं/ ऑनलाइन पोर्टल पर प्रकाशित हैं. भाषा की रवानी, चुटीलेपन एवं साफ़गोई के लिए जाने जाते हैं. भारतीय पुलिस सेवा में हैं और फ़िलहाल उत्तराखंड के देहरादून में रहते हैं.
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