“कसारदेवी या अल्मोड़ा जैसी छोटी सी जगह में ऐसा क्या है जो दुनियाभर से लोगों को आकर्षित करता है?” यह सवाल अक्सर पूछा जाता है. दो-तीन साल पहले अल्मोड़ा में स्थित रामकृष्ण कुटीर के अध्यक्ष से जब मैंने यह प्रश्न किया तो उन्होंने कहा, “स्वामी विवेकानन्द के कारण जानते हैं, नहीं तो पहले कौन जानता था?” लेकिन बाद में अल्मोड़ा नगर के ही एक चिंतनशील व्यक्ति ने तर्क किया कि स्वामी विवेकानन्द के यहाँ आने का भी कोई कारण रहा होगा और उन्हें भी किसी चीज़ ने आकर्षित किया होगा.” यह तर्क अपनी जगह सही है. (Kasar Devi Where you feel closest to heaven)

स्वामी विवेकानन्द पहली बार 1890 में एक अज्ञात घुमक्कड़ सन्यासी के रूप में अल्मोड़ा आये थे और कसारदेवी मन्दिर के पास एक गुफा में ध्यान किया था. जब वह पदयात्रा कर अल्मोड़ा को आ रहे थे तब नगर से करीब तीन किलोमीटर पहले थकान और प्यास के कारण अचेत हो गये थे. पास ही, कब्रिस्तान में रहने वाले एक मुस्लिम फ़क़ीर ने उन्हें ककड़ी खाने को दी थी. स्वामी विवेकानन्द ने उस ककड़ी का जो स्वाद अनुभव किया होगा उसे किसी को कैसे समझाया जा सकता है? खासकर ऐसे इंसान को जिसने कभी ककड़ी न खाई हो या उतनी भूख, प्यास और थकान महसूस ही नहीं की हो? ऐसे ही कसारदेवी में मिलने वाली अनुभूति को समझाना इतना मुश्किल है. स्वामी विवेकानन्द ने दूसरी बार 1897 में और तीसरी बार 1898 में सिस्टर निवेदिता तथा अन्य अनुयायियों के साथ अल्मोड़ा की यात्रा की और कुल मिलाकर कई सप्ताह यहाँ रहे.
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बीसवीं शताब्दी के दौरान कसारदेवी की शांति और सुन्दरता से मंत्रमुग्ध होकर खिंचे चले आये विश्व-विख्यात लोगों की लम्बी सूची है. विश्व प्रसिद्ध नृत्य सम्राट पंडित उदयशंकर 1938 से 1944 के बीच अल्मोड़ा में रहे और कसारदेवी के नजदीक सिमतोला में ‘उदय शंकर इंडिया कल्चरल सेंटर’ की स्थापना की. तिब्बती बौद्ध धर्म के विद्वान अमेरिका के वाल्टर इवांस वेन्त्ज़ (Walter Evans Wentz) ने 1920-30 के दशक में यहाँ रह कर “द तिब्बेतन बुक ऑफ़ डेड’ (Tibbetan Book of the Dead,1927) का अनुवाद किया और तिब्बत के महान योगी मिलारेपा पर एक किताब लिखी (प्रकाशन 1928). सन 1920 और 1930 के दशक के शुरुआती वर्षों में सुविख्यात ब्रिटिश उपन्यासकार डी. एच. लॉरेंस अपने अमेरिकी चित्रकार मित्र अर्ल ब्रूस्टर (Earl Brewster) के खूबसूरत घर में मेहमान बन कर रहे. रवीद्रनाथ टैगोर की सलाह पर 1930 के दशक में भारत आये डेनमार्क के आध्यात्मिक जिज्ञासु अल्फ्रेड सोरेन्सन (Alfred Sorensen), जिन्होंने रमण महर्षि की प्रेरणा से अपनी कुटीर और अपने को ‘शून्यता’ कहना शुरू कर दिया था, तीन दशकों से अधिक समय तक कसारदेवी में रहे. क्रेंक्स रिज पर स्थित अपने घर के बारे में शून्यता ने कहा, “डेनमार्क में लोग मुझे विचित्र व्यक्ति समझते थे, भारत मुझे घर जैसा लगा लेकिन यहाँ हिमालय में मुझे स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है.” कसारदेवी से हिमालय की नंदादेवी, नंदा देवी ईस्ट (सुनंदा), नंदा खाट, नंदा घूँघटी, त्रिशूल, मैक्तोली, पंचाचूली इत्यादि शिखरों का मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्य दिखता है. वह माँ आनंदमयी के साथ आध्यात्मिक चर्चा करने अक्सर अपने कुत्ते वूजी के साथ पातालदेवी स्थित आश्रम में जाते थे.

लामा अनागरिका गोविन्दा (तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध विद्वान और ‘द वे ऑफ़ वाइट क्लाउड’ किताब के लेखक जो अर्न्स्ट लोथर हॉफमैन के रूप में जर्मनी में पैदा हुए थे) और उनकी पत्नी ली गौतमी (रत्ती पेटिट, जो मुंबई के पारसी परिवार की थीं तथा तिब्बती बौद्ध धर्म की अध्येता, चित्रकार और छायाकार थीं) 1940 के दशक के उत्तरार्ध में कसारदेवी आये. इस जगह को आधार बना कर दोनों ने तिब्बत की अनेक बार यात्रा की. वे 1970 के दशक के अंत तक यहाँ रहे. 1960 के दशक में दुनियाभर में बेहद लोकप्रिय म्यूजिकल रॉक बैंड ‘द बीटल्स’ के जॉन हैरिसन तथा उनके साथी प्रसिद्ध अमेरिकी गायक और गीतकार बॉब डायलन (Bob Dylan) और ब्रिटिश संगीतकार कैट स्टीवेंस (Cat Stevens) भी मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की खोज में यहाँ आये. विख्यात अमेरिकी मनोवैज्ञानिक और लेखक टिमोथी लियरी (T.mothy Leary). अमेरिकी कवि एलन गिन्सबर्ग अपने साथी कवियों पीटर ओर्लोव्स्की और गर्री स्नाइडर के साथ 1960 के दशक में आये. 1971 में अमेरिकी बौद्ध विद्वान रोबर्ट थुरमन लामा गोविंदा का सानिध्य और मार्गदर्शन पाने अपनी पत्नी और नैना और तीन साल की बेटी उमा (हिमालय पुत्री पार्वती के नाम पर यह नाम रखा, जो बाद में हॉलीवुड की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री बनी और दो एक साल पहले दुबारा कसार देवी रहने आयी थी) के साथ कसारदेवी में रहे.

हिप्पी आन्दोलन के चरमोत्कर्ष के दिनों (1960-70 के दशक) में कसारदेवी क्षेत्र जिसे ‘क्रेंक्स रिज’ (Cranks’ R.dge))या हिप्पी हिल (H.pp. H.ll) भी कहा जाता है ग्लोबल हिप्पी ट्रेल का एक प्रमुख पड़ाव बन गया था. पाश्चात्य देशों से शांति-प्रिय, प्रकृति-प्रेमी और मनमौजी जिंदगी जीने की चाह रखने वाले हिप्पी यहाँ बड़ी संख्या में आकर रहने लगे. इनमें से ज्यादातर चरस और गांजा जैसे व्यसनों के भी प्रेमी होते थे.कसारदेवी के बारे में एक मान्यता स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बहुत ज्यादा प्रचारित की जाती है कि यह संसार के उन तीन स्थानों में से एक है जो वैन ऐलन बैल्ट (Van Allen Belt) के प्रभाव क्षेत्र में आता है. अन्य दो जगहें पेरू स्थित माचू पिचू (Machu P.ccsu) इंग्लैंड स्थित स्टोनहेंज बतायी जाती हैं. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के रिसर्च का हवाला देकर बताया जाता है कि वैन ऐलन बैल्ट एक शक्तिशाली विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्र है जिसमें अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा होती है. कसारदेवी में मंदिर समिति के बोर्ड पर लिखी जानकारी के अनुसार, “कसारदेवी की इस अद्भुत विशेषता ने युगों से साधु, योगी एवं चिंतकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. आज भी आगंतुकों को यहाँ की सकारात्मक ऊर्जा एवं शांति का अनुभव होता है जो अभी भी यथावत है.”

एक दशक पहले कसारदेवी में रह रहे स्वीडन के एक पर्यटक ने भी, जो 75 साल की उम्र में मिनी बस के साइज़ की कैंपर वैन को खुद चला कर यूरोप से कसारदेवी आये थे, पक्के विश्वास के साथ मुझे वैन एलन बेल्ट के बारे में बताया था. लेकिन वैज्ञानिक जानकारी प्रथ्वी की सतह पर ऐसे किसी चुम्बकीय क्षेत्रों के होने के मान्यता या दावे की पुष्टि नहीं करती.
जो भी हो, क्रेंक्स रिज, हिप्पी हिल, हिप्पी लैंड इत्यादि नामों से जाने जाने वाले कसारदेवी क्षेत्र में ‘रहस्यमय चुम्बक’ जैसा कुछ तो है जिसके कारण अल्मोड़ा शहर के ही नहीं, पूरे देश और दुनियाभर से प्रकृति-प्रेमी, एकांत प्रिय और आध्यात्मिक जिज्ञासु खिंचे चले आते हैं.
अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ घर से पैदल चल कर कसारदेवी तक जाने की मेरी सबसे पुरानी यादें 1970 के दशक की हैं. आज जिसे एन.टी.डी. कहते हैं तब नारायण तेवाड़ी देवाल कहा जाता था और आज की अपेक्षा वहाँ बहुत कम मकान और दुकानें थीं. यहाँ से कसारदेवी के रास्ते पर स्थित एक बेकरी में उन दिनों चार आने में कोकोनट के तीन स्वादिष्ट बिस्कुट मिलते थे. कसारदेवी की मोटर सड़क तब बन ही रही थी और दिनभर एक भी गाड़ी इसमें नहीं नज़र आती थी. पूरा रास्ता सुनसान था और चीड, बांज, काफल, बुरांस इत्यादि के पेड़ों का घना जंगल था. ग्रीष्म ऋतु में घर या पड़ोस का कोई व्यक्ति कसारदेवी जाता तो रसीले काफल लेकर आता था. कसारदेवी क्षेत्र में उन दिनों दो या तीन दुकानें थीं जिनमें चाय-पकौड़ी, आलू के गुटके, बिस्कुट, डबलरोटी इत्यादि कुछ चीजें मिलती थीं. दूकानों के अगल-बगल की खाली भूमि पर नीम्बू, माल्टा, दाड़िम, अंगूर इत्यादि फलदार पेड़, ककड़ी, कद्दू, लौकी आदि की बेलें नज़र आती थीं. पूरी सड़क और आसपास की पहाड़ी पेड़ों, फूलों और घास से ढकी दिखती थी. स्थानीय दुकानदार उन दिनों सड़क से नीचे स्थित अपने गाँव के घरों में रहते थे जिस कारण यहाँ एकान्त पसरा हुआ रहता. सुनहरे बालों वाले गोरे यूरोपीय लोग, विशेषकर बच्चे भी मेरी शुरूआती स्मृतियों में हैं.
कॉलेज के दिनों (1988-92) में सप्ताह में कम से कम एक बार कसारदेवी जाना तय था, कभी अपने मित्रों के साथ तो कभी अकेले ही. कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि एक दिन में दो बार पैदल कसारदेवी गया! यह सिलसिला अगले दो दशकों तक जारी रहा. इतवार और अन्य किसी भी छुट्टी के दिन अक्सर ही मैं और मेरी पत्नी अपनी बेटी को एक साल की उम्र से गोद में उठा कर पैदल ही कसारदेवी जाते और घंटों वहाँ मंदिर, जंगल या किसी एकांत दुकान के बाहर बैठ कर हिमालय को निहारते हुए बिताते थे. मानसून के बाद जब पहाड़ी पर कॉसमॉस के असंख्य गुलाबी, नारंगी, सफ़ेद रंग के फूल खिलते तब वह जगह असली फूलों की घाटी लगती. चारों तरफ दूर-दूर तक फूल ही फूल!
कसारदेवी अल्मोड़ा नगर से उत्तर दिशा में लगभग सात किलोमीटर दूरी पर स्थित एक पहाड़ी (ऊँचाई 1797 मी.) है जो मुख्यतया चीड़ के वन से आच्छादित है. संस्कृति विभाग (उत्तराखण्ड) का सूचना-पट बताता है कि इस पर्वत की एक गुफा में सितम्बर 1890 में स्वामी विवेकानन्द ने कठोर अध्यात्मिक साधनाएँ की थीं जिसके फलस्वरूप उन्हें यहाँ उच्च्तर आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई थीं. मंदिर समिति के सूचना बोर्ड में दी गयी जानकारी के अनुसार कसारदेवी मंदिर उत्तराखण्ड का एक महत्वपूर्ण दुर्गा मंदिर है. स्कन्द पुराण के अनुसार यक्षों और गन्धर्वों द्वारा यहाँ मंदिर स्थापित किया गया. देवी भागवत पुराण के अनुसार इस स्थान पर देवी कौशिकी ने शुम्भ-निशुंभ नमक दैत्यों का संहार किया था. माँ दुर्गा की मूर्ति के पीछे चट्टान पर देवी के शेर की प्राकृतिक आकृति है. मंदिर के समीप स्थित छठी शताब्दी ई. के पुरातात्विक महत्त्व के शिला-लेख के अनुसार, ”वेतिला पुत्र रुद्रक ने रुद्रेश्वर की स्थापना की. कसारदेवी मंदिर दूसरी शताब्दी ई. का (लगभग दो हज़ार साल प्राचीन) है. कसारदेवी में मंदिर के पास 1968 में स्थापित बौद्ध मठ और मंदिर तथा लगभग तीन दशक पहले स्थापित रामकृष्ण मिशन का शारदा मठ भी है.
कसारदेवी क्षेत्र वर्तमान में भारतीय और विदेशी दोनों ही पर्यटकों को आकर्षित करता है. पंतनगर हवाई अड्डे (127 km) और काठगोदाम रेलवे स्टेशन (105 km) से नजदीकी के अलावा सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह से जुड़ा होने के कारण भी हाल के दशकों में पर्यटकों का आना बढ़ गया है, खासकर कोविड19 लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद तो इनकी अनियंत्रित बाढ़ ही आ गयी है. पिछले पांच-छह सालों से सप्ताहांत पर यहाँ दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, और उत्तराखण्ड के मैदानी जिलों के पर्यटक बड़ी संख्या में आ रहे हैं जो एक या दो रात ठहरते हैं. स्थानीय लोग अभी प्रसन्न व उत्साहित हैं क्योंकि पर्यटन से रोजगार और आमदनी बढ़ रहे हैं. पूरे इलाके में रिसोर्ट, होटल, होम-स्टे और पेइंग गेस्ट सुविधायें बहुत तीव्रता से बढ़ती जा रही हैं जो प्रकृति, जंगलों, स्वच्छता, शांति जैसी उन विशेषताओं को ही ख़त्म कर रही हैं जिनके कारण लोग यहाँ आते हैं. प्लास्टिक आदि का अजैविक कचरा बहुत बढ़ रहा है जो सड़क के किनारे और क्रेंक्स रिज पर सर्वत्र बिखरा देखा जा सकता है. उपयोग किये पानी की निकासी और मल-मूत्र का निस्तारण कैसे और कहाँ हो रहा है, यह भी महत्वपूर्ण मुद्दा है. पानी की उपलब्धता इस इलाके में पहले से बहुत कम होने के कारण पर्यटकों की बड़ी संख्या का दबाव दूसरा मुद्दा है. प्रदेश और केन्द्र की सरकारें उत्तराखण्ड में पर्यटकों के सैलाब से बहुत खुश व उत्साहित हैं लेकिन ‘पर्यटन के विकास’ के नाम पर क्या हो रहा है? सरकार ‘विकास’ के लिये बांज और देवदार के हजारों पेड़ों को काट कर सड़क चौड़ा करने की योजना बना रही है. यहाँ के बहुत से व्यवसायी इतनी ज्यादा भीड़ से भी संतुष्ट नहीं हैं और कसारदेवी में कैंची धाम जैसा भारी जन-सैलाब चाहते हैं.
पिछले तीस-चालीस सालों से यहाँ आने वाले विदेशी सैलानियों की संख्या बहुत घट गयी है. इन्हीं में से कनाडा में रह रहे ब्रिटिश मूल के लेखक रे ब्रुक्स और उनकी पत्नी डायने, जो पैंतालीस वर्षों से प्रायः हर साल कसारदेवी आकर यहाँ रहते थे, भीड़ और शोरगुल के कारण अब नेपाल में रहने जाते हैं. आजकल जो थोड़े विदेश आते हैं उनमें इजराइली नागरिक ज्यादा हैं.
अभी सब का ध्यान पर्यटन से हो रही कमाई पर है लेकिन पर्यटकों की अनियंत्रित भीड़ और ‘असभ्य’ व्यवहार से प्रकृति और पर्यावरण को हो रहे नुकसान की भरपाई हो सकेगी? (Kasar Devi Where you feel closest to heaven)
अल्मोड़ा में रहने वाले कमल कुमार जोशी उत्तराखण्ड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान, अल्मोड़ा में कार्यरत हैं. यात्राओं और फोटोग्राफी के शौक़ीन हैं. स्वतंत्र लेखक के तौर पर कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
सभी तस्वीरें : कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड, मो. 9412909566, ईमेल : [email protected]
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