समाज

तिब्बती कौओं की भाभर प्रवास यात्रा और भारी बर्फबारी के संकेत

हिमपात का इंतजार आमजन मानस के साथ ही पशुओं, पक्षियों के जीवन के वार्षिक प्रवास का हिस्सा भी है. इंसानों की तरह जानवरों को भी हिमपात का बेसब्री से इंतजार रहता है. आजकल पशुओं में सबसे ज्यादा खुशी जिस जीव को है वह है हमारा हिमालयन शीप डॉग. हमारी माताजी बताती हैं कि बर्फ तो हिमालय शीप डॉग का मामा है. बर्फ पड़ते ही शीप डॉग बर्फीले जंगलों में खूब घूमते हैं. कई बार तो बर्फबारी का फायदा उठाकर झुंड में जंगली जानवरों का शिकार भी करते हैं. बर्फबारी के बाद उच्च हिमालय के जीव, पशु, पक्षी निचली घाटियों में आ जाते हैं.
(Winter in Uttarakhand)

मेरा बचपन हिमालय की गोद में बसे गाँव जलथ में बीता है. जहाँ ह्युनाल (बर्फीले शरद) की तैयारी काफी पहले, यानि मार्च से ही शुरू हो जाती है. मौसम परिवर्तनशील है और हिमालय में बर्फ आसोज, कार्तिक माह के बाद कभी भी पड़ सकती है. हिमालय के चरवाहे या आमजन अमूमन उत्क्रमण जीवन जिया करते थे. ग्रीष्मकाल में सपरिवार हिमालय में बसे जोहार घाटी के गाँवों — मिलम, रालम में वास करते तो शीतकाल में अपने मवेशियों के साथ नगर भाभर— टनकपुर, हल्द्वानी के जंगलों में. आज भी कुछ लोगों द्वारा इस जीवनशैली को जारी रखकर हिमालय की विलुप्त हो रही जीवन शैली को संरक्षित रखने का कार्य किया जा रहा है.

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शीतकाल की तैयारी में आमजन से लेकर मवेशियों तक के चारे के प्रबंध पहले ही कर लिया जाता था. हमारे गाँव जलथ में भी 3 से 4 फिट या उससे ज्यादा बर्फबारी होने की संभावना रहती, जो अब अपेक्षाकृत कम है. बर्फबारी की सूचना 3-4 दिन लगातार बारिश के साथ-साथ उच्च हिमालय से मध्य हिमालय के ओर प्रवास पर जाने वाले उच्च हिमालय के कव्वे, जिन्हें हमारे यहाँ जोहारी बोली में च्यनकाओ बोलते हैं, दिया करते थे. ये तिब्बती कौवे आम कव्वे से शारीरिक बनावट में भिन्न होते हैं. हल्के व भूरे मटमैले रंग के इन कौओं की केसरी/नारंगी रंग की चोंच होती है.
(Winter in Uttarakhand)

उच्च हिमालय में अत्यधिक बर्फबारी होने पर इन पक्षियों के झुण्ड के झुण्ड ‘कोऊ-कोऊ’ का उच्चारण, जो हमारे मध्य हिमालयी कौए से भिन्न होता है, कर उड़ान भरते भाभर प्रवास पर निकलने लगते हैं. तब इनके शीतकालीन प्रवास को देखते हुये माँ कहती “बेटा अब उच्च हिमालय जोहार घाटी में घवाप ह्युं (बर्फ) पढ़ गयी होगी और जल्द ही हमारा गांव जलथ भी हिमपात के चपेट में होगा. लकड़ियाँ फाड़ कर अंदर रखना, मवेशी के लिये घास रखना, कद्दू रखना और बर्फ से बच्चे हुये मिर्च, लाई आदि के पौधों को भी ढंकना आदि तैयारियां कर ली जाती.

आखिर वह दिन भी आ ही जाता जब बर्फबारी शुरू हो जाती. चारों तरफ बिखरी सफेदी से जल, जंगल, जीवन श्वेत दुग्ध रंग के दिखने लग जाते. सभी को उम्र के अनुरूप घर के काम बांट दिए जाते. बर्फबारी होने पर खेतों, फलदार पेड़ों को कौन बचाएगा, जानवरों  को चारा कौन देगा. फलदार पेड़ों में नींबू, माल्टा लगे होते हैं और टहनियों पर बर्फ के अतिरिक्त भार से टूटने का खतरा रहता है. समय रहते पेड़ों से बर्फ गिरा दी जाती है.

बर्फबारी के बाद भोजन श्रेणी में भी बदलाव किया जाता है. कद्दू, तिमूर का साग ओर भात पकाया जाता है, जो हमारे शरीर के तापमान को गरम बनाये रखता है. बर्फ़बारी के बाद के दिनों सूरज की रोशनी में भी आंख भी चुंधियाने लगती है. फिर धीरे-धीरे बर्फबारी बंद हो जाती है. पहाड़ के लोगों का पहाड़ सा जीवन निरन्तर चलता रहता है. चरवाहे अपने मवेशियों को सूखी घास खिलाते हैं, समय मिले तो दगरियों के साथ जाकर बकरियों, भेड़ों के लिये बांज के कुछ नये कोंपल लाते हैं. मवेशियों में भेड़-बकरियाँ सूखी घास कम ही खाती हैं ये अमूमन पेड़ों, कंटीली झाड़ियों की कोंपलें व नयी पत्तियां ज्यादा पसन्द करती हैं. इस तरह समय चक्र घूमता रहता है. फिर धीरे-धीरे कुछ दिन के हिमपात के बाद बर्फ पिघल जाती है. शीत का मौसम भी बदलने लगता है. बसंत के फुहार के साथ ग्रीष्म ऋतु का आगाज भी हो जाता है.
(Winter in Uttarakhand)

जोहार घाटी में मिलम के करीबी गांव जलथ के रहने वाले प्रयाग सिंह रावत वर्तमान में उत्तराखण्ड सरकार में सेवारत हैं. हिमालय और प्रकृति के प्रेमी प्रयाग उत्तराखण्ड के उत्पादों और पर्यटन को बढ़ावा देने के कई उपक्रमों के सहयोगी हैं.

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Sudhir Kumar

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  • छिला दीगो ला, भोते भल, ऐल साल त भोकू ह्यू पड़े नि हो। आब तो मौसम बदली ग्वेछ हो दाज्यू।

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