बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर ‘ग्राम स्वराज’ का महत्व लोगों को बता रहे थे. ऐसा राज जो स्वशासन, सहभागिता और अधिकारों पर आधारित था. यह 1930 का दशक था. ठीक इसी समय देश के उत्तरी हिस्से के एक वन क्षेत्र में कुछ लोगों की बसासत शुरू हो रही थी. ये लोग उच्च और मध्य हिमालय के दुश्वार जीवन से थककर बेहतर संभावनाओं की तलाश में यहां बस रहे थे. (The biggest village Uttarakhand)
विडंबना है कि इस गांव के बसने के करीब सौ साल बाद भी दुश्वारियों ने यहां के लोगों का पीछा नहीं छोड़ा है. समूचे देश के लिए जिस स्वशासन और अधिकार की कल्पना की गई थी, वह इस गांव के लोगों को आज तक पूरी तरह नसीब नहीं हो सका. करीब पांच दशकों से ये लोग अपनी इस बसासत को राजस्व ग्राम घोषित कराने के लिए संघर्षरत हैं.
उत्तराखंड की सबसे ज्यादा आबादी वाले इस गांव का नाम बिंदुखत्ता है. लगभग 3500 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस गांव की आबादी विभिन्न अनुमानों के अनुसार 75 हजार से 1 लाख के बीच मानी जाती है. कुमांऊ का प्रदेशद्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी से करीब 15 किलोमीटर दूर और नैनीताल-उधमसिंह नगर जिलों की सीमा पर बसा यह गांव कुमाऊं और गढ़वाल दोनों तरफ के पहाड़ों से पलायन कर आए बाशिंदों की प्राथमिकता रहा है.
आजादी के बाद देश ने पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर बदलती आर्थिक नीतियों तक अनेक दौर देखे. लेकिन किसी कालखंड में ठहर से गए बिंदुखत्ता की प्रशासनिक स्थिति वही की वही रही. आज भी राजस्व ग्राम का दर्जा न होने की वजह से यह गांव ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’, ‘हर घर जल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं से वंचित रहा है. खेतिहर जमीन पर मालिकाना हक न होने से यहां के निवासियों को आत्मनिर्भर होने के लिए बैंकों से लोन नहीं मिल पाता.
प्रशासनिक उपेक्षा की विडंबना के बावजूद गांव ने अपनी सामाजिक-आर्थिक संरचना ठीकठाक विकसित की है. खेती और पशुपालन के अलावा यहां के लगभग हर घर या हर दूसरे घर में एक बाशिंदा सरकारी नौकरी (अधिकतर सेना, अर्धसेना या पुलिस बल में) है. उधम सिंह नगर स्थित सिडकुल भी यहां के निवासियों के लिए रोजगार का एक साधन बनकर उभरा है. छोटी खेतिहर जोतों वाले इस गांव ने बिजली और पक्की सड़कों के लिए भी धैर्य से दशकों तक इंतजार किया है. गांव के लगभग नब्बे फीसदी से अधिक पक्के घर हैं. लगभग हर घर में शौचालय है. आंगनबाड़ी केंद्र, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, पुलिस थाना, बैंक और एटीएम जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर मालिकाना हक अब भी नहीं है.
संभावनाओं की दृष्टि से यह आदर्श गांव बन सकता है. अपराध दर न्यूनतम है, अधिकांश सड़कें पक्की हैं, कृषि उत्पादों का बाजार आवागमन सुलभ है, जनसंख्या अपेक्षाकृत शिक्षित व रोजगारयुक्त या आत्मनिर्भर है, स्वच्छता, हरियाली व सांस्कृतिक केंद्र भी मौजूद हैं. उत्तराखंड के पुराने गांवों की जाति आधारित बसावट को यह गांव भले ही पूरी तरह न तोड़ पाया हो, लेकिन अपने बसने के क्रम में इसने कुछ सीमा तक ऐसा किया है.
हालांकि, राज्य स्तरीय कुछ समस्याएं यहां भी हैं. युवाओं के पास विविध और स्थायी रोजगार का अभाव है. गौला नदी के किनारे बसी आबादी को हर बरसात में कटान का सामना करना पड़ता है. लालकुआं स्थित पेपर मिल ने जहां रोजगार दिया, वहीं जल, मृदा और वायु प्रदूषण की समस्या भी खड़ी की है.
वैसे, बसावट के समय से ही इस गांव के सिर पर उजड़ने का खतरा भी लगातार बना रहा. कहा जाता है कि अस्सी के दशक में जब इस गांव को ध्वस्त करने के लिए अर्धसेना तैनात की गई तो पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने आश्वासन दिया था कि यदि बिंदुखत्ता पर बुलडोजर चला, तो पहले उनके ऊपर से गुजरेगा. यही बात बीती 18 फरवरी को हुए बिंदुखत्ता क्षेत्र में हुए आंदोलन में आए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी दोहराई जहां, पूर्व कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल भी मौजूद थे. दूसरी ओर, क्षेत्र के मौजूदा विधायक मोहन सिंह बिष्ट इस मुद्दे को आगामी विधानसभा सत्र में उठाने की तैयारी में जुटे हैं.
नारायण दत्त तिवारी यहां हुई चुनावी रैली में आंसू बहाकर सीट जीत चुके हैं तो अटल बिहारी वाजपेयी और शत्रुघ्न सिन्हा ने यहां की धूल चखी है. तब इस गांव में पक्की सड़कें नहीं होती थीं और कारें या हेलीकॉप्टर धूल का बवंडर बना देते थे. तब से लेकर अब तक सत्तारूढ़ और विपक्षी दल बारी-बारी से इसे चुनावी वादा और ज्वलंत मुद्दा बनाते रहे हैं. महत्वपूर्ण वनक्षेत्र पर बसे इस गांव की आबादी बढ़ती रही लेकिन शुतुरमुर्गी राजनीति से यह गांव अधर में ही लटका हुआ है.
आज भारत स्वंय को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है. गांधी का मानना था कि लोकतंत्र की जड़ें गावों में होती हैं. पंचायती राज व्यवस्था इसी विचार की उपज मानी जाती है. बिंदुखत्ता के लोग आज अपने मताधिकार से सांसद और विधायक को तो चुन सकते हैं, लेकिन अपनी पंचायत का गठन नहीं कर सकते. यही विडंबना है, जिसने इस गांव को अपनी पहचान के लिए आधी सदी से आंदोलनरत रखा है. (The biggest village Uttarakhand)
(लेखक भारत सिंह पेशे से पत्रकार हैं. उनके बचपन से लेकर दो दशक तक का समय बिंदुखत्ता में बीता है.)
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