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फूल, तितली और बचपन

बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि बचपन की दुनिया ख्यालों और ख्वाबों से भरी होती है. मेरी बचपन की दुनिया भी बहुत खूबसूरत हुआ करती थी. (Flowers Butterflies and Childhood)

बचपन का ठिकाना इस भौतिक दुनिया में होकर भी अलग था. वह ठिकाना सही गलत की राहों के परे हुआ करता था. उस ठिकाने का आसमान बहुत साफ था. जंगल में पढ़ती सूरज की किरण धानी रंग की हुआ करती थी. जमीन पर ढेर सारे फूल और आसमान में रंग-बिरंगी तितलियां उड़ती थीं. उस वक्त तितलियां और फूल बहुत आजाद थे. आसमान में न चील-कौवो का डर था और न ही फूल के पौधों की जड़े गमलों में अटकी पड़ी थी.

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तितलियां अक्सर आसमान छोड़कर मिलने आ जाया करती थी फूलों से जमीन पर और पूरा दिन तितलियां फूलों के ही साथ रहती थी. लगता था जैसे फूलों में ही तितलियों का असली घर है. लेकिन जमीन पर फूलों के अलावा हथेलियां भी रहती थी. जिन्हें लगता था कि ये धरती उनकी, ये आसमान उनका. ये हवा उनकी, ये पानी उनका.

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हथेलियां सोचती थीं कि हर खूबसूरत चीज पर उनका हक हो. हथेलियां चाहती थी की तितलियां भी उन पर आकर बैठे. पर तितलियां जानती थीं कि उनके सच्चे दोस्त कौन है और वह ये भी जानती थी की हथेलियो की फितरत ही होती है मुट्ठी भींचना. इसलिए वह किसी हथेली पर जाकर नहीं बैठीं. धीरे-धीरे हथेलियों को तितलियां और फूलों का साथ होना खटकने लगा. तितलियों का उनकी तरफ न आना उनके घमंड को ठेस पहुंचाने लगा. बदले की आग में हथेलिया रंजिश बुनने लगीं और फूलों को तोड़कर अपने हाथों पर सजना शुरू कर दिया. फूलों के पीछे छुपी हथेलियां इंतजार करती थीं कि कब कोई तितली फूल पर आकर बैठे और वह मुट्ठी में मसल कर उन्हें मार डाले. और ऐसा ही हुआ, मरे फूलों मे छुपी हथेलियों पर तितलियां आकर बैठने लगी और धूर्त हथेलियों ने उन्हें बड़ी क्रूरता से मसल कर मार डाला.

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और इस तरह फूलों की लाशों पर तितलियां मर गयीं. हथेलियां ने फूलों और तितलियों को मार डाला.

अब उस ठिकाने का आसमान पीला पड़ चुका है. वहां सिर्फ कौवे और चीले उड़ती हैं. जंगलों में अब सूरज की किरण नहीं पड़ती क्योंकि जंगल ही कट चुके हैं. जमीन पर फूलों की पंखुड़ियां और तितलियों के पंख मिट्टी बन चुके हैं और हवा में धूल कणों का सुनहरापन फूलों व तितलियों की कब्र में शामिल होकर विलुप्त हो गया.

ख्वाहिशें बुझने लगीं और ख्याल मरने लगा. इसी के साथ बचपन सुन्न होने लगा. वो ठिकाना छोड़ अब हम सही गलत की राह पर रहते हैं और इस कहानी के घटते-घटते हम बड़े हो चुके हैं. (Flowers Butterflies and Childhood)

रामनगर की रहने वाली उपासना वैष्णव देहरादून से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद अभिनय की दुनिया में अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्ष की अगली मंजिलों पर कदम रख चुकी हैं. उपासना एक अच्छी अभिनेत्री होने के साथ ही अपने भावों को शब्द देने में भी बेजोड़ हैं.

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Sudhir Kumar

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