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अनूठी शान है कुमाऊनी महिला होली की

यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग अलग अंचलों में इस पर्व की विविधता देखने को मिलती है. उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में होली का विशिष्ट स्वरूप दृष्टिगोचर होता है. इस अंचल में परम्परागत होली का स्वरूप नए-नए स्वरूपों में भागदौड़ वाली नई पीढ़ी के बीच भी जारी रहना संस्कृति संरक्षण की दिशा में एक सुखद अहसास दिलाता है.

कुमाऊं अंचल में पौराणिक काल से ही होली मनाने के प्रमाण मिलते हैं. मदनोत्सव, बसंतोत्सव होली के ही स्वरूप हैं. ऐतिहासिक रूप से ग्यारहवीं शताब्दी के बाद जब कुमाऊं में कबीलाई शासकों का पराभव हुआ तो समाज और संस्कृति का नया स्वरूप मुखरित हुआ और संस्कृति से जुड़ा होली पर्व भी लगभग तभी से यहां के समाज में प्रचलित माना जाता है. कुमाऊं अंचल में महिला और पुरुष होली दोनों को विशेष रूप से आयोजित होती हैं, सिर्फ अंतर इतना है कि पुरुष होली जो कि पौष के पहले इतवार से आरम्भ हो जाया करती है महिलाओं की होली की रंगभरी एकादशी के बाद से ही शुरुआत होती है. 

कुमाऊं अंचल की एक और विशिष्टता ये भी है कि यहां के अधिकांश पर्व और त्यौहार थान परंपरा के पोषक रहे हैं. अर्थात मुख्य पर्व गांव के भूमि देवता, कुल देवता के थान पर या थान से ही आरंभ होते हैं. पूजा स्थलों का मंदिर नामकरण अत्याधुनिक मालूम देता है अर्वाचीन परंपरा में देवस्थलों को थान ही कहा जाता था. देवी थान, द्याप्त थान, गोलज्यू थान जैसे शब्द यहां के समाज में अपनेपन का आभास भी कराते हैं. कुमाऊनी समाज में मंदिर शब्द प्रचलन में होने के बाद भी आयातित जैसा ही प्रतीत होता है.

रंग एकादशी के दिन गांव की महिलाएं ग्राम देवता के थान में एकत्रित होकर होली की शुरुआत करती हैं. कुमाऊनी होली गायन में देव आराधना का पुट ही देखा जाता है.होली गायन के बहाने सिद्धि दाता गणेश, कन्हैया, राम रघुवीर, शिव, देवी आदि की स्तुतियां ही होली का एक स्वरूप हैं और इसी के बीच में हास परिहास जुड़ा रहता है.

बहुधा ग्राम देवता थान का प्रांगण या फिर कहीं सार्वजनिक आंगन या खेत में होली का अखाड़ा (जिसे होईक खई कहते हैं) बनता है पुरुषों की होली टोली दिन भर घर घरों में होली गायन कर रात्रि में अखाड़े में होली गायन करती है जबकि महिलाएं दिन के समय होली गायन कर अखाड़े में स्वांग रचाती हैं. होली चतुर्दशी के दिन अखाड़ा भेंटना एक अनिवार्य रस्म मानी जाती है. कुमाऊं के अलग-अलग ग्रामों में महिला होली गायन के अलग अलग स्वरूप देखे जाने लगे हैं कुछ गांवों में महिला टोलियां घर घर होली गायन करती हैं जबकि कुछ स्थानों पर दिन के समय सभी महिलाएं होली के अखाड़े में एकत्रित होकर होली गायन करती हैं.

होली के दिन महिलाओं के स्वांग साहित्य की व्यंग्य विधा का उदात्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.कुमाऊनी होली का सुखद पक्ष ये है कि नई पीढ़ी ने भी इस परंपरा को हू-ब-हू आत्मसात किया है. अलग-अलग स्थानों में आयोजित होने वाली होली गायन प्रतियोगिताओं, सार्वजनिक आयोजनों और सोशल मीडिया के ग्लैमर ने भागदौड़ वाली दिनचर्या के बीच नई पीढ़ी को होली की परम्परागत संस्कृति के साथ जोड़े रखा है.

बागेश्वर, गरुड़ के निवासी हरीश जोशी का लम्बा पत्रकारिता अनुभव है. अपने इस सफ़र उन्होंने अनेक किताबों और पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया. उनसे उनकी ईमेल आईडी harishjoshi1969@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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