फोटो : भगवान घिमिरे की फेसबुक वाल से साभार
हर समाज में किसी प्रियजन की मौत पर शोक व्यक्त करने के अपने तरीके हैं. इसी तरह कुमाऊं में इसके अपने तरीके हैं. यहॉ किसी की मृत्यु के दिन से बारह दिन का शोक मनाने की परम्परा है. बारहवें दिन पीपल को काले तिल, जौ, कच्चा दूध मिला हुआ जल चढ़ाने के साथ ही शोक की अवधि समाप्त हो जाती है. इस दिन को पीपलपानी कहते हैं. उससे पहले दस दिन तक पूरी बिरादरी को सूतक रहता है.
(Traditional Customs of Kumaon)
बिरादरी में भी पीढ़ियों के अनुसार एक दिन, तीन दिन व दस दिन का सूतक होता है. सूतक के दौरान हर घर में पूजा-पाठ, व्रत व दूसरे शुभ कार्यों पर रोक रहती है अर्थात् उन्हें निषिद्ध माना गया है. सूतक वाले परिवार के सदस्य दूसरे के शुभ कार्यों में भी भागीदारी नहीं करते हैं. सूतक में नवे दिन तक ईष्ट-मित्र व बिरादरी के लोग “मैल देने” भी जाते हैं. जिसमें विभिन्न प्रकार के फल, चाय पत्ती, चीनी, काजू, मेवे, घी, मिश्री (कुमाऊं में मिलने वाली विशेष मीठी मिश्री), मुनक्के, मखाने आदि ले जाते हैं. कुछ लोग इन वस्तुओं के बदले में अपनी इच्छानुसार रूपए भी क्वाड़ में बैठे व्यक्ति के पास रखी थाली में रख देते हैं. खाद्य वस्तुओं को उस दौरान आने वाले व्यक्तियों में ही बांट दिया जाता है जबकि रूपयों को क्रिया व पीपलपानी के समय दान की जाने वाले सामान की खरीद में लगा दिया जाता है.
मैल देने के लिए केवल मंगलवार, वृहस्पतिवार व शनिवार को ही जाते हैं. वैसे समय न मिलने पर अन्य दिन भी कुछ लोग जाते हैं. इन तीन दिनों में मैल देने वालों की भीड़ सूतक वाले घर में लगी रहती है. सूर्यास्त के बाद मैल देने नहीं के बराबर जाते हैं. कई लोग सूतक वाले घर में चाय-पानी तक नहीं पीते हैं. जो लोग मैल देने जाते हैं उन सब का नाम एक कापी में नोट किया जाता है. उन सब को पीपलपानी में व वार्षिक श्राद्ध में अवश्य बुलाया जाता है.
तिलांजलि का मतलब है तिल, जौ, कुश के साथ जल की अंजलि मृतात्मा को देना. जिसे आप मौत के तीसरे, पॉचवे, सातवें व नवे दिन से शुरू कर सकते हैं. दसवें दिन तिलांजलि देने का कार्य समाप्त हो जाता है. परिवार व बिरादरी के जनेऊ धारण करने वाले पुरूष व विवाहित महिलाएँ ही तिलांजलि दे सकते हैं. तिलांजलि देने वाले उन पुरूषों को मुंडन करना पड़ता है जिनके मॉ व पिता में से किसी एक की भी मृत्यु हो चुकी हो. जिस पुरूष के मॉ-पिता जीवित हों वह मुंडन नहीं कर सकता है हॉ तिलांजलि दे सकता है.
परिवार का जो व्यक्ति मृतक की क्रिया करता है उसे ‘क्वाड़ में बैठना’ कहा जाता है. उसके लिए मृत व्यक्ति के रहने वाले कमरे के एक कोने में जमीन में बिस्तर लगाया जाता है. जिसके ऊपर कंबल जरूर बिछाया जाता है. क्वाड़ के एक कोने में तिल के तेल का एक दीया सूतक के दौरान लगातार जलता रहता है. क्रिया करने वाले व्यक्ति को दिन-रात इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह दीया बुझे नहीं. सम्बंधित परिवार के मुंडन किए सदस्य उल्टे किए गए कपड़े पहनते हैं. क्वाड़ में बैठा व्यक्ति एक समय भोजन करता है और अपना भोजन स्वयं बनाता है. शहरों में अब यह परम्परा टूट रही है. संबंधित व्यक्ति की पत्नी भोजन बनाने लगीं हैं.
परिवार के वयस्क सदस्य भी एक ही समय भोजन करते हैं और यह ढलते हुये दोपहर के समय ही अधिकतर किया जाता है. भोजन पूरी तरह सादा किया जाता है. उसे बनाने में हल्दी, छौंक लगाने की मनाही होती है. दसवें दिन की क्रिया के बाद ही छौंक लगाने व हल्दी डालने की अनुमति होती है. क्रिया करने वाला व्यक्ति सूतक के दिनों में नंगे पैर ही रहता है. वह चप्पल व जूते नहीं पहन सकता है.
क्रिया का कर्म करवाने वाले पुरोहित पर भी सूतक की छूत रहती है. वे किसी अन्य घर में शुभ कार्यों को सम्पन्न नहीं करवा सकते हैं. पीपलपानी के बाद ही वे इस बंधन से मुक्त होते हैं. इसी कारण कई पुरोहित क्रिया के कर्म नहीं करते हैं. वे अपने शिष्यों से जजमानों के यहॉ क्रिया के कर्म करवाते हैं.
क्वाड़ में बैठे व्यक्ति को कोई छूता नहीं है. उसके बिस्तर के चारों ओर गाय के गोबर से घेरा बनाया जाता है. जिसे बाड़ लगाना कहा जाता है. यह बाड़ दसवें दिन तोड़ी जाती है. क्वाड़ में बैठा व्यक्ति कुर्सी, पलंग, सोफे, चारपाई आदि में नहीं बैठ सकता है. हॉलाकि पैरों की बीमारी की स्थिति में कुर्सी का प्रयोग किया जा सकता है. सूतक वाला परिवार दूध की चाय भी नहीं पीता है. लहसुन-प्याज भी इस दौरान निषिद्ध रहता है. गीत-संगीत सुनने व गाए जाने पर भी रोक रहती है. बिरादरी व ईष्ट-मित्रों में ढोग (अभिवादन करने) देने पर भी प्रतिबंध रहता है.
(Traditional Customs of Kumaon)
बारहवें दिन पीपल को जल चढ़ाने व कुलपुरोहित द्वारा तिलक-अक्षत लगाने के बाद ही छोटों के द्वारा रिश्ते में बड़े लोगों को दोनों हाथ जोड़कर पैर छूने के साथ ही सूतक वाले परिवार व बिरादरी में “ढोग” शुरू हो जाती है. पीपलपानी के बाद मृतक की गणना पित्रों में की जाने लगती है. पीपलपानी से पहले यदि बिरादरी में किसी अन्य की मौत हो जाय तो पहले मृत व्यक्ति का पीपलपानी भी बाद में मृत व्यक्ति के पीपलपानी के साथ ही होता है. इस बीच परिवार व बिरादरी में किसी बच्चे का जन्म हो जाय तो सूतक के दौरान नामकरण नहीं हो सकता है. उसका नामकरण संस्कार पीपलपानी के बाद ही होता है. सूतक वाले परिवार में वार्षिक श्राद्ध होने तक कथा व विवाह नहीं होते हैं.
पीपलपानी के बाद क्वाड़ बैठने वाला (मृतक की क्रिया करने वाला) वार्षिक श्राद्ध तक बारसी में भी बैठता है. वह व्यक्ति साल भर तक मॉस-मदिरा-लहसुन-प्याज व कई दूसरी वस्तुओं का सेवन नहीं करता है और घर के बाहर का भोजन-पानी भी उसके लिए निषिद्ध होता है. वह साल भर दाढ़ी-बाल भी नहीं बनाता है. ऐसे व्यक्ति को देखकर आसानी से पता चल जाता है कि वह बारसी में बैठा है. वार्षिक श्राद्ध के दिन उसके दाढ़ी-बाल कटते हैं. इस व्यक्ति को प्रतिदिन सवेरे नहाने के बाद गाय को गग्रास देना होता है. उसके बाद ही वह भोजन ग्रहण कर सकता है.
पिता की मृत्यु पर सालभर दही व मॉ की मृत्यु पर सालभर के लिए दूध व उससे बनी वस्तुएँ निषिद्ध होती हैं. वार्षिक श्राद्ध के लिए ईष्ट-मित्रों व उन लोगों को निमंत्रण दिया जाता है जो लोग व्यक्ति की मौत के बाद सूतक के दौरान शोक व्यक्त करने घर में आते हैं. वार्षिक श्राद्ध पर बिरादरी व परिवार की विवाहिता बेटियों को अवश्य निमंत्रण दिया जाता है और उन्हें पिठ्ठॉ (उपहार) के रूप में कपड़े दिए जाते हैं.
वार्षिक श्राद्ध के बाद सम्बंधित व्यक्ति का साल में दो बार श्राद्ध किया जाता है. पहला श्राद्ध उस दिन होता है जिस तिथि (तारीख नहीं) को व्यक्ति की मृत्यु हुई होती है. इसे तिथि का श्राद्ध कहते हैं. दूसरा श्राद्ध पित्र पक्ष में किया जाता हैं जिन्हें सोलह श्राद्धों के नाम से जाना जाता है.
(Traditional Customs of Kumaon)
काफल ट्री के नियमित सहयोगी जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं. अपने धारदार लेखन और पैनी सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं.
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