वसंत आ गया है. महाकवि पद्माकर लिख गए हैं- बनने में,बागन में, बगरो बसंत है! हां, आसपास पेड़-पौधों और फुलवारियों में सब जगह लाल, पीले, नीले, गुलाबी और बैंगनी फूल खिलने लगे हैं. कचनार के श्वेत-गुलाबी फूलों ने ऋतुराज वसंत की अगवानी की है. श्याम की बाट जोही जा रही है- अंगना फूली कचनार श्याम नहि महलों में! उधर आसमान की ओर शाखों की बांहें उठाए शाल्मली यानी सेमल को वसंत के आने की खबर मिल गई है. उसके लाल, सिंदूरी कटोरी जैसे फूल खिल-खिलाने लगे हैं. उसके वृक्षों पर पंछियों की चहचहाहट बढ़ गई है. फूलों के रसपान के लिए तरह-तरह के पंछी आ रहे हैं.
(Spring Season)
जंगल की ज्वाला यानी ढाक या पलाश के तो कहने ही क्या! पेड़ में एक भी पत्ती नहीं और वह गहरे सिंदूरी रंग के फूलों से लद गया. दूर से लगता है जैसे जंगल में आग की ज्वाला धधक रही है. तभी तो जंगल की ज्वाला कहलाया यह. और हां, इसके फूल तो देखिए, तोते की चोंच जैसे हैं! इसीलिए पलाश का एक नाम किंशुक भी है. किंशुक यानी तोता या शुक.
कुछ पेड़ों की शाखों के सिरे अंगुलियों जैसे सुर्ख फूलों से सज गए हैं. ‘इंडियन कोरल ट्री’ यानी पांगरी है यह. और, घरों के आस-पास या सड़कों के किनारे नीले-जामुनी स्वप्निल फूलों का श्रृंगार करने की तैयारी में है जैकरेंडा यानी नीला गुलमोहर! खिलने के बाद दूर से देखने कर लगेगा जैसे उस पर्णविहीन पेड़ पर कोई नीला बादल आकर बैठ गया हो! कहीं किसी किनारे झुकी-झुकी शाखों वाले बॉटलब्रुश के वृक्षों पर ब्रुश जैसे लंबे, सुर्ख फूल झूलने लगे हैं.
क्यारियों में गेंदा, डहेलिया, पिटूनिया, पेंसी, डाएंथस, डेल्फीनियम, नेस्टरशियम, हॉलीहॉक, कॉस्मॉस और कलेंडुला के फूलों की बहार आ गई है. जल्दी ही गंधराज और बेला के फूल भी हवा में अपनी खुशबू बिखेरने लगेंगे. दूर पहाड़ों में प्योंली खिल गई होगी. वन-वन बुरांश खिलने लगेंगे.
चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों की बहार. लेकिन, इन्हें खिलने का संदेश कौन दे रहा है? इन्हें कैसे पता लगता है कि वसंत आ गया है और अब इन्हें खिलना है? वनस्पति विज्ञानी बताते हैं कि यह संदेश कुछ खास तरह के रसायन यानी ‘एंटिजन’ देते हैं. शीत ऋतु की विदाई के बाद जब धीरे-धीरे तापमान बढ़ने लगता है तो ये खास रसायन पेड़-पौधों की शाखाओं के कोने-कोने में कलियों को चुपचाप यह संदेश देने लगते हैं कि अरी उठो, जागो कलियो, जागो वसंत आ गया है! दिनों-दिन तापमान बढ़ता है और कलियां खिलकर खिलखिलाने लगती हैं.
(Spring Season)
लेकिन, फूलों की पंखुड़ियों में भला रंग कौन भर देता है? कौन है वह रंगरेज? यह काम भी रसायन ही करते हैं. ये रंगरेज रसायन रंजक या रंगद्रव्य कहलाते हैं. अंग्रेजी में पिगमेंट. दो तरह के होते हैं ये- फ्लेविनोइड और कैरोटिनोइड और पंखुड़ियों की कोशिकाओं में पाए जाते हैं. फ्लेविनोइड रसायन फूलों में लाल, गुलाबी, जामुनी और नीला रंग भर देते हैं. इनमें ऐंथोसाइनिन प्रमुख रसायन है. कैरोटिनोइड रसायन फूलों में पीला और नारंगी रंग भरते हैं. यानी-
लेकिन, रसायन पंखुड़ियों में आखिर रंग कैसे भरते हैं?
निराला
कूंची तुम्हारी फिरी कानन में
फूलों के आनन-आनन में!
प्रकृति चितेरी ने बगिया-बगिया के खिले फूलों में अपनी कूची से रंग भर दिया है! प्रकृति की यह कूची और रंग वही रंजक रसायन हैं जिनके कारण फूल हमें रंगीन दिखाई देते हैं. और, इसका रहस्य छिपा है प्रकाश में. प्रकाश में सात रंग होते हैं- बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल. जब प्रकाश रंगरेज रंजक रसायनों पर पड़ता है तो उसके सात रंगों में से कुछ रंगों को वे सोख लेते हैं. बाकी प्रकाश लौट कर हमारी आंखों में पड़ता है. हमें अपनी आंखों तक पहुंचा हुआ वही रंग दिखाई देता है और फूल हमें उस रंग का लगता है.
करोड़ों वर्ष पहले हमारी धरती पर फूल नहीं थे! तब दुनिया में चारों ओर दलदल था और उसमें मॉस तथा फर्न के बड़े-बड़े पेड़ उगते थे. फूलदार पेड़-पौधों का जन्म तो बारह-चौदह करोड़ वर्ष पहले ही हुआ. आज धरती पर करीब तीन लाख 70 हजार प्रजातियों के फूलदार पेड़-पौधे हैं. धरती पर जब फूल खिल उठे तो उन्होंने हमारे आदिमानव पुरखों का मन भी मोह लिया होगा. आगे चल कर जब हमारे पुरखों ने पढ़ना-लिखना सीखा तो उन्होंने फूलों की सुंदरता पर खूब कविताएं लिखीं. आज भी फूलों पर खूब कविताएं लिखी जा रही हैं. कवियों ने कविताएं लिखीं और फूलों पर मुग्ध होकर चित्रकारों ने उनके खूबसूरत चित्र बनाए.
(Spring Season)
धीरे-धीरे फूल प्यार का प्रतीक बन गए. फूलों की सौगात देकर प्यार का इज़हार किया जाने लगा. फूलों के गुच्छे देकर, उनकी माला पहना कर स्वागत किया जाने लगा. फूलों से घर-आंगन सज गए. फूलों से ही शुभकामनाएं दी जाने लगीं. इस तरह हमारी संस्कृति में फूल रस-बस गए. स्वीडन के एक प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी थे- कारोलस लिनीयस. उन्होंने जब पहली बार कहा, फूल भी प्यार करते हैं, उनमें भी नर और मादा अंग होते हैं तो लोग उनकी यह बात सुन कर हंसने और मखौल उड़ाने लगे. मगर सच तो सच था.
यह साबित हो गया कि फूल भी नर और मादा होते हैं. सच तो यह है कि वसंत फूलों के लिए भी प्यार का मौसम है. फूलों में उनके वर-वधू होते हैं और पुरोहित कीट-पतंगे वधू को पुंकेसर के पराग का टीका लगा कर उनका ब्याह रचाते हैं. यानी, फूल प्यार करने और अपना ब्याह रचाने के लिए खिलते हैं! वे अपने रंगों और सुगंध से परागण करने वाले कीट-पतंगों तथा पक्षियों को आकर्षित करते हैं. विवाह यानी परागण के कारण फूलों में बीज बनते हैं. बीज मिट्टी में गिरते हैं. नमी पाकर अंकुरित होते हैं और उनसे फूलदार पेड़-पौधों की नई पीढ़ी तैयार हो जाती है.
बस, याद रखिएगा कि वसंत हमारे ही नहीं बल्कि फूलों के भी प्यार का मौसम है. आओ प्यारे वसंत, तुम्हारा स्वागत है!
(Spring Season)
वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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