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शराब माफिया द्वारा मार डाले गए हिम्मती पत्रकार उमेश डोभाल की कविताएं

17 फरवरी 1952 को उत्तराखंड के पौड़ी जिले में जन्मे उमेश डोभाल को एक निर्भीक पत्रकार के रूप में याद किया जाता है. एक पत्रकार होने के अलावा वे अच्छे कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. (Umesh Dobhal Martyred Journalist Poems)

पहाड़ में बढ़ रहे अवैध शराब के प्रचलन के खिलाफ चल रहे तमाम आन्दोलनों में उनकी भागीदारी रहती थी जिसके चलते वे इस धंधे में लगे माफिया की नज़रों में काँटा बन कर खटने लगे थे. यह कुमाऊं क्षेत्र से शुरू हुए ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन के बाद का समय था जब शराब पर नकेल कसने की मांग बसभीड़ा नाम की एक छोटी सी बसासत से तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पहाडी इलाकों में आग की तरह फ़ैल चुकी थी. विवश हो कर सरकार को पर्वतीय जिलों में शराब पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा था. 1987-88 के आसपास शराब माफिया की न्सक्रिय्ता और दबाब के चलते सरकार को शराब के ठेके फिर से करवाने पड़े. इस फैसले से आहत उमेश डोभाल ने पौड़ी जिले में अवैध शराब के कारोबार को लेकर धारदार लेख लिखना शुरू किया. इस कारण स्थानीय शराब व्यवसायी के कारोबार पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ने लगा. (Umesh Dobhal Martyred Journalist Poems)

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25 मार्च 1988 को शराब माफिया के लोगों ने उनकी नृशंस ह्त्या कर डाली. इस घटना से समूचा उत्तराखंड बुरी तरह दहल गया था जिसके विरोध में राज्य भर के पत्रकार एकजुट हुए.

जनता के बीच मुक्ति और अधिकारों की अलख जगाने वाले उमेश डोभाल को आज भी उनके विचारों और पक्षधरता के लिए बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है. उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में उमेश डोभाल सम्मान की स्थापना की गयी जिसमें पुरुस्कार के तौर पर हर वर्ष एक युवा पत्रकार को सम्मानित किया जाता है.

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आज हम आपको उनकी दो कविताओं से परिचित कराते हैं.

अब मैं मार दिया जाऊंगा

– उमेश डोभाल

मैंने जीने के लिए हाथ उठाया
और वह झटक दिया गया
मैंने स्वप्न देखे
और चटाई की तरह अपनों के बीच बिछा
उठा कर फेंक दिया गया

अंधेरी भयावह सुरंग में …
रोशनी
मैंने वहां भी रोशनी तलाश की
अब मैं मार दिया जाऊंगा
उन्हीं के नाम पर
जिनके लिए संसार देखा है मैंने

उमेश डोभाल (17 फरवरी 1952 – 25 मार्च 1988)

बसंत दस्तक दे रहा है

– उमेश डोभाल

सरपट भागते घोड़े की तरह नहीं
अलकनंदा के बहाव की तरह
धीरे धीरे आयेगा बसंत
बसंत की पूर्व सूचना दे रहे हैं

मिट्टी पानी और हवा से ताकत लेकर
तने से होता हुआ
शाखाओं में पहुंचेगा बसंत

अंधेरे में जहां आंख नहीं पहुंचती
लड़ी जा रही है एक लड़ाई
खामोश हलचलें
अंदर ही अंदर जमीन तैयार कर रही हैं
जागो! बसंत दस्तक दे रहा है

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