चार्ली चैप्लिन (Charlie Chaplin) के बहाने कुछ फिल्मों के कुछ फ्रेम्स की याद
एक फ्रेम है ‘सिटी लाइट्स’ मूवी में जिसमें ट्रैम्प (चार्ली चैप्लिन Charlie Chaplin) उस अंधी लड़की (वर्जीनिया शेरिल; फ़िल्म में भी नाम नहीं है, ‘अ ब्लाइंड गर्ल’ कहा गया है और समझिए कि सायास ऐसा किया गया है) की खिड़की के बाहर दिखने वाली सीढ़ियों पर बैठा हुआ है. जाने क्यों मेरे ज़हन से ये फ्रेम नहीं जाता. फ़िल्म में एक से बढ़कर एक फ्रेम्स हैं, सीक्वेंस हैं. ठठाकर हंसने वाले, जैसा कि चार्ली की मूवी में होते ही थे और दिल चीर देने वाले भी. लेकिन मेरे मन से ये तस्वीर नहीं उतरती. जाने क्यों. मैं वहीं अटक जाता हूँ. मैंने कल्पना में उसमें रंग भरे हैं, आवाज़ भरी है, ख़्वाब भरे हैं. फिर सब मिटाया भी है. उसे वैसे ही रहने भी दिया है. खुलने की कुछ बहुत कम सम्भावनाओं के साथ एक बंद खिड़की, गमला और उतरती हुई सीढियां. किसी नीचे के ज़ीने पर बैठा अंधी लड़की की आंख के खुलने की कल्पना खिड़की के खुलने की सम्भावना के बरक्स रखता हुआ एक लंबे कोट और हैट वाला अपना चार्ली. उफ़्फ़! बहुत बेचैन करता है ये आदमी. इसकी गरीबी बेचैन करती है, गरीबी के ऊपर फक्कड़पना आश्चर्य में डाल देता है और प्रेम! वैसे ये फ़िल्म सुखांत की है. लेकिन जिस ऊंचाई पर जाकर ख़त्म होती है वहां कोई ध्वनि नहीं जाती, दृष्टि तो पहले ही ठहर चुकी होती है, सिर्फ स्पर्श की भाषा पहुंच पाती है. जब अंधी लड़की, जिसकी आंखे आ चुकी हैं, ट्रैम्प के हाथ को अपने हाथ में लेकर उसे पहचान लेती है, आप भीग जाते हैं. अगर आप रोते नहीं तो…
अन्तस् भीगने का कोई और कारण भी हो सकता है क्या? सिटी लाइट्स एक और मूवी है जो हिंदी सिनेमा की है. नहीं! तुलना नहीं कर रहा. उसमें एक दृश्य है. बार का मालिक राखी को काम देने के लिए उसे दुपट्टा उतारने को कहता है, आगे-पीछे से चेक करता है. हम उस पीढ़ी से हैं जो ‘चेक आउट’ करने के खासे आपत्तिजनक मतलब निकालती थी. जब मैं इस दृश्य को देखता हूँ मेरी कनपटी की नस अजीब दिप-दिप करने लगती है. एक अजीब सी बेचैनी, बेचारगी, बदहवासी सी महसूस करने लगता हूँ. रोने का दिल करता है. ये रुलाई ग़रीबी और इस गरीबी की चौतरफा मजबूरी के कारण होती है. ये रुलाई प्रेम न मिल पाने की नहीं है. जैसे कि ‘सदमा’ के आखिरी शॉट में आती है.
‘सदमा’ में सोमू (कमल हासन) रेशमी (श्रीदेवी) को वापस आई यादाश्त में उस समय की याद दिलाने की कोशिश करता है जब उसकी यादाश्त खोई हुई थी. सिर पर एक देगची लगाए, बारिश में लड़खड़ाते भागते सोमू की बेबसी पूरी शिद्दत से आपको मजबूर करती है कि आप प्रेम के जाने का दर्द और चाहकर भी वापस न ला पाने की तड़प महसूस करें. रोएं. या देर तक ख़ामोश रह जाएं जैसे ‘पुष्पक विमान’ फ़िल्म में एक बेरोजगार युवक (कमल हासन) अपनी प्रेयसी, जादूगर की बिटिया (अमला) के जाते वक्त ठीक से बाय भी नहीं कह पाता (इसलिए नहीं कि सिटी लाइट्स की तरह ये फ़िल्म भी मूक फ़िल्म है) कागज़ पर लिखकर उसके दिए हुए पते को उड़ कर गटर में जाते देखता रह जाता है. फ़िल्म हमारे यहां की सबसे अच्छी कॉमेडी फिल्मों में से एक है लेकिन मेरे लिए फ़िल्म का आखिरी फ्रेम जिसमें एक गुलाब हाथ में पकड़े कमल हासन फिर से नौकरी के लिए लाइन में लगा दिखता है, सबसे अर्थपूर्ण और कचोटने वाला है. ये भरपूर व्यंजना से भरा दृश्य है. जैसा कि ‘सिटी लाइट्स’ का शुरुआती दृश्य जिसमें शहर के लोग ‘स्टेचू ऑफ़ पीस ईंद प्रोस्पेरिटी’ के अनावरण के लिए इकट्ठा होते हैं और शहर का एक मुअज्जिज व्यक्ति, सम्भवतः मेयर, एक स्पीच देता है जिसमें किसी मशीन जैसी आवाज़ होती है कोई बोल या भाषा हमारी समझ में नहीं आती. चार्ली चैप्लिन चाहते तो भाषा का इस्तेमाल कर सकते थे लेकिन जितनी व्यंजना इस अजीब सी आवाज़ वाली स्पीच की है, शब्द शायद ही वो भाव दे पाते.
पत्रकारों, राजनीति पर लिखने वालों और खास तौर पर व्यंग्य लिखने वालों को ‘सिटी लाइट्स’ या चार्ली चैप्लिन की अन्य सभी पिक्चरें अनिवार्य कर देनी चाहिए. एक दृश्य में आपको पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर करने वाला अगले ही फ्रेम में पूरी तरह से झिंझोड़ देता है. फ़िल्म के खत्म होने तक आप निचोड़ लिए जाते हैं. चुक जाते हैं और भर भी जाते हैं. जी हां, ऐसी ही कैफियत होती है. ज़ार-ज़ार हंसने की और ठठाकर रोने की. ऐसी ही अजीब. और हां, अगर आप रो नहीं सकते तो आपको हंसने का भी कोई हक़ नहीं.
अमित श्रीवास्तव
उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता).
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