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चंद्रकुंवर बर्त्वाल की दो कविताएं

गढ़वाल की मंदाकिनी नदी घाटी के मालकोटी गांव में भूपाल सिहं तथा जानकी देवी घर 20 अगस्त 1919 को जन्मे चन्द्रकुंवर बर्त्वाल (Chandrakunwar Bartwal) कुल 28 साल की आयु में दुनिया को विदा कह गए थे. प्रकृति को केंद्र में रख कर लिखी गयी उनकी कविताओं ने उन्हें अपने समय के बड़े हिन्दी कवियों की जमात में ला खड़ा किया था.

प्रस्तुत हैं इस कवि की दो रचनाएं:

चंद्रकुंवर बर्त्वाल

हिमशृंग

स्वच्छ केश रिषि से अँजलियाँ भर कमलों से
गिरि शृंगों पर चढ़ उदयमान दिनकर का
उपस्थान करते हैं मृदु गंभीर स्वरों में
स्निग्ध हँसी की किरणें फूट रही जग भर में

पुण्य नाद साँसों का पुलकित कर विपिनों को
मुखर खगों को, जमा रहा गृह-गृह में निंद्रा से
निश्चेष्ट पड़ी आत्मा को, मुक्त कर रहा
तिमिर-रूद्ध जीवन को पृथ्वी-मय प्रवाह को

द्वार खुल गए अब भवनों के, शून्य पथों में
शून्य घाटियों में सरिता के शून्य तटों पर
जाग उठीं जीवन समुद्र की मुखर तरंगें
पृथ्वी के शैलों पर, पृथ्वी के विपिनों पर

पृथ्वी की नदियों पर पड़ी स्वर्ण की छाया
उदित हुए दिनकर इनकी पूजा से घिर कर

पाँवलिया
(कवि का गृह ग्राम)

मेरे गृह से सुन पडती गिरि-वन से आती
हँसी स्वच्छ नदियों की, सुन पडती विपिनों की,
मर्मर ध्वनियाँ, सदा दीख पड़ते घरों से
खुली खिड़कियों से हिमगिरि के शिखर मनोहर,
उड़-उड़ आती क्षण- क्षण शीत तुषार हवाएँ,
मेरे आँगन छू बादल हँसते गर्जन कर,
झरती वर्षा, आ बसंत कोमल फूलों से,
मेरे घर को घेर गूँज उठता, विहगों के दल
निशी दिन मेरे विपिनो में उड़ते रहते ।

कोलाहल से दूर शांत नीरव शैलों पर,
मेरा गृह है, जहाँ बच्चियों-सी हँस-हँस कर,
नाच-नाच बहती हैं छोटी-छोटी नदियाँ,
जिन्हें देखकर, जिनकी मीठी ध्वनियाँ सुनकर,
मुझे ज्ञात होता जैसे यह प्रिय पृथ्वी तो,
अभी-अभी ही आई है, इसमें चिंता को
और मरण को, स्थान अभी कैसे हो सकता है ?

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