नेपाल के रहस्यमयी झांकरी : योगी, वैद्य, तांत्रिक या ओझा?

विश्व के लगभग हर महाद्वीप में ऐसे व्यक्ति पाए जाते हैं जिन्हें बीमारी, संकट और मानसिक असंतुलन से निपटने का विशेष अधिकार दिया जाता है. मानवशास्त्र में इन्हें सामान्यतः शामन कहा जाता है. साइबेरिया, मध्य एशिया, उत्तरी अमेरिका, अमेज़न और अफ्रीका के कई समुदायों में शामन ऐसे व्यक्ति होते हैं जो समाज और अदृश्य संसार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं. Mircea Eliade अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Shamanism: Archaic Techniques of Ecstasy में बताते हैं कि शामन की सबसे प्रमुख पहचान यह है कि वह “सामान्य चेतना” से बाहर जाकर अनुभव करने का दावा करता है और उस अनुभव को समुदाय की भलाई के लिए उपयोग करता है.

साइबेरिया के इवेंकी लोगों में शामन ढोल बजाकर आत्माओं से संवाद करता है; अमेज़न क्षेत्र में शामन वनस्पतियों के प्रयोग से रोग का कारण खोजता है; उत्तरी अमेरिका के कई मूल समुदायों में शामन स्वप्न और दृष्टियों के माध्यम से मार्गदर्शन देता है. इन सभी उदाहरणों में एक समान तत्व दिखाई देता है—बीमारी या संकट को केवल शारीरिक समस्या नहीं माना जाता, बल्कि सामाजिक और मानसिक असंतुलन के रूप में समझा जाता है. Michael Winkelman जैसे विद्वान बताते हैं कि ऐसी प्रणालियाँ वहाँ विकसित होती हैं जहाँ आधुनिक चिकित्सा की जगह सामुदायिक अनुभव मुख्य होता है.

इसी वैश्विक संदर्भ में हिमालयी क्षेत्र की शामनिक परंपराओं को देखा जाना चाहिए. नेपाल के पहाड़ी समाज, विशेषकर ख़स समुदाय, में यही भूमिका झाँकरी निभाता है. मानवशास्त्री Dor Bahadur Bista ने People of Nepal में लिखा है कि झाँकरी नेपाल के समाज में बीमारी और संकट को समझने का एक वैकल्पिक ढाँचा प्रस्तुत करता है, जो धार्मिक कर्मकांड और आधुनिक चिकित्सा—दोनों से अलग है.

नेपाल के झाँकरी की विशेषता यह है कि वह अपने आप को किसी धर्मग्रंथ से नहीं जोड़ता. उसका ज्ञान लिखित नहीं, अनुभव आधारित होता है. झाँकरी बनने की प्रक्रिया को Anne de Sales ने The Shamanic World of the Nepalese Himalayas में विस्तार से समझाया है. उनके अनुसार झाँकरी बनना कोई पेशा चुनना नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अचानक बीमारी, डर, सपने और सामाजिक अलगाव का अनुभव करता है. समाज इसे “बुलावा” मानता है, जिसे अस्वीकार करना खतरनाक समझा जाता है.

यहीं पर वन-झाँकरी की अवधारणा सामने आती है. वन-झाँकरी को नेपाल की लोकमान्यता में दीक्षा देने वाला माना जाता है. Michael Oppitz, Mythology and Shamanism in the Himalayas में बताते हैं कि वन-झाँकरी को एक वास्तविक जंगल-निवासी प्राणी की तरह समझना भ्रमित करने वाला हो सकता है. वह दरअसल दीक्षा की प्रक्रिया का प्रतीक है—जंगल, एकांत और भय के माध्यम से व्यक्ति के पुराने सामाजिक स्वरूप का टूटना और नए स्वरूप का बनना.

नेपाल के ख़स समाज में झाँकरी की भूमिका ब्राह्मण पुजारी से अलग होती है. Harka Gurung के अनुसार, पुजारी व्यवस्था और परंपरा को बनाए रखता है, जबकि झाँकरी उन स्थितियों से निपटता है जहाँ व्यवस्था टूटती दिखाई देती है—जैसे अचानक बीमारी, मानसिक तनाव या सामाजिक टकराव. इस कारण झाँकरी का महत्व औपचारिक धार्मिक ढाँचे के बाहर भी बना रहता है.

आधुनिक नेपाल में अस्पताल, दवाइयाँ और प्रशासनिक संस्थाएँ मौजूद हैं, फिर भी झाँकरी की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. इसका कारण यह है कि झाँकरी केवल इलाज नहीं करता, बल्कि बीमारी को अर्थ देता है. मानवशास्त्रीय भाषा में कहें तो वह बीमारी को “कहानी” में बदल देता है—ऐसी कहानी जिसे समाज समझ सके और स्वीकार कर सके. यही बात Anne de Sales और Dor Bahadur Bista दोनों के कार्यों में बार-बार सामने आती है.

इस प्रकार, नेपाल के झाँकरी को केवल स्थानीय ओझा या अंधविश्वासी व्यक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. वह विश्व की व्यापक शामनिक परंपरा का एक हिमालयी रूप है, जो स्थानीय इतिहास, समाज और पर्यावरण से आकार लेता है. झाँकरी की संस्था हमें यह समझने में मदद करती है कि मनुष्य ने अलग-अलग स्थानों पर संकट और बीमारी से निपटने के लिए कितने विविध, लेकिन भीतर से जुड़े हुए तरीके विकसित किए हैं.

मंजुल पंत

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