Featured

वह किलमोड़े और हिसालू डोलू में भरकर ला घरवालों की पार्टी करना

पहाड़ और मेरा जीवन – 20

(पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रतीक्षा करें.)

किसी का बचपन पहाड़ में गुजरा हो और वह यह कहे कि उसने कभी किलमोड़े और हिसालू नहीं खाए, तो उसका यह जन्म तो बेकार ही चला गया समझो. दोनों ऐसे फल हैं जो दुनिया में कहीं दूसरी जगह नहीं मिलेंगे और पहाड़ में मुफ्त में ही इतने मिलेंगे कि खा-खाकर बेहजमी हो जाए.

दो साल पहले कुछ दिनों के लिए इंग्लैंड गया था, जहां उन्मुक्त क्रिकेट खेल रहा था. वहां बहुत ही बढ़िया फल खाने को मिलते थे. वहां मैंने रेस्पबेरी यानी रसभरी नामक फल देखा. वह दिखने में जितना आकर्षक था, उतना ही महंगा भी था. लेकिन मैं हैरान इस बात पर था कि वह हुबहू हिसालू जैसा था. बस थोड़ा आकार में बड़ा होगा.

जो लोग पिथौरागढ़ में ठुलीगाड़ के आसपास रहते हैं, वे जानते होंगे कि हिसालू की झाड़ियां कहां-कहां मिलेंगी. झाड़ियां वहां इफरात में बिखरी हुई थीं. ठुलीगाड़ के सामने वाले पहाड़ पर गाड़ के साथ-साथ बढ़ते जाओ, तो कई जगह झाड़ियों की भरमार मिल जाती है. अगर भड़कटिया की ओर निकलो तो हैलीपैड से सटी पहाड़ियों पर भी किलमोड़े और हिसालू की झाड़ियों का भरापूरा इलाका मिल जाता है.

हिसालू

ठुलीगाड़ में हमारे मकान मालिक की बेटी रेनू, जो कि केंद्रीय विद्यालय में मेरी ही कक्षा में पढ़ती थी, मेरे साथ कई बार इन झाड़ियों से किलमोड़े व हिसालू तोड़ने गई है. रेनू आजकल अमेरिका में रह रही है. लेकिन वहां रहते हुए भी वह हमारा छुट्टी के दिन इस पहाड़ से उस पहाड़ जाकर किलमोड़े और हिसालू तोडकर लाना नहीं भूली होगी.

कहते हैं जो चीज जरूरत से ज्यादा मात्रा में उपलब्ध हो, उसकी कोई जरूरत महसूस नहीं होती.

पहाड़ में किलमोड़े और हिसालू का हाल यह था कि इनकी झाड़ियां कहीं भी राह चलते मिल जाती थीं. उनमें अगर ये पके हुए दिख गए तो कुछ तोड़कर मुंह में डाल लेते और अपने काम पर आगे निकल जाते.

एक बर्तन में तोड़कर लाने का आइडिया मुझे अपनी एक बुआ से मिला, जो मौष्टिमाणु से बहुत आगे द्विरी भनार में रहती थीं. मैं शायद तब छठी या सातवीं में रहा हूंगा, जब पहली बार उनके घर. मुझे ठुलीगाड़ से उनके घर तक की दूरी का पता नहीं, पर समय का हिसाब लगाएं तो वहां पहुंचने में लगभग पूरा दिन लग गया था. पूरा सफर मिट्टी भरे रास्ते पर करना पड़ता था.

बुआ का घर एकदम नीचे रामगंगा नदी से सटा हुआ था, जहां तक पहुंचने के लिए ऊपर से बहुत खड़ी ढलान पर उतरना होता था. इस ढलान का रास्ता चीड़ के सूखे हुए पत्तों से पटा रहता था. ढलान पर ऐसे सूखे पत्तों पर चलते हुए कदम-कदम पर फिसलना तय था. पिथौरागढ़ रहते हुए मैं दो या तीन बार आया था यहां बुआ से मिलने.

वहां मेरी आवभगत में उनकी बेटियां आसपास से बर्तनों में भर-भरकर किलमोड़े ले आतीं. मैंने पहली बार वहीं जाकर किरमोड़ों में नमक लगाकर खाया और जीभ पर चिपक गए गहरे नीले रंग को दांत से खुरच-खुरचकर थूकने का बचपन वाला आनंद भी लिया.

ठुलीगाड़ में रहते हुए छुट्टी के दिन मैं और रेनू हाथों में डोलू उठाए निकल जाते और हमारे बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा चालू हो जाती कि कौन कितनी जल्दी अपने बर्तन में कितने हिसालू भरता है. अपने बारे में जैसा कि मैं बता ही चुका हूं कि मैं कितना बड़ा भुक्खड़ था, तो एक ओर डोलू हिसालुओं से भरता जाता, दूसरी ओर मैं मुट्ठी भर-भर निकाल गटकता जाता.

मेरे साथ सहूलियत यह थी कि मैं ऊंची चट्टानों पर उगी झाड़ियों तक भी पहुंच जाता, जबकि रेनू नीचे झुकी हुई झाड़ियों से ही हिसालू तोड़ पाती थी. मैं भुक्खड़ तो था लेकिन मुझे हिसालू तोड़ते हुए यह सोच-सोचकर बहुत अच्छा लगता था कि बर्तन भरकर हिसालू जब मैं घर लेकर जाऊंगा, तो घरवाले कैसे आराम से धूप में पसरकर इन्हें खाने का मजा लेंगे.

मैं हिसालू से भरा हुआ डोलू मां के हाथ में ही देता था. वही कटोरो में भर-भरकर सबको बांटती थी. इस तरह हम लोगों की हिसालू पार्टी हुआ करती थी और इसका सारा श्रेय मैं अकेला ही लूट ले जाता था.

आजकल के बच्चे हिसालू की ऐसी पार्टी करते हैं या नहीं, हिसालू अब उस तरह से होता है या नहीं, मुझे इसकी जानकारी नहीं, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि रेस्पबेरी यानी रसभरी और हिसालू एक ही प्रजाति के फल हैं और रसभरी के बारे में कोई चाहे तो गूगल करके देख सकता है कि इसके कितने लाभ हैं. उसमें कई ऐंटी-ऑक्सीडेंट रहते हैं, जो कैंसर और दिल की बीमारियों के खिलाफ भी लड़ते हैं.

हमें तब हिसालू से स्वास्थ्य को होने वाले फायदों के बारे में कोई जानकारी न थी. हम सिर्फ इतना जानते थे कि वह मुफ्त में मिल जाता है और अधिक मात्रा में एक साथ खाने पर कुछ देर के लिए जीभ स्वाद का एक अनूठा उत्सव मना लेती है. मां की मैं दूसरे भी कई कामों में मदद करता था, लेकिन उन सभी में डोलू में भरकर हिसालू लाने का काम ही इकलौता ऐसा था, जिसके लिए मैं हमेशा बेसब्र रहता था क्योंकि हिसालू खाने के लिए ही मां बाकी सारे काम छोड़कर इत्मीनान से बैठती थी.

और टंपरेरी ने अपनी आंख से यूं धुआं निकाला कि मुझे कभी नहीं भूला

[वाट्सएप में काफल ट्री की पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें. वाट्सएप काफल ट्री]

(जारी)

सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

10 hours ago

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…

11 hours ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

11 hours ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

12 hours ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

13 hours ago

सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा

दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है. (Smriti Yatra Poem by Sindhuja) शायद हर पीढ़ी,…

5 days ago