उस्ताद मेहदी हसन खान. फोटो: www.cdandlp.com से साभार
उस्तादों से लगी लगन
तब न कविता की तमीज़ थी न संगीत समझने की. बीस-बाईस की उम्र थी और मीर तकी मीर का दीवान सिरहाने रख कर सोने का जुनून लग चुका था. उनके शेर याद हो जाया करते और सोते-जागते भीतर गूंजा करते. कहीं से किसी ने एक कैसेट ला के दे दिया. लगातार-लगातार रिवाइन्ड कर उस में से आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद और ये धुआँ सा कहाँ से उठता है जैसी क्लासिक ग़ज़लों को सुनने और आख़िर में आवेश की सी हालत में आ जाने की बहुत ठोस यादें हैं.
उसी क्रम में एक तरफ तो मीर बाबा की आत्मकथा ‘ज़िक्र-ए-मीर’ से परिचय हुआ दूसरे उस्ताद मेहदी हसन (Mehdi Hassan) की गायकी से लगन लग गयी. शायद तभी ये एहसास गहरे भीतर ठहर गया था कि ये ताजिन्दगी चलने और हौसला देने वाले रिश्ते बन चुके हैं.
फ़िराक गोरखपुरी साहब का एक शेर है –
मोहब्बत अब मोहब्बत हो चली है,
तुझे कुछ भूलता सा जा रहा हूं
ये सन्नाटा है मेरे पांव की चाप
‘फ़िराक़’ कुछ अपनी आहट पा रहा हूं
ये किसी महबूब शख़्स के लगातार भीतर रहने के बावजूद अपनी खु़द के पांवों की आहट सुन पाने का आत्मघाती हौसला है जो इश्क़ को इश्क बनाता है. दुनिया भर की तमाम कलाओं में न जाने कितनी मरतबा कितने-कितने तरीक़ों से इस शै को भगवान से बड़ा घोषित किया जा चुका है. लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन्सान अपनी औक़ात को भूल कर इस सर्वशक्तिमान से भिड़ता जाता है. इस भिड़ंत के निशान हमारी कलाओं में अनमोल धरोहरों की तरह सम्हाले हुए हैं. उस्ताद मेहदी हसन की सारी गायकी अब इसी धरोहर का बेहद ज़रूरी हिस्सा बन चुकी है.
उस्ताद ने ऐसे अंतरिम समय में गज़ल को क्लासिकल संगीत में मलबूस किया जब खुद भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परम्परा के अस्तित्व पर तमाम खतरे मंडरा रहे थे. इस के लिए वही आत्मघाती हौसला चाहिए था जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया.
उस्ताद बनने की उनकी कहानी इसी हौसले की गवाही देती है. पिता और चाचा से ध्रुपद गायकी के शुरुआती पाठ सीखने के बाद मेहदी हसन भी संगीत में अपनी पहचान बनाना चाहते थे. लेकिन गरीबी इस कदर थी कि उस्ताद को एक साइकिल की दूकान में काम करना पड़ा. उसके बाद वे बाकायदा गाड़ियों के मैकेनिक भी बने. लेकिन विषम से विषम परिस्थितियों में भी मेहदी हसन ने अपना रियाज़ जारी रखा.
तीस की उम्र में कहीं जाकर उन्हें रेडियो पाकिस्तान में ठुमरी गायन के रूप में पहला ब्रेक मिला और दुनिया एक मखमल सुनहरी अद्वितीय आवाज़ से रू-ब-रू हुई. अपनी अलग पहचान बनाने के लिए उस्ताद ने गज़ल गायकी को चुन लिया और उनक इस फन को जब रेडियो पाकिस्तान के प्रोड्यूसरों ने देखा तो उन्हें इसी विधा में अपना हाथ आजमाने की सलाह दी. रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामां हो गए जैसी ग़ज़लें रातोंरात जनता के बीच हिट हो गईं.
साठ और सत्तर के दशक उस्ताद के परफैक्शन का दौर थे. गजल पेश करने का उनका अंदाज़ भी अद्वितीय था. पहले वे सुनने वालों को उस राग की तफ़सीलात और बारीकियां बतलाया करते थे जिस की ज़मीन पर उन्होंने गज़ल बुनी होती थी. कई बार तो ऐसा लगता था जैसे वे अपने आप से बातें कर रहे हों – इतनी तल्लीनता होती थी उनकी अदायगी में.
उनकी आवाज़ की रेंज बहुत बहुत बड़ी थी रागों पर उनकी पकड़ निर्विवाद.
उनकी एक अपेक्षाकृत नई कम्पोजीशन है जिसमें उन्होंने परवीन शाकिर की गज़ल कू-ब-कू फैल गयी बात शनाशाई की को गाया है. राग दरबारी में रची गयी इस गज़ल में वे आपको जिस खूबी से राग जौनपुरी से राग दरबारी की खतरनाक नज़दीकी से वाकिफ कराते हैं सुनने वाला एकबारगी किसी दूसरी दुनिया में पहुँच जाता है. श्रोताओं को इस तरह से हाल में पहुंचा देने की ताब सिर्फ और सिर्फ मेहदी हसन की आवाज में पाई जाती थी जिसने उन्हें समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में शहंशाह-ए-गज़ल बनाए रखा.
पचास सालों तक संगीत को समर्पित उस्ताद मेहदी हसन खान ने 13 जून 2012 जब कराची के एक हस्पताल में आख़िरी साँसें ली होंगी तो मीर तकी मीर शायद फरमा रहे होंगे –
गोर किस दिलजले की है ये फलक
शोला इक सुभ याँ से उठता है
– अशोक पाण्डे
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कू ब कू फैल गई बात शनासाई की-में जाने क्या था जिसकी वजह से मैंने लगातार इसे सुना–दिनरात,सोते-जागते, यहाँ तक कि पढ़ते हुए भी... कितनी बार–याद नहीं! इसका जिक्र इस मजमून में पढ़ते ही समूची ग़ज़ल एक तस्वीर की तरह सामने खिंच आयी है और इसे एकबार फिरसे सुनना शुरू कर चुका हूँ..... बात तो सच है मगर...!
शुक्रिया अशोक दा!
अहा!!