छांगरू की एजीएम का दृश्य
व्यांस घाटी में जाने और उसके सुंदर दृश्यों को कैमरे की नजर से देखने की इच्छा तो बहुत पहले से थी पर यह संभव हो पाया रं समुदाय की सालाना एजीएम के कारण जो 2016 में नेपाल के एक सुदूरवर्ती गांव छांगरू में आयोजित होनी थी. व्यांस घाटी में ट्रैकिंग की प्लांनिंग मेरे मित्र प्रशांत बिष्ट और मेंने सन 1999 में भी की थी उस दौर में यहां जाने के लिए चरित्र प्रमाण पत्र अपने जिले के जिलाधिकारी द्वारा बनवाना पड़ता था जो मैंने बनवाया भी पर व्यांस जाना नहीं हो पाया. इस बार रं समुदाय के गर्ब्यांग-वासी हमारे मित्र धीराज गर्ब्याल ने जब मुझे और प्रशांत बिष्ट को छांगरू आने का आमंत्रण दिया तो हम तुरंत तैयार हो गए.
मेरे लिए तो यह किसी सपने के साकार होने जैसा था. रं समुदाय के प्यार और मेहमान नवाजी के तो हम कंडाली महोत्सव के समय से ही कायल हो गए थे. मैं पहली बार 1999 में रं समुदाय द्वारा चौंदास घाटी में हर बारह साल में एक बार मनाए जाने वाले कंडाली महोत्सव व दूसरी बार सन 2012 में (प्रशांत बिष्ट व धीराज के साथ) सम्मिलित हो चुका था और यह समुदाय और यह लोग मुझे अपने परिवार सा आभास देते हैं, इसलिए यहां जाने से पहले कुछ खास तैयारी और सोचने की आवश्यकता नहीं होती.
बस कैमरा उठाया और चल पड़े व्यांस घाटी की ओर. कुछ ऐसा ही हुआ छांगरू एजीएम जो रं समुदाय का साल में या दो साल में एक बार होने वाला आयोजन होता है जो एक त्योहार सा तो होता ही है जिसमें रं समुदाय यानी दारमा घाटी, चौंदास घाटी, व्यांस घाटी के वासी भाग लेते हैं, जो एजीएम के बहाने ही सही चाहे दुनिया की किसी भी कोने में रह रहे हों इसमें शामिल होने का मौका नहीं चूकते हैं.
इस दौरान एक दूसरे से मिलना जुलना तो हो ही जाता है साथ ही साथ अपने समुदाय और रं कल्याण संस्था, जो इस विशाल आयोजन की आयोजक भी है, के वर्ष भर के क्रिया कलापों की जानकारी और समीक्षा और भविष्य में किए जाने वाले कार्यों की रूपरेखा भी इस दौरान तैयार की जाती है.
तो हम भी निकल पड़े संस्कृति के इस समागम और कैलाश मानसरोवर और कैलाश पर्वत को भारत से जोड़ने वाली दुनिया की सुंदरतम घाटी के दीदार करने को अपने अल्मोड़ा से व्यांस घाटी की ओर. पहले दिन हम सीधे धारचूला पहुंच गए धारचूला एक तरह से इन सुंदर घाटियों में प्रवेश करने की पहली सीढ़ी है और अगर आप अपने साथ रोजमर्रा की जरूरतों का कुछ सामान अपने साथ लाना भूल गए हैं तो वो सब भी आप धारचूला से ले सकते हैं.
अगली सुबह हम हेलीकॉप्टर द्वारा जो उत्तराखंड सरकार द्वारा टिकट सुविधा के साथ विशेष रुप से एजीएम और सुदूरवर्ती गांवों में पहुंचने के लिए लगाया गया था से सीधे गुंजी पहुंच गए. रास्ते में नारायण स्वामी आश्रम, नेपाल के सुंदर हिमालय और सुदूर बसे हुए छोटे-छोटे गांवों का दीदार करते हुए. गुंजी एक तरह से इस घाटी की अंतिम सबसे बड़ी बसासत है. इस से आगे एक छोर से कालापनी, नाभीढांग (ॐ पर्वत), लिपुलेख होते हुए कैलाश मानसरोवर यात्रा सीधे तिब्बत में प्रवेश कर जाती है. दूसरे छोर से आप रौंगकौंग, नाबी, कुटी से होते हुए आदि कैलाश और पार्वती सरोवर के दर्शन करते हुए सिन-ला दर्रे को पार करते हुए दारमा घाटी में भी जा सकते हैं.
हम एजीएम शुरू होने से दो दिन पहले ही गुंजी पहुंच गए थे इसलिए हम में से प्रशांत बिष्ट, कुंदन भंडारी (धारचूला वासी) और मेंने आदि कैलाश और जोलिंगकोंग तक ट्रेक करने की पहल की और हम तीनों लोग निकल पड़े गुंजी से जोलिंकोंग की ओर. सबसे पहले गुंजी गांव मिला क्योंकि हम गुंजी में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पड़ाव में बने हट्स में रह रहे थे जो कुमाऊं मंडल विकास निगम संचालित करता है. ये हट्स गुंजी गांव से थोड़ा हट कर बनाए गए हैं. गुंजी गांव को देख कर कोई भी कुछ देर के लिए मंत्रमुग्ध हो सकता है – खासकर इस गांव के घरों में खिड़कियों और दरवाजों की नक्काशी और बड़ी बड़ी बाखली देख कर. तकरीबन एक घंटे से ज्यादा फोटोग्राफी की और गांव में यहां की छोटी-छोटी गलियों में घूमते रहे और फिर आगे के सफर में चल दिए.
व्यांस घाटी का पूरा का पूरा लैंडस्केप आपको लेह-लदाख के लैंडस्केप सा आभास भी देता है और साथ में घने और बेहद खूबसूरत जंगलों का दीदार भी कराता है, इसलिए हम हर कदम पर रुक-रुक कर, फोटो खींचते हुए आगे बढ़ रहे थे. गुंजी के बाद हम एक और सुंदर गांव रौंगकौंग को निहारते हुए नाबी गांव पहुंचे जहां गांव के पीछे का विशाल पहाड़ नाबी को आशीर्वाद देता प्रतीत होता है. शाम होते-होते हम कुटी गांव पहुंच गए थे और कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा संचालित होम स्टे में रुके जहां अगली सुबह फाफर की रोटी (सिली कुटू) और हरी सब्जी का स्वादिष्ट नाश्ता कर हम अपनी मंज़िल आदि कैलाश, जोलिंगकौंग शाम तक पहुंच गए और वहां बने हट्स में रात गुजारी. सुबह सुबह पार्वती सरोवर के दर्शन कर देर रात तक हम वापस गुंजी पहुंच गए ताकि हम एजीएम में भाग लेने के लिए जल्द से जल्द छांगरू रवाना हो सकें.
अगले दिन सुबह उठते ही सामने आपि नम्पा हिमालय के दर्शन हुए जो गुंजी से बहुत बहुत सुंदर दिखते हैं फिर हम चल दिए डीजीबीआर के डंपर में बैठ कर अपनी अगली मंज़िल की ओर यानी एजीएम की ओर. सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण व्यांस घाटी में रोड कई जगह पर बन चुकी हैं और कई जगह काम अभी भी चल रहा है पर रोड बनाने के काम में लगी गाड़ियां अक्सर गांव के लोगों और मुसाफिरों को लिफ्ट दे देती हैं. एजीएम के लिए तो पूरी व्यांस घाटी ही छांगरू के लिए उमड़ पड़ी थी सो हर कोई डंपर में बैठना चाह रहा था और डंपर अपनी कैपेसिटी से ज्यादा भर चुका था – कोई लटक रहा था तो कोई बैठा था कोई खड़ा था तो कोई जगह पाने की कोशिश में लगा था.
डंपर टोटल फुल क्या टोटल ओवरलोड हो कर चल पड़ा छांगरू से थोड़ा पहले बने पुल तक बनी रोड के लिए. यकीन मानिए सारा एडवेंचर एक तरफ और वो डंपर का सफर एक तरफ. उस डंपर चालक को तो वीरता पुरस्कार बनता ही है जो अपनी जान जोखिम में डाल के उस तरह की सड़कों में गाड़ी चलाते हैं और उन सवार लोगों को भी वीरता पुरस्कार बनता है जो उस सफर को हर रोज करते हैं.
शायद उस ऊंचाई पर रहने से आदमी का दिल भी काफी मजबूत हो जाता है और वो हर सफर बड़ी आसानी से कर लेता है. नेपाल सरकार और भारत सरकार ने काली नदी पर पुल बना कर एजीएम में आने वाले लोगों को जोड़ने का काम किया था जो आज के समय में वाकई में एक अनूठी बात थी. ये कुछ ऐसा था जैसे ये दो अलग देश की सीमाएं न होकर एक ही देश हो और यहां का माहौल भी कुछ ऐसा था कि दोनों देशों के नागरिकों का प्यार और मेल भी देखते ही बनता था.
पुल पार करते ही आने वाले अतिथियों के स्वागत में लोग खड़े होकर अभिवादन और सम्मान व्यक्त कर रहे थे. एजीएम की तैयारी कई दिनों से चल रही थी और छांगरू को देख कर कोई भी बता सकता था कि इन तैयारियों के लिए कितना परिश्रम और योजना आयोजनकर्ताओं द्वारा किया गया था.
नेपाल के सीमांत में बसे इस बेहद खूबसूरत गांव में एक बड़े उत्सव सा माहौल था और यहां की गलियां रं समुदाय के दुनिया के हर कोने से आए लोगों से गुलजार हो रही थी. यहां की छोटी-छोटी दुकानों में जरूरत का सारा सामान उपलब्ध था. इसमें बहुत सा सामान चीन का बना हुआ भी था क्योंकि यहां से तकलाकोट मंडी बहुत पास में स्थित है.
करीब एक दिन में वहां तिंकर होते हुए पहुंचा जा सकता है जो नेपाल सीमा का आखरी गांव है. छांगरू का हर घर रं समुदाय के लोगों और रिश्तेदारों और मेहमानों से गुलजार था और आयोजनकर्ताओं ने यहां के बड़े-बड़े खेतों और मैदानों में टेंटों की व्यवस्था भी कर रखी थी. ये भी लोगों से पैक हो चुके थे. लोगों का सैलाब सा उमड़ पड़ा था.
एजीएम एक तरह का कुम्भ ही था जिसमें हर कोई भाग ले रहा था. एजीएम (एनुअल जनरल मीटिंग) पूरे जोश-खरोश के साथ प्रारंभ हुई जिसमें सर्वप्रथम रं समुदाय के पुरुष और महिलाओं ने अपने अपने पारंपरिक परिधानों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पूरे गांव की परिक्रमा सी करते हुए नाचते गाते आयोजन स्थल तक पहुंचे जो कि वहां के खेतों में तैयार किया गया बड़ा सा मैदान था. मैदान के एक ओर छांगरू राखू की पहाड़ी थी तो दूसरी ओर नेपाल हिमालय का आपी पर्वत अपनी प्राकृतिक आभा बिखेर रहा था.
एक पहाड़ पूरा का पूरा देवदार के जंगल से भरा पड़ा था और आयोजन स्थल के सामने एक बहुत बड़ा खेतों का मैदान सा था जिसमें खूबसूरत चोलाई की फसल हो रही थी जिसके बीचों बीच एक विशाल पेड़ इस दृश्य को अपी पर्वत के साथ मेल कर बेहद खूबसूरत बना रहा था. प्रकृति के बीच इस तरह के आयोजन यदा-कदा ही होते हैं वो भी कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में.
तो एक तरह से ये आयोजन इतिहास का अमिट हिस्सा बनने जा रहा था. इस आयोजन में रं समुदाय के बड़े बुजुर्ग तो शामिल थे ही जो किसी दौर में भारत तिब्बत व्यापार की अग्रिम पक्ति के लोगों में शामिल रहे, साथ ही रं समुदाय के भारत सरकार में विभिन्न प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत और सेवानिवृत्त लोग भी शामिल थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत देश की सेवा में लगा दिया.
महिलाओं और बच्चों की भागीदारी भी कमतर नहीं थी. एजीएम का खास और अनूठा आयाम था पूरा का पूरा कार्यक्रम सिर्फ और सिर्फ रं भाषा में आयोजित होना जो वाकई में तारीफ के लायक था. बाहर से आए हम जैसे लोगों के लिए पहले दिन ये थोड़ा अटपटा और समझ से परे था पर एजीएम के समापन तक हम थोड़ी थोड़ी रं भाषा तो समझ ही गए और पूरी तरह अपने को रं समुदाय का ही हिस्सा सा महसूस करने लगे.
एजीएम के दौरान कई महत्वपूर्ण किताबों का विमोचन भी हुआ जिनमें ‘अमटीकर’ पत्रिका और ‘थ्रोन ऑफ गॉड्स’ किताब मुख्य रही. ‘थ्रोन ऑफ गॉड्स’ को कुमाऊं मंडल विकास निगम ने प्रकाशित किया है एवं अशोक पांडे और धीराज गर्ब्याल द्वारा संपादित किया गया. यह किताब इतनी सफल हुई कि अभी हाल में 2018 में देहरादून दौरे में आए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को भी इसे भेंट स्वरूप उत्तराखंड सरकार द्वारा दिया गया.
एजीएम के दौरान स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी किया गया और समापन अवसर पर फूड मेले का भी, जिसमें विभिन्न किस्म के व्यंजन शामिल थे. हम लोग एजीएम के दौरान एक सुबह तड़के छांगरू गांव के ठीक बगल के पहाड़ में स्थित छांगरू राखू के छोटे किंतु काफी दुर्गम ट्रेक पर भी गए जो एकदम सीधी पहाड़ी पर स्थित है.
छांगरू राखू के भीतर बचे कंकालों के अवशेष
छांगरू राखू पहाड़ी के लगभग टॉप पर बनी एक प्राकृतिक गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है है बहुत समय पहले जब राखू गांव और आसपास कोई भयानक बीमारी फैली थी तब लोग अपनी जान बचाने के लिए पहाड़ में स्थित इस दुर्गम गुफा में आकर रहने लगे थे जिसमें से कुछ लोग तो बच गए पर कुछ इसी गुफा में मारे गए. आज भी उनके अवशेष गुफा में देखे जा सकते हैं. गुफा तक पहुंचने के लिए आखिर में रस्सियों का सहारा लेना पड़ता है. हम लोगों ने वहां से दिखने वाले नयनाभिराम दृश्य का भी लुत्फ़ उठाया. छांगरू का विहंगम दृश्य यहां से देखने को मिलता है. हमारे ग्रुप में इस कठिन ट्रेक को प्रसिद्ध इतिहासकार शेखर पाठक व श्री नृप सिंह नपलच्याल, अजय नबियाल, रघुवीर सिंह रौंकली और मेरे मित्र प्रशांत बिष्ट ने सफलापूर्वक पूरा किया और इस प्रकार हमारी छांगरू यात्रा में एक छोटा किंतु साहसिक अध्याय और जुड़ गया.
एजीएम संपन्न होने के बाद हम वापस चल पड़े अपनी अगली मंज़िल धारचूला की ओर. इस बार हम पैदल ही इस यात्रा का आनंद उठाते हुए गर्ब्यांग, छियालेख, बूदी, मालपा और लखनपुर होते हुए दूसरे दिन धारचूला पहुंच गए. हमारी छांगरू यात्रा हमारे जीवन की कभी न भूलने वाली स्मृति बन गई.
फोटो एवं आलेख: जयमित्र सिंह बिष्ट
छांगरू राखू के रास्ते से छांगरू गाँव का दृश्य
एजीएम के लिए आते रं समुदाय के लोग
छांगरू गाँव से एक दृश्य
धारचूला
आगंतुकों का स्वागत करती महिलाएं
रौंगकौंग गाँव से एक दृश्य
नाबी गाँव के रास्ते
कुटी गाँव
छांगरू राखू के भीतर
सहयात्री
गुंजी गाँव
गुंजी गाँव के पास
गर्ब्यांग गाँव की एक बाखली
जयमित्र सिंह बिष्ट
अल्मोड़ा के जयमित्र बेहतरीन फोटोग्राफर होने के साथ साथ तमाम तरह की एडवेंचर गतिविधियों में मुब्तिला रहते हैं. उनका प्रतिष्ठान अल्मोड़ा किताबघर शहर के बुद्धिजीवियों का प्रिय अड्डा है. काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.
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