भक्तों के मन की इच्छा पूरी करने वाला देवी भगवती का मंदिर ‘मनकामना को चिनो’ मनकामना मंदिर नेपाल का एक मुख्य शक्ति पीठ है. यह काठमांडू से चंद्रागिरि, बेनिघाट, चरंडी, कुरियन घाट होते हुए पृथ्वी राजमार्ग पर 141 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
(Mankamna Devi Mandir Nepal)
काठमांडू से पोखरा होते तालचौक, खैरन्तर बाजार, मनाहारी बाजार, बंदीपुर व बकरांग होते भी यहां पहुंचा जाता है. त्रिशूली नदी के समीप चलते नारायण गढ़ के पहाड़ी रास्ते पर मुगलिंग आता है. बुटबल के इस पथ पर मुगलिंग से 25 किलोमीटर पहले मुख्य सड़क पर मन कामना देवी का प्रवेश द्वार है. यहां से 5 किलोमीटर की खड़ी व घुमावदार चढ़ाई चढ़ मंदिर में पैदल पहुँचने में तीन-चार घंटे लगते हैँ.
सड़क पर बने भव्य परिसर व खानपान की सुविधा वाले स्पॉट से मन कामना मंदिर तक पहुँचने की बेहतरीन केबल कार सुविधा उपलब्ध है जिससे दस मिनट में मंदिर परिसर के समीप पहुंचा जा सकता है. यह क्षेत्र गोर्खा के दक्षिण पूर्वी भाग में है. गोर्खा का मुख्यालय पोखरी थोक बाजार है. मनकामना उससे 12 किलोमीटर दक्षिण तनहु के आबू खैरनी से 5 किलोमीटर पहले और चितवन के मुगलिंगसे 25 किलोमीटर उत्तर में पड़ता है.
मनकामना मंदिर परिसर के उत्तरी भाग में अन्नपूर्णा हिमालय व मनास्तु हिमालय के उच्च शिखर दिखाई देते हैं तो दक्षिण की ओर महाभारत झील और छिमकेश्वरी का डांडा. मनकामना को माता पार्वती का अवतार माना जाता है जिसकी प्रतिष्ठा मुख्य शक्ति पीठ के स्वरूप में होती है. नेपाली शिवालय शैली में निर्मित यह उपासना स्थल दो मंजिला है.
ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर इस मंदिर की स्थापना सत्रहवीँ सदी में हुई जब इस परिक्षेत्र में दो गोर्खा नरेश श्री राम शाह और पृथ्वीपति शाह का राज्य था. जनश्रुति है कि रामशाह की गोर्खा रानी चम्पावती मनकामना की दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण थी. इसे मात्र उनके विश्वस्त लखन थापा ही जानते थे. संयोग से एक दिन उनके पति राम शाह ने अपनी रानी को मन कामना के देवी स्वरुप में देख लिया जो सिँह पर आरुढ़ थीं. राजा ने कौतुहल वश अपनी रानी से इस रहस्य को जानना चाहा तो उसकी मृत्यु हो गई. प्रथा के अनुसार गोर्खा रानी चम्पावती अपने पति की चिता में सती हो गई. इससे पूर्व उसने अपने विश्वस्त लखन थापा को बता दिया कि वह पुनः अवतरित होगी. छह मास बाद अपने खेत में एक किसान ने वहां स्थित एक शिला को खंडित करना चाहा तो उसमें से दुग्ध व रक्त की धार बहने लगी. ऐसी घटना हुई जान लखन थापा उस स्थान पर पहुंचे व तांत्रिक अनुष्ठान के द्वारा उन्हें यह अनुभूति हुई कि इस स्थान पर पराशक्ति का संचरण है. राजकीय निर्देश पर उस स्थान पर पूजा स्थल की नींव पड़ी. कहा गया कि मन कामना अपने पुत्र डम्बर शाह के शासन में प्रकट हुई थीं तदन्तर राज्य नरेश पृथ्वी नारायण शाह के शासन काल में वह अवतरित हुईं.
(Mankamna Devi Mandir Nepal)
मन कामना मंदिर चार स्तर की पगोडा शैली की छत के स्वरूप में निर्मित है जिसका क्षेत्र वर्गाकार है. मंदिर का प्रवेश द्वार दक्षिण पश्चिम की ओर है. मनकामना को देवी भगवती का पवित्र पावन स्थल माना जाता है. यह गरुड़ रक्षक स्वरूप में माता लक्ष्मी का अवतार कही जातीं हैँ. इस मंदिर में जुलाई-अगस्त माह में नागपंचमी की अवधि में तथा सितम्बर-अक्टूबर में ‘दसैन’ के पर्व में दर्शनार्थियों का सर्वाधिक आगमन होता है मंदिर के पुजारी लखन थापा की सत्रहवीँ पीढ़ी के वंशज हैँ जो स्थानीय ‘मगर’ समुदाय के हैँ.
मनका मना मंदिर में पंचतत्व प्रतीक रूप में देवी की पूजा हेतु लाल वस्त्र, पुष्प, चुरा, पोटा, धूप दीप, नारियल, पान-सुपारी घंटी रक्षा धागा व चावल अर्पित होते हैँ. मंदिर में बलि प्रथा प्रचलित है. बलि मन कामना परिसर के पार्श्वमें मंडप पर दी जाती है. मंदिर के नीचे फैले बाजार की दुकानों में खस्सी, बकरे, कूकरी-मुर्गे बहुतायत से उपलब्ध रहते हैँ तो देवी के भोग का सामान, प्रसाद, श्रृंगार सामग्री, फल-फूल, सुहाग सामग्री, शंख व काष्ठ -मृदा पात्र के साथ स्थानीय कलाकृतियाँ, कँडी-टोकरी,व इनके साथ ही बच्चों के खिलोने, वस्त्र, फैशन सामग्री, जड़ी बूटी व अंचल में उगे फल व उनसे बने पदार्थ छोटी छोटी आकर्षक दुकानों में उपलब्ध रहतीं हैं.
(Mankamna Devi Mandir Nepal)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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