बर्बर इतिहास का नाम क्यों ढो रहा है ‘खूनीबढ़’

कोटद्वार में बाबा की दुकान का नाम बदले जाने और बजरंग दल से भिड़ने वाले मोहम्मद दीपक के मामले ने अचानक सियासी तापमान बढ़ा दिया. एआई से बनाई गई तस्वीरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, नेशनल मीडिया से लेकर बड़े राष्ट्रीय नेता तक इस मुद्दे में कूद पड़े.

राहुल गांधी की प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर बहस और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया. एक स्थानीय घटना देखते-देखते राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विवाद वास्तव में समाज और संस्कृति से जुड़ा है, या फिर यह केवल राजनीतिक सुविधा और भावनात्मक उकसावे का उदाहरण बनकर रह गया है?

अगर नाम बदलने को लेकर इतनी ही सख्ती और संवेदनशीलता है, तो कोटद्वार नगर पालिका क्षेत्र में शामिल खूनीबढ़ गांव की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता? यह गांव आज भी कुख्यात सुलताना डाकू के आतंक की याद दिलाता है. इतिहास गवाह है कि सुल्ताना डाकू इसी क्षेत्र में बड़ के पेड़ के नीचे लोगों की निर्मम हत्या करता था. बावजूद इसके, आज़ादी के बाद से लेकर अब तक किसी सरकार, किसी संगठन या किसी जनप्रतिनिधि ने इस नाम को बदलने की गंभीर पहल नहीं की.

यह विरोधाभास हमारे समय की राजनीति को बेनकाब करता है. एक ओर किसी दुकान या व्यक्ति के नाम को लेकर देशभर में शोर मचाया जाता है, वहीं दूसरी ओर एक पूरे गांव का नाम, जो हिंसा और भय के प्रतीक से जुड़ा है, सामान्य मान लिया जाता है. यह दर्शाता है कि नाम बदलने की मुहिम सुधार की नहीं, बल्कि चयनित एजेंडे की उपज बन चुकी है.

दरअसल, नाम बदलने का उद्देश्य अतीत के घावों को भरना और समाज को सकारात्मक दिशा देना होना चाहिए. लेकिन जब यह प्रक्रिया केवल विवाद खड़ा करने और सियासी लाभ बटोरने का साधन बन जाए, तो उसकी सार्थकता खत्म हो जाती है.

कोटद्वार का यह पूरा प्रकरण हमें सोचने पर मजबूर करता है कि असली मुद्दा क्या है—नाम बदलना या समाज को बेहतर बनाना? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक ऐसे विवाद उभरते रहेंगे, मीडिया की सुर्खियां बनेंगे और वास्तविक, जरूरी मुद्दे यूं ही पीछे छूटते रहेंगे.पूरे प्रकरण के बाद लालढांग चिलरखाल आंदोलन गायब हो गया.स्थानीय मुद्दे गायब हो गए.

वरिष्ठ पत्रकार विजय भट्ट देहरादून में रहते हैं. इतिहास में गहरी दिलचस्पी के साथ घुमक्कड़ी का उनका शौक उनकी रिपोर्ट में ताजगी भरता है.

इसे भी पढ़ें : कमल जोशी की फोटोग्राफी में बसता पहाड़

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

आधी सदी से आंदोलनरत उत्तराखंड का सबसे बड़ा गांव

बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर…

22 hours ago

फूल, तितली और बचपन

बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि…

4 days ago

पर्वतीय विकास – क्या समस्या संसाधन की नहीं शासन उपेक्षा की रही?

पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन आजादी के दौर…

4 days ago

अनूठी शान है कुमाऊनी महिला होली की

यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग…

5 days ago

धरती की 26 सेकंड वाली धड़कन: लोककथा और विज्ञान का अद्भुत संगम

दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है,…

1 week ago

कथा दो नंदों की

उपकोशा की चतुराई, धैर्य और विवेक से भरी कथा के बाद अब कथा एक नए…

1 week ago