कौन थे पाशुपत संप्रदाय के पुरोधा ‘लकुलीश’?

पाशुपत संप्रदाय के पुरोधा भगवान लकुलीश को भारतीय शैव परंपरा के विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माना जाता है. वे उस दौर के आचार्य थे, जब शिव की उपासना लोक आस्था से आगे बढ़कर संगठित साधना और संप्रदाय का रूप ले रही थी. पुराणिक परंपरा में उन्हें शिव का अवतार कहा गया है, लेकिन आधुनिक इतिहासकार और मानवशास्त्री उन्हें एक ऐतिहासिक धार्मिक गुरु के रूप में समझते हैं, जिनके माध्यम से पाशुपत शैव मत को स्पष्ट पहचान मिली.

लकुलीश का काल सामान्यतः दूसरी से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच माना जाता है. यह वही समय है जब उत्तर भारत में विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक धाराएँ आकार ले रही थीं. पाशुपत संप्रदाय को शैव धर्म की सबसे प्राचीन संगठित परंपराओं में गिना जाता है. R. G. Bhandarkar जैसे विद्वानों के अनुसार, पाशुपत मत वह आधार है, जिस पर बाद के शैव दर्शन विकसित हुए.

“लकुलीश” नाम का संबंध संस्कृत शब्द “लकुल” या “लागुड” से माना जाता है, जिसका अर्थ दंड या लाठी होता है. मूर्तिकला और शिलालेखों में लकुलीश को प्रायः दंड धारण किए हुए, ध्यानस्थ योगी के रूप में दिखाया गया है. यह दंड उनके संन्यासी जीवन, कठोर अनुशासन और तप का प्रतीक माना जाता है. Stella Kramrisch ने अपनी पुस्तक The Presence of Shiva में बताया है कि लकुलीश की यह छवि शिव के तपस्वी और योगी स्वरूप को स्पष्ट करती है.

पुराणों में लकुलीश का उल्लेख वायु पुराण, लिंग पुराण और कूर्म पुराण जैसे ग्रंथों में मिलता है. इनमें बताया गया है कि शिव ने पाशुपत योग के प्रचार के लिए चार शिष्यों के माध्यम से अपने ज्ञान का विस्तार किया. हालांकि इतिहासकार इन विवरणों को प्रतीकात्मक मानते हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि लकुलीश को पाशुपत परंपरा का केंद्रीय आचार्य माना गया.

पुरातात्विक साक्ष्यों की दृष्टि से लकुलीश से जुड़ी प्रतिमाएँ मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और मध्य भारत में मिली हैं. गुजरात का कायावरोहण क्षेत्र लकुलीश परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है. इन प्रतिमाओं में लकुलीश को योगासन में बैठे, शांत और संयमित मुद्रा में दर्शाया गया है. Alexis Sanderson जैसे विद्वानों ने पाशुपत परंपरा को शैव इतिहास की सबसे पुरानी तपस्वी धारा बताया है.

जब हम उत्तराखंड और व्यापक हिमालयी क्षेत्र की ओर देखते हैं, तो वहाँ लकुलीश की प्रत्यक्ष पूजा या उनके नाम से जुड़े स्वतंत्र मंदिरों के प्रमाण नहीं मिलते. इसके बावजूद हिमालयी शैव परंपरा में तप, योग, संन्यास और वनवासी जीवन पर जो बल दिखाई देता है, वह पाशुपत विचारधारा से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ प्रतीत होता है. हिमालय को शिव का निवास माना गया है और यहाँ के साधु-संन्यासी शिव को योगी और तपस्वी रूप में ही देखते आए हैं. यह दृष्टि पाशुपत मत की मूल भावना से मेल खाती है.

नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है. पशुपतिनाथ शिव का वह रूप है, जहाँ “पशुपति” शब्द का प्रयोग जीवों के स्वामी के रूप में होता है. पाशुपत संप्रदाय और पशुपतिनाथ परंपरा के बीच वैचारिक समानता स्पष्ट दिखाई देती है. विद्वानों का मानना है कि पाशुपत मत का प्रभाव नेपाल और मध्य हिमालयी क्षेत्र में काफी पहले पहुँच चुका था. पशुपतिनाथ मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि शैव तपस्वी परंपरा का एक प्रमुख केंद्र रहा है, जहाँ संन्यासी जीवन और कठोर साधना को विशेष महत्व दिया गया.

उत्तराखंड के केदारखंड, बद्रीनाथ क्षेत्र और कैलास–मानसरोवर मार्ग पर स्थित कई प्राचीन शैव स्थल इसी व्यापक तपस्वी परंपरा की ओर संकेत करते हैं. यहाँ शिव को गृहस्थ देवता से अधिक योगी और वैरागी रूप में देखा गया. यह वही वैचारिक धारा है, जिसे लकुलीश और पाशुपत आचार्यों ने व्यवस्थित रूप दिया था.

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