कथा दो नंदों की

उपकोशा की चतुराई, धैर्य और विवेक से भरी कथा के बाद अब कथा एक नए मोड़ पर पहुँचती है. यह वह समय है जब विद्या, योग और सत्ता; तीनों एक, दूसरे से टकराते हैं. इस खंड में हम देखते हैं कि कैसे व्याकरण, तपस्या और राजनीति एक, दूसरे में गुँथकर नंद वंश के पतन और एक नए सत्ता, क्रम की नींव रखते हैं. यही कथा आगे चलकर चाणक्य परंपरा और मौर्य युग की पृष्ठभूमि बनती है. यह कथा है; दो नंदों की.

दो नंद

“उसी बीच, हे काणभूति, मैं हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर कठोर तप कर रहा था. अपनी तपस्या से मैंने वरदाता भगवान शिव को प्रसन्न किया. उन्होंने मुझे पाणिनि का व्याकरण, शास्त्र प्रकट किया और उनकी आज्ञा से मैंने उसे पूर्ण किया. शिव की कृपा से अभिभूत होकर मैं अपने घर लौटा—मुझे अपने श्रम का कोई बोझ अनुभव नहीं हुआ. मैंने अपनी माता और वृद्धजनों का सम्मान किया और उपकोशा के अद्भुत पराक्रमों के विषय में सुना. यह सुनकर मेरा हृदय आनंद, विस्मय, स्नेह और पत्नी के प्रति गहरे सम्मान से भर उठा.

वर्षा ने मुझसे नए व्याकरण का पाठ करने को कहा, परंतु उससे पहले ही कार्तिकेय ने यह विद्या उन्हें प्रकट कर दी. तब व्यादि और इंद्रदत्त ने वर्षा से पूछा कि शिक्षण, शुल्क क्या होगी. वर्षा ने कहा; ‘दस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ.’

दोनों ब्राह्मण मेरे पास आए और बोले—‘मित्र, चलो राजा नंद से धन माँगें. इतनी बड़ी राशि केवल वही दे सकता है, क्योंकि उसके पास नौ सौ नब्बे करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ हैं. उसने कुछ समय पहले उपकोशा को अपनी बहन बनाया था, इस कारण तुम उसके साले हो. इस नाते हमें उससे कुछ अवश्य मिलेगा.’ इस प्रकार हम तीनों अयोध्या स्थित राजा नंद के शिविर की ओर चल पड़े.

परंतु जैसे ही हम वहाँ पहुँचे, राजा नंद की मृत्यु हो गई. पूरे राज्य में शोक छा गया और हम अत्यंत निराश हुए. तभी योगविद्या में निपुण इंद्रदत्त ने कहा—‘मैं मृत राजा के शरीर में प्रवेश करूँगा. वररुचि मुझसे याचना करे और मैं उसे स्वर्ण दूँगा. व्यादि तब तक मेरे शरीर की रक्षा करे.’

योजना के अनुसार इंद्रदत्त ने राजा के शरीर में प्रवेश किया और राजा जीवित हो उठा. प्रजा आनंद से झूम उठी. इधर व्यादि एक निर्जन मंदिर में इंद्रदत्त के शरीर की रक्षा कर रहा था और मैं राजमहल पहुँचा.

योगनंद; जो अब राजा कहलाने लगे थे; का सम्मान कर मैंने गुरुदक्षिणा माँगी. राजा ने अपने मंत्री शकटाल को आदेश दिया कि वह मुझे दस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ दे. परंतु बुद्धिमान शकटाल ने जब देखा कि मृत राजा जीवित हो गया और तुरंत ही एक याचक को पुरस्कृत किया जा रहा है, तो उसे संदेह हुआ. उसने मन ही मन सोचा; ‘राजकुमार अभी बालक है और राज्य शत्रुओं से घिरा है. अभी इस व्यक्ति को सिंहासन पर रहने देना चाहिए.’

उसने राजा से कहा; ‘जैसा आपकी आज्ञा’; पर साथ ही आदेश दिया कि सभी मृत शरीरों का तुरंत दाह संस्कार कर दिया जाए. इस प्रकार इंद्रदत्त का शरीर भी जला दिया गया और व्यादि को मंदिर से बाहर निकाल दिया गया.

उधर राजा बार, बार स्वर्ण शीघ्र देने का आग्रह कर रहा था, पर शकटाल ने कहा; ‘प्रजा अभी उत्सव मना रही है, ब्राह्मण को थोड़ी देर प्रतीक्षा करनी चाहिए.’

तभी व्यादि सभा में दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया; ‘एक ब्राह्मण योगावस्था में था, उसका शरीर बलपूर्वक जला दिया गया!’

यह सुनकर योगनंद अत्यंत व्याकुल हो उठा. और जब शकटाल को यह विश्वास हो गया कि शरीर नष्ट हो चुका है और ढोंगी फँस चुका है, तब उसने मुझे स्वर्ण मुद्राएँ दे दीं.

योगनंद ने व्यादि से अत्यंत पीड़ा भरे स्वर में कहा; ‘ब्राह्मण जन्म लेकर भी मैं अब शूद्र बन गया हूँ. इस वैभव का अब क्या मूल्य है?’

व्यादि ने उसे समझाया; ‘शकटाल सब समझ चुका है. वह महान मंत्री है और समय आने पर तुम्हारा नाश करेगा. वह पूर्व नंद के पुत्र चंद्रगुप्त को राजा बनाएगा. इसलिए तुरंत वररुचि को अपना प्रधान मंत्री बनाओ, तभी तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा.’

यह कहकर व्यादि अपने गुरु को दक्षिणा देने चला गया और योगनंद ने मुझे अपना महामंत्री नियुक्त किया.

मैंने राजा से कहा; ‘जब तक शकटाल सत्ता में है, आपका राज्य सुरक्षित नहीं. हमें उसका नाश करना होगा.’

यह सुनते ही योगनंद ने शकटाल और उसके सौ पुत्रों को एक अंधे कारागार में डाल दिया; ब्राह्मण की हत्या के अपराध में. प्रतिदिन केवल एक छोटी थाली जौ का दलिया और एक कटोरी पानी दिया जाता.

शकटाल ने अपने पुत्रों से कहा; ‘इतने में एक भी जीवित रहना कठिन है. इसलिए हम में से एक; जो योगनंद से प्रतिशोध ले; वही खाए.’

पुत्रों ने कहा; ‘आप ही इसके योग्य हैं.’

इस प्रकार प्रतिशोध जीवन से भी प्रिय था. शकटाल प्रतिदिन भोजन करता रहा और अपने पुत्रों को मरते देखता रहा. उसने मन ही मन सोचा; ‘जो व्यक्ति उन्नति चाहता है, उसे शक्तिशाली के साथ बिना स्वभाव समझे शत्रुता नहीं करनी चाहिए.’

उसके सौ पुत्र मर गए और वह अकेला अस्थियों के बीच जीवित रहा.

इधर योगनंद का राज्य दृढ़ होता गया. गुरु, दक्षिणा देकर लौटे व्यादि ने विदा लेते हुए कहा; ‘दीर्घायु हो मित्र, मैं अब अज्ञात स्थान पर तप करने जा रहा हूँ.’

योगनंद रोते हुए बोला; ‘मुझे छोड़ मत जाओ.’

व्यादि ने उत्तर दिया; ‘राजन्, शरीर क्षणभंगुर है. भोग, विलास बुद्धिमानों को नहीं लुभाते.’ यह कहकर वह चला गया.

इसके बाद योगनंद अपने पूरे दल के साथ राजधानी पाटलिपुत्र गया. मैं उसके मंत्री के रूप में समृद्ध हुआ और माता तथा वृद्धजनों के साथ, उपकोशा की देखरेख में, लंबे समय तक वहीं रहा.

मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा मुझे प्रतिदिन धन देती थी और साक्षात् सरस्वती मुझे बताती थीं कि आगे क्या करना है.”

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