समाज

आज पिथौरागढ़ में लखिया भूत देखने उमड़ते हैं लोग

सातों-आठों पिथौरागढ़ जिले का एक महत्वपूर्ण लोकपर्व है. लोक में गौरी को दीदी और महेश्वर को भिन माना जाता है. गौरा के मायके आने से शुरु हुआ यह पर्व महेश्वर और गौरा की विदाई के साथ संपन्न होता है. महेश्वर और गौरा की विदाई को स्थानीय बोली में गमारा सिलाना कहा जाता है. पिथौरागढ़ के कुछ स्थानों में इस पर्व के समापन एक अद्भुद कृषि झांकी के साथ होता है जिसे हिलजात्रा कहा जाता है.
(Hiljatra Kumor Pithoragarh 2022)

कहीं काली तो कहीं लखिया भूत हिलजात्रा में मुख्य देव हैं. कुमौड़ में होने वाली हिलजात्रा के संबंध में कहा जाता है कि इसका इतिहास 500 वर्षों से भी पुराना है. कुमौड़ में आज होने वाली हिल-जात्रा का रेखाचित्र पढ़िये. यह रेखाचित्र सुरेन्द्र धामी द्वारा लिखा गया है. हिलजात्रा पर सुरेन्द्र धामी का पूरा लेख यहां पढ़िये- हिलजात्रा: ग्रामीण कृषक समाज की जीवंत झांकी

सबसे पहले मैदान में आते हैं- झाड़ू लगाते स्त्री-पुरुष,  फिर हुक्का –चिलम पीते मछुवारे, फिर आती है शानदार बैलों की जोड़ी और हल लिया किसान जो बैलों को लेकर अपने खेतों में जा रहा है. इसके बाद आते हैं गल्या बल्द (अड़ियल बैल) और फिर शुरू होता है बैल और किसान के आपसी मान-मनुहार का स्वांग. किसान अपने अड़ियल बैल को मनाते हुए उससे  चलने को कहता है पर बैल जिद्दी है. हल जोतने के लिये जैसे ही उसे जुए में जोता जाता है तो वह खेत में लेट जाता है और किसान को परेशान करता है.

इस के साथ–साथ हुड़के की थाप और चांचरी के बोलों  के बीच महिलाओं की धान रोपाई और गुड़ाई का स्वांग भी चलते रहते हैं. यह  स्वांग इतने रोचक और जीवंत होते हैं कि दर्शक तुरंत ही इनसे जुड जाते हैं. बीच –बीच में ग्रामीण जीवन में पाए जाने वाले अन्य अहम् पात्र भी इसका हिस्सा बनते जाते हैं जैसे – शिकारी, साधु, घास काटती घ्स्यारी और रंग –बरंगे परिधानों में सजी नृत्य करती महिलायें और पुरुष.
(Hiljatra Kumor Pithoragarh 2022)

यह सभी  पात्र जो ग्राम–समाज का अभिन्न अंग हैं, लोक नृत्य- नाटिका से दर्शकों को जब पूरी तरह अपने सम्मोहन में ले चुके होते हैं. तभी अचानक ढोल-दमाऊ की तेज आवाज आने लगती है. यह सूचना है- हिलजात्रा के मुख्य पात्र लखिया भूत के आगमन की और इसके साथ ही पूरे मैदान की निगाहें आवाज का पीछा करते हुए मुख्य द्वार की तरफ घूम जाती है पूर्व के सारे पात्र मैदान के अलग–अलग कोनो में अपने स्थानो में बैठ जाते हैं और पूरी जगह को खाली कर दिया जाता है.

तब सर पर लकड़ी के विशाल मुखौटे, लाल-काली पोशाक, हाथों में दो काली चवंर, गले में रुद्राक्ष की माला और कमर में मोटी लोहे की जंजीर (जिसे दो गण पकड़े रहते हैं) के साथ ढोल-नगाड़े की विशिष्ट ध्वनि के साथ लयबद्ध तरीके से नाचते-कूदते हुए लखिया भूत मैदान में प्रवेश करता है. सभी लोग अक्षत और फूल चढ़ाकर लखिया भूत की पूजा अर्चना कर अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. घंटों चलने वाले हिलजात्रा पर्व का समापन उस लखिया भूत के वापस जाने के साथ होता है, जिसे भगवान शिव का गण माना जाता है. लखिया भूत अपनी डरावनी आकृति के बावजूद इस पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण है.
(Hiljatra Kumor Pithoragarh 2022)

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