कुमाऊँ का अनूठा नगीना है मुनस्यारी
अतीव सुन्दर जोहार घाटी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में बहने वाली गोरीगंगा नदी के किनारे अवस्थित है. परम्परागत रूप से जोहार घाटी को तीन भौगोलिक हिस्सों में बाँट कर देखा जाता रहा है – मल्ला (ऊप... Read more
कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 69
डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है – “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि वृहद हिंदी कोश का सन्दर्भ लिया जाए तो उस में लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई... Read more
दुनिया जहान को मालूम है कि पिथौरागढ़ के नैनी-सैनी हवाई अड्डे का इंतजार इस लोक में ही नहीं बल्कि परलोक में भी खूब हो रहा है. पूरी एक पीढ़ी आज भी स्वर्ग में अप्सराओं के नृत्य की ओर पीठ पलटाए स्व... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 24 पिछली कड़ी:कहो देबी, कथा कहो – 23, कब्बू और शेरा हां, उन्हीं दिनों की बात है. एक दिन एक साथी ने कहा, “सुना है, कोई मिस्टर त्यागी आए हैं. कुलपति से मिल कर यहां किए जा रह... Read more
समूचा हिंदुस्तान नजर आता है ‘बावर्ची’ फिल्म में
बावर्ची (1972) विघटित होते पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना को लेकर आई एक नए मिजाज की फिल्म थी. तब के दौर के हिसाब से यह फिल्म, एक बिल्कुल नये विषय को लेकर आई. ऋषि दा की फिल्मों के विषय आम... Read more
सुतली उस्ताद और फेसबुक
जल के असंख्य नाम होते हैं. मेरे एक परम सखा के भी ऐसे ही असंख्य नाम हैं. कोई तीसेक साल पहले एक दफा होली के मौसम में उन्होंने बाबा तम्बाकू के टीन के डिब्बे में छेद कर और उस छेद में से घासलेट म... Read more
कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 68
डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है – “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि वृहद हिंदी कोश का सन्दर्भ लिया जाए तो उस में लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई... Read more
चचा ग़ालिब के जन्मदिन पर उनकी हवेली से एक रपट
सुबह जब गली मीर क़ासिम जान पहुंचा तो उनकी हवेली, जिसे अब एक स्मारक में तब्दील कर दिया गया है, के आसपास कुछ ख़ास नज़र नहीं आया. बाहर उनके पोते के साथ अपने बच्चे को मदरसे ले जाने के लिए रिक्शे का... Read more
अक्सर हमें अपने बड़े-बूढ़ों से सुनने को मिलता है कि एक ज़माने में सैनिकों या किसी अन्य वजह से घर से मीलों दूर रह रहे प्रवासियों के परिवारजन उनकी अनुपस्थिति में ही उनका विवाह कर दुल्हन घर ले आया... Read more
देश में बनी पहली गढ़वाली फिल्म थी ‘जग्वाल’
बृहस्पतिवार, 4 मई 1983 का दिन. दिल्ली का रफ़ी मार्ग सैकड़ों की भीड़ से अटा हुआ था. रफ़ी मार्ग में स्थित मावलंकर आडिटोरियम के बाहर लोगों में टिकट लेने को लेकर होड़ लगी थी. मावलंकर आडिटोरियम के बाह... Read more


























