19वीं सदी का महान घुमक्कड़-अन्वेषक-सर्वेक्षक पण्डित नैन सिंह रावत (सन् 1830-1895) आज भी ‘‘सैकड़ों पहाड़ी, पठारी तथा रेगिस्तानी स्थानों, दर्रों, झीलों, नदियों, मठों के आसपास खड़ा मिलता है. लन... Read more
भयंकर बारिश के बीच गोरी नदी किनारे काली अंधेरी रात
सितम्बर में जाते मानसून के साथ हमने मिलम की दूसरी यात्रा शुरू की थी. जिस दिन हम पैदल चलना शुरू हुए उस दिन बारिश रुकी थी लेकिन उससे पहले दो तीन दिन काफी बारिश हुई थी. इस बार मैं गोविन्द से को... Read more
मिलम ग्लेशियर का वह सफ़र जो आखिरी हो सकता था
मिलम, कहते हैं किसी समय अल्मोड़ा जिले के सबसे बड़े गांवों में एक गिना जाता था. यह इतना बड़ा था कि यहाँ के बारे में एक किस्सा ही चल पड़ा. जब कोई नई दुल्हन ब्याह कर यहाँ आती थी तो जब सुबह पानी... Read more
पहली बार जोहार की यात्रा के लिए जब कमल दा के साथ निकला था तो मुझे कत्तई पता न था कि मैं किस तरह की जगह जाने वाला हूँ. मैंने अपने याशिका कैमरे के लिए तीन डब्बे फिल्म के जुटाए और एक बैग किया त... Read more
छिपला जात में स्वर्ग जाने का रास्ता
छिपला के दक्षिणी ढाल में भैमण गुफा में सभी यात्री अँधेरे में ही जाग कर आगे की यात्रा के लिए चल पड़े. हम इस लम्बी कतार में कहीं बीच में थे. गुफा के भीतर बुग्याल की नर्म घास बिछी थी लेकिन जैसे... Read more
कनार में भगवती कोकिला के मंदिर में रात बिताने के बाद हम भुप्पी के घर मेहमान बने. कल हमने उनके फटे झोले को सिला था आज उन्होंने हमारी भूख को. यहाँ पर अपने पर्स, बेल्ट और कुछ गैर जरूरी सामान को... Read more
मलैनाथ की कथा में छिपलाकोट से भागश्री को भगा लाने का बड़ा ही रोमांचक प्रसंग आता है. मलैनाथ सीराकोट के थे और छिपला कोट यहाँ से सामने उत्तर दिशा में दिखता. दोनों के बीच में घणधूरा का विशाल और... Read more
दारमा की अम्मा के नाम बेटे का बंद लिफ़ाफ़ा
जब हम सिनला की चढ़ाई पार कर रहे थे तो हमारे एक साथी की जेब में एक लिफाफा था. यह लिफाफा गुंजी में जंगलात के एक कर्मचारी ने दिया था जिसका गाँव गो था. इस लिफ़ाफ़े में उसने अपनी बूढ़ी माँ के लिए... Read more
डेढ़ जूता और ठाणी की धार
तवाघाट से मांगती के बीच सड़क टूटी थी तो हमें तवाघाट से ठाणी धार चढ़कर चौदास होते हुए आगे बढ़ना था. ठाणी की चढ़ाई किसी भी मुसाफिर के सब्र और हिम्मत का पूरा इम्तिहान लेती है. इस धार में कुछ कि... Read more
अन्वालों के डेरे और ब्रह्मकमल का बगीचा
अंग्रेज भले हमें सालों गुलाम बना कर गए हों उनके प्रति हमारा आकर्षण कभी कम नहीं हुआ. जैसे ही हमें कोई अंग्रेज नजर आता है हम कोशिश करते हैं कि कैसी भी अंग्रेजी में उससे बात कर ही लें. एक और मज... Read more


























