असल आवाज का जादू नकलची नहीं समझेंगे
असल आवाज का जादू नकलची नहीं समझेंगे -राहुल पाण्डेय कुछ साल पहले अयोध्या में एक शायद कभी न बनने वाली फिल्म के लिए ऑडिशन ले रहा था. कला की गर्मी में उबलते लोगों की कतार लगी थी, पर हम ठंडे होते... Read more
एक युवा कवि को पत्र – 1 – रेनर मारिया रिल्के
“एक युवा कवि को पत्र” महान जर्मन कवि रेनर मारिया रिल्के के लिखे दस ख़तों का संग्रह है. ये ख़त जर्मन सेना में भर्ती होने का विचार कर रहे फ़्रान्ज़ काप्पूस नामक एक युवा को सम्बोधित... Read more
आषाढ़ -लीलाधर जगूड़ी यह आषाढ़ जो तुमने मां के साथ रोपा था हमारे खेतों में घुटनों तक उठ गया है अगले इतवार तक फूल फूलेंगे कार्तिक पकेगा हमारा हँसिया झुकने से पहले हर पौधा तुम्हारी तरह झुका हुआ ह... Read more
पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत – दूसरा और अंतिम हिस्सा
(पिछले हिस्से का लिंक – पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत) पाब्लो नेरुदा (12 जुलाई 1904 – 23 सितंबर 1973) की रहस्यमय -सी मृत्यु पर हिन्दी दुनिया में विशेष चर्चा नहीं हुई‐ शायद इसलिए कि... Read more
संगतकार -मंगलेश डबराल मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी वह मुख्य गायक का छोटा भाई है या उसका शिष्य या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश... Read more
नदी, जंगल और बाउल की तान
उत्तर पूर्व : नदी, जंगल और बाउल की तान – जितेन्द्र भाटिया पश्चिम बंगाल का बागडोगरा हवाईअड्डा और इससे सटकर फैला सिलीगुड़ी शहर एक तरह से दार्जीलिंग, असम, सिक्किम और भूटान का सिंहद्वार है... Read more
मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से -रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ मैं साइमन न्याय के कटघरे में खड़ा हूं प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दे! मैं वहां से बोल रहा हूं जहां मोहनजोदड़ो के तालाब के आखिरी सीढ़ी है... Read more
वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे
अमृतलाल वेगड़ और रजनीकांत के नर्मदा वृत्त के आगे यह नर्मदा की दुर्दशा की अगली कहानी है. शिरीष खरे की यात्रा के लंबे कथोयकथन का यह एक अंश है. लेखक ने यह यात्रा कुछ साल पूर्व ‘तहलका’ में... Read more
कुछ कद्दू चमकाए मैंने -वीरेन डंगवाल कुछ कद्दू चमकाए मैंने कुछ रास्तों को गुलज़ार किया कुछ कविता-टविता लिख दी तो हफ़्ते भर ख़ुद को प्यार किया अब हुई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ हा... Read more
तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह ?
रामसिंह -वीरेन डंगवाल दो रात और तीन दिन का सफ़र तय करके छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रंक खोलो अपनी गन्दी जर्सी उतार कर कलफ़दार वर्दी पहन लो रम की ब... Read more


























