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नातिणी-बड़बाज्यू संवाद

‘नातिणी-बड़बाज्यू संवाद’ गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का ब्रजेन्द्र लाल शाह को श्रद्धांजलि देते हुये लिखे लेख ‘यह सृष्टि सुहागिन रहे कामना मेरी’ का हिस्सा है. ‘पहाड़’ पत्रिका के 12वें अंक में प्रकाशित इस लेख का अंतिम हिस्सा पढ़िये:
(Brijendra Lal Shah Natini Bubu)

ब्रजेन्द्र लाल शाह के बारे में तो लोग अधिकतर पढ़ते/समझते/जानते आये हैं. उनकी कुमाउँनी/गढ़वाली रामलीला के परशुराम लक्ष्मण संवाद, दशरथ-केकई संवाद, अगद-रावण संवाद काफी चर्चित रहे. लेकिन मैं यहाँ पर विशेष रूप से उनके उस अद्भुत ‘नातिणी-बड़बाज्यू संवाद’ को उद्धृत कर रहा हूँ जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम रही. इस संवाद की कोई बड़ी भारी-भरकम व्याख्या नहीं करनी मैंने. बस इतना कहना है कि किसी भी लोकधर्मी, कल्पनाशील और यथार्थवादी नृत्यकार प्रस्तुतकर्ता के लिए यह रचना पूरी नृत्य-नाटिका का स्क्रिप्ट है. जिसमें कुमाऊँ के वास्तविक जन-जीवन की झलक मंच पर उतारी जा सकती है.

मोहन उप्रेती, ब्रजेन्द्र लाल शाह और नईमा खान उप्रेती. फोटो: हेम पन्त के ब्लॉग ‘बस यूं ही बैठे बैठे’ से.

नातिणी-बड़बाज्यू संवाद

उतरेणी कौतिक ऐगो ओ बड़बाज्यू.
थर थरानै पूस न्हैगो ओ बड़बाज्यू..

होई नातिणी मैं लकी बजार जूंलो.
तेल, तमाखू, लूँण, गूड़ मोल ल्यूलो..

ओ बड़बाज्यू! धोति तुमरी बगी रे छौ.
आग लागौ सुर्याल माजी नाड़ो नै छौ..

ल्या नातिणी मेरि फतोई टाल हाली दे.
मेरि कुथई घर-कुटा तमाखु हाली दे..

लियो बड़बाज्यू यो आपुंणी ह्वाक लिजाया.
बाट-घाटाँ में स्याक्क-स्याक्क दम लगाया..

प्यास लागली काँठि रिखू चबून रैया.
भूख लागली यो भुटिया भट बुकाया..

पॉज नातिणी त्यौर सामल काम आलो
मरण बखत बुड़ो भट बुकालो..

जा बड़वाज्यू. आजि बताओ के के ल्याला?
तुम तो बुबू. भुलि जै जाँ छा बुड़ियाँकाला..

लाल मुखीया, वानर को पोथो ल्यूँलो.
वी दगड़ा खण्यूंणी को ब्या करूँलो..

पलि के जाओ मी तु थें नी बोलूँलो.
जो कौतिकी-बाना ल्याला पार चोटयूँलो..
(Brijendra Lal Shah Natini Bubu)

भावार्थ

उत्तरायणी का मेला आ गया दादाजी! ठिठुरता पौष चला गया.
हाँ, मेरी लाड़िली नातिन! मैं भी उत्तरायणी को बाजार मतलब बागेश्वर मेले में जाऊँगा.

तेल, तम्बाकू, नमक, गुड़ अर्थात् रोज मर्रा के उपयोग की चीजें लाऊँगा.
अरे दादाजी! तुम बाजार जाने की बात कर रहे हो पर जरा अपने पहनावे की दशा तो देखो!

धोती तो तुम्हारी बह रही है, पाजामे से बाहर लटकती हुई दिखाई दे रही है.
और पाजामे में नाड़ा ही नहीं है (यहाँ पाजामे के अन्दर घुटने तक की छोटी धोती पहनने का रिवाज पहले बहुत था. आज अब यह बात/यह बिम्ब हो सकता है एकदम समझ में न आ सके).
(Brijendra Lal Shah Natini Bubu)

बताइये तो! ऐसे और इस तरह फूहड़ ढंग से कपड़े पहनकर बाजार/मेले में जायेंगे आप? सोचिये जरा.
तू मेरी फतोई (वास्कट) में टल्ली तो लगा दे और मेरे कुथले’ में घर का बना हुआ तम्बाकू रख दे.

दादा जी! लीजिये ये आपका हुक्का. रास्ते में कश लगाते रहना.
प्यास लगेगी तो ये ‘काँठी’ (सख्त) रिक्खू चबाना, मुँह में तरावट आ जायेगी
और भूख लगने पर ये भूने हुवे ‘भट्ट’ (पहाड़ी सोयाबीन, जो भूनने के बाद निहायत सख्त हो जाते हैं) बुकाते (खाते) रहना.

ओ मेरी लाड़िली नातिन! संभाल कर रख तू ये सब चीजें जो-जो बता रही है मेरे रास्ते के लिए.
मरते वक्त (मतलब पोपले मुँह से) ये बुड्ढा ये सब सख्त चीजें खायेगा?

दादाजी बताओ न और क्या-क्या लायेंगे आप. मेले से?
मुश्किल तो ये है कि इस बुढ़ापे में आप भूल जाते हैं चीजों को.

ओ मेरी लाड़िली नातिन.
बागेश्वर मेले से मैं लाल मुँह वाला एक बन्दर का बच्चा लाऊँगा
और उसके साथ तेरा ब्याह रचाऊँगा.

दादाजी.
आप दूर हटिये.
मैं आपसे नहीं बोलती.
अब आप मेले से जो कुछ भी कौतिकिया बाना लायेंगे मैं उसे दूर फेंक दूंगी, कत्तई नहीं लूंगी.
(Brijendra Lal Shah Natini Bubu)

–गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’

‘पहाड़’ पत्रिका के बारहवें अंक से साभार.

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