उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की शादियां और वहां के रीति-रिवाज अपने आप में बहुत अनोखे हैं. समय के साथ शादियों के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है. चलिए आज बात करते हैं कुमाऊं की पुरानी ‘सरोल’ शादी की और आज के समय में होने वाली ‘अंचल’ शादी की रस्मों के बारे में.
(traditional kumaoni marriage)
जब बिना दूल्हे के ही विदा हो जाती थी दुल्हन
पुराने समय में कुमाऊं में सरोल विवाह का चलन था, जिसे लोग बढ़ा या डोल विवाह भी कहते थे. आजकल तो यह शादी देखने को नहीं मिलती, लेकिन पहले यह बड़े मज़ेदार तरीके से होती थी: इस शादी में सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि बारात में दूल्हा खुद जाता ही नहीं था! तय तारीख पर सिर्फ दूल्हे के सगे-संबंधी लड़की के घर जाते थे.
अब आप सोचेंगे कि बिना दूल्हे के शादी कैसे होती थी? तो होता यह था कि दूल्हे की जगह उसकी कोई भी निजी चीज़ बारात के साथ लड़की के घर भेजी जाती थी. लड़की के घर पर न तो कोई बड़ा पूजा-पाठ होता था और न ही कोई फेरे जैसी रस्म होती थी, बस लड़की को सीधे उसके मायके से ले आया जाता था. इस शादी में दूल्हा या दुल्हन के सिर पर मुकुट बांधने का भी कोई रिवाज़ नहीं था. आजकल यह पुरानी प्रथा बंद हो चुकी है. अब कुमाऊं में लोग या तो मन्दिर में शादी करते हैं या फिर पूरे रीति-रिवाजों के साथ अंचल विवाह करते हैं. आजकल कुमाऊं में ‘अंचल विवाह’ का बड़ा क्रेज है. इस शादी की हर छोटी-बड़ी रस्म में महिलाएं मंगल गीत गाती हैं, जिन्हें “शकुनाखर” कहा जाता है. चलिए जानते हैं कि यह शादी शुरू से अंत तक कैसे होती है:
रिश्ता तय होना और ‘लगन खनना’
मैदानी इलाकों में आमतौर पर लड़की वाले रिश्ता लेकर जाते हैं, लेकिन कुमाऊं में उल्टा होता है—यहां लड़के वाले लड़की के घर शादी का प्रस्ताव भेजते हैं. लड़की का चुनाव अपनी ही जाति (वर्ण) में लेकिन अलग गोत्र में किया जाता है. जब दोनों परिवार मान जाते हैं, तो पंडित जी से कुंडली मिलवाई जाती है. कुंडली मिलने पर ज्योतिष के हिसाब से वृहस्पति और शुक्र के उदय काल के दौरान कोई अच्छा सा मुहूर्त निकाला जाता है. पंडित जी के पास मुहूर्त निकलवाने जाने को “लगन खनना” कहते हैं और जब शादी पक्की हो जाती है, तो उसे “लगन सूझी गो” कहा जाता है. पहले लोग घर जाकर मुंह से बोलकर न्योता देते थे, पर अब छपे हुए कार्ड देने का रिवाज़ है.
सुवाल पथाई और हल्दी की रस्म
शादी के कामों की शुरुआत सबसे पहले गणेश पूजा से होती है. शादी से एक-दो दिन पहले दोनों के घरों में “सुवाल पथाई” की रस्म होती है, जिसमें आटे से ‘सुवाल’ और आटे, चावल व तिल के लड्डू बनाए जाते हैं. इन्हें सब रिश्तेदार मिलकर खाते हैं. इसके बाद दूल्हा-दुल्हन को अपने-अपने घरों में हल्दी लगाई जाती है. लड़की के हाथ में पीले कपड़े में सुपारी और सिक्का डालकर ‘कंकण’ बांधा जाता है. बेटी को हल्दी लगने के बाद से उसके माता-पिता व्रत रखते हैं, जो उसकी विदाई तक चलता है.
(traditional kumaoni marriage)
पिठ्या लगाना
बारात घर पहुंचने से कुछ देर पहले, लड़के वाले 5 या 7 लोगों को दही, हरी सब्जी और लड़की के लिए कपड़े-गहने लेकर लड़की के घर भेजते हैं. ये लोग लड़की को तिलक लगाकर उपहार देते हैं, जिसे “पिठ्या लगाना” या “ढांक-पिठाक” कहते हैं. यह रस्म बिल्कुल मैदानी इलाकों की सगाई जैसी ही है, बस फर्क इतना है कि इसमें दूल्हा साथ नहीं आता.
बारात का स्वागत और ‘धूलि अर्घ्य’
पहाड़ की बारातें ढोल, रणसिंह, मशकबीन और पारंपरिक छोलिया डांस के साथ निकलती थीं, हालांकि आजकल बैंड-बाजे भी बजने लगे हैं. बारात जब लड़की के घर पहुंचती है, तो कुंवारी लड़कियां पानी से भरा कलश लेकर स्वागत करती हैं. लड़की का छोटा भाई दूल्हे का छाता बदलता है और लड़की का बड़ा भाई दूल्हे को गोद में उठाकर अंदर लाता है, जहां पांच महिलाएं दूल्हे की आरती उतारती हैं. इसके बाद दूल्हे और पंडित जी को दो चौकियों पर खड़ा करके दूल्हे के पैर धोए जाते हैं और पूजा करके उन्हें भेंट दी जाती है, जिसे “धूलि अर्घ्य” कहते हैं.
‘गोठ’ में कन्यादान और आँगन में फेरे
कुमाऊं में कन्यादान की मुख्य पूजा घर के निचले हिस्से में होती है, जिसे स्थानीय भाषा में “गोठ” कहा जाता है. दुल्हन को दूल्हे के घर से आए गहनों से सजाकर लाया जाता है. शुरू में दूल्हा-दुल्हन के बीच एक पर्दा लगाया जाता है. लड़की वाले पश्चिम की तरफ और लड़के वाले पूर्व की तरफ मुंह करके बैठते हैं. मंत्रों के साथ कन्यादान शुरू होता है. लड़की के पिता अपनी बेटी का अंगूठा दूल्हे को पकड़ाते हैं और लड़की की मां लोटे से पानी की धार गिराती हैं, इसे ‘गडुवे की धार डालना’ कहते हैं. इसके बाद पर्दा हटा दिया जाता है, दुल्हन दूल्हे के बगल में बैठती है, उसे मुकुट पहनाया जाता है और दोनों का गठबंधन होता है.
कन्यादान के बाद की रस्में बाहर आँगन में बने मंडप में होती हैं. इस आँगन की पूजा को देखना लड़की के माता-पिता के लिए मना होता है. यहाँ दोनों फेरे लेते हैं, जिसमें लड़की का भाई उसे चावल देता है और लड़की फेरे के अंत तक उन्हें गिराती चलती है. फेरों के बाद सिन्दूर भरा जाता है, ध्रुव तारा दिखाया जाता है और एक-दूसरे को जूठा खिलाने की रस्में होती हैं. फिर लड़की की विदाई होती है और बारातियों को भी विदाई पर भेंट दी जाती है, जिसे “बरैति” कहते हैं.
नौले की पूजा
दुल्हन जब अपने ससुराल पहुंचती है, तो आरती से उसका स्वागत होता है. इसके तुरंत बाद दूल्हा-दुल्हन को पास के किसी नौले या धारा पर ले जाया जाता है. वहां पूजा करने के बाद दोनों के सिर के मुकुट वहीं खोलकर रख दिए जाते हैं. आखिर में दुल्हन उस जलस्रोत से पानी भरकर लाती है और घर के बड़े-बुजुर्गों को पिलाकर उनका आशीर्वाद लेती है.
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