उपकोशा और उसके वर

यह कथा कथासरित्सागर से ली गई है—एक प्राचीन कश्मीरी कथा-संग्रह, जिसकी परंपरा पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी है. कथासरित्सागर स्वयं कई कहानियों की एक बहती हुई नदी है, जहाँ एक कथा से दूसरी कथा जन्म लेती है. आप हमारी वेबसाइट पर पहले ही “पुष्पदन्त और माल्यवान को मिला श्राप” और “पुष्पदंत बने वररुचि और सीखे वेद”, और पाटलिपुत्र की स्थापना की कथा पढ़ चुके हैं. उन्हीं कथाओं की निरंतरता में, अब हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं : उपकोशा और उसके वर

उपकोशा और उसके वर

वररुचि जब अपने गुरुओं व्यादि और इन्द्रदत्त के साथ विद्याध्ययन कर रहे थे, उसी समय एक दिन इन्द्रोत्सव के दौरान उनकी दृष्टि एक अत्यंत सुंदर युवती पर पड़ी. वह सौंदर्य में ऐसी थी मानो कामदेव ने स्वयं उसे गढ़ा हो. उसके मुख पर चंद्रमा जैसी शांति थी, आँखें नीलकमल सी और व्यवहार में गंभीरता.

वररुचि ने पूछा कि वह युवती कौन है. उन्हें बताया गया कि उसका नाम उपकोशा है और वह उनके गुरु उपवर्ष की पुत्री है. उधर उपकोशा भी वररुचि के बारे में जान चुकी थी और दोनों एक-दूसरे को बिना बोले ही पहचान चुके थे.

उस रात वररुचि प्रेम-व्याकुल रहे. स्वप्न में उन्हें श्वेत वस्त्रधारी एक देवी दिखाई दीं, जिन्होंने कहा; “घबराओ मत. उपकोशा तुम्हारी पूर्वजन्म की पत्नी है. वह केवल तुम्हें ही स्वीकार करेगी. मैं सरस्वती हूँ और तुम्हारे कष्ट को नहीं देख सकती.”

यह सुनकर वररुचि को धैर्य मिला. उन्होंने उपकोशा की सखी के माध्यम से सम्मानपूर्वक विवाह का प्रस्ताव भिजवाया. दोनों परिवारों की सहमति से विधिवत विवाह हुआ और कुछ समय तक वररुचि सुखपूर्वक जीवन जीते रहे.

लेकिन समय बदला. व्याकरण के महान विद्वान पाणिनि से शास्त्रार्थ में पराजय के बाद वररुचि ग्लानि से भर गए. उन्होंने हिमालय जाकर तपस्या करने का निश्चय किया और अपनी पत्नी उपकोशा को नगर में छोड़ गए.

उपकोशा पतिव्रता स्त्री थी. वह प्रतिदिन गंगा-स्नान, व्रत और पूजा करती और पति की सफलता की कामना करती. लेकिन उसकी सुंदरता कई पुरुषों की दुर्भावना का कारण बन गई. एक ही दिन में राजा का पुरोहित, नगर अधिकारी और राजकुमार का सचिव; तीनों उस पर मोहित हो गए.

उपकोशा ने किसी से सीधे टकराव के बजाय बुद्धि का मार्ग चुना. उसने तीनों से अलग-अलग समय पर मिलने का वचन दिया; उत्सव की उसी रात, अलग-अलग पहरों में. इसके बाद एक लोभी व्यापारी हिरण्यगुप्त ने भी उसके पति की धरोहर लौटाने के बदले अनुचित मांग रखी. उपकोशा ने उससे भी अंतिम पहर में मिलने का समय तय किया.

रात आने से पहले उपकोशा ने अपनी दासियों के साथ एक योजना बनाई. एक बड़े संदूक, काले तेल और कालिख की तैयारी की गई. जो भी पुरुष आया, उसे स्नान के बहाने अंधेरे कमरे में ले जाकर उसके वस्त्र उतरवाए गए, शरीर पर कालिख-मिश्रित तेल लगाया गया और एक-एक कर सबको उसी संदूक में बंद कर दिया गया.

अंत में व्यापारी आया. उससे उपकोशा ने धन की बात सार्वजनिक रूप से कहलवाई, ताकि संदूक में बंद लोग गवाह बन सकें. फिर व्यापारी को भी उसी हाल में भगा दिया गया.

अगली सुबह उपकोशा स्वयं राजा के दरबार पहुँची और पूरे प्रकरण की सूचना दी. संदूक मंगवाया गया. जब खोला गया तो तीनों प्रतिष्ठित पुरुष कालिख में सने, नग्न और भयभीत बाहर निकले. दरबार में हँसी भी हुई और लज्जा भी.

सच सामने आने पर राजा ने चारों दोषियों को राज्य से निष्कासित कर दिया और उनका धन जब्त कर लिया. उपकोशा की बुद्धिमत्ता, धैर्य और चरित्र की प्रशंसा पूरे नगर में हुई. राजा ने उसे अपनी बहन का सम्मान दिया. जब वररुचि लौटे और उन्हें यह सब ज्ञात हुआ, तो वे अपनी पत्नी की विवेकशीलता पर गर्व से भर उठे.

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