1842 से छप रहे हैं उत्तराखण्ड में अखबार
उत्तराखंड में पत्रकारिता की शुरूआत -विनीता यशस्वी पहले अखबार उत्तराखंड के कुमाऊनी व गढ़वाली दोनों इलाकों में पत्रकारिता का इतिहास बेहद प्राचीन और रोचक रहा है. कहा जा सकता है कि 1842 में जॉन म... Read more
उत्तराखंड में आज शराब अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बन गयी है. शराब बंदी का नारा देकर सरकार बनाने वाली पार्टियां हर साल शराब से राजस्व में 10% की वृद्धि लक्षित कर रही हैं. अधिनियमन बनाकर... Read more
कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 81
डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है – “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि वृहद हिंदी कोश का सन्दर्भ लिया जाए तो उस में लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई... Read more
मकर संक्रान्ति भारत और नेपाल के हिंदुओं द्वारा मनाये जाने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है. मकर संक्रान्ति का त्यौहार पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. पौष मास में जब सूर्य... Read more
सरदार मान सिंह के रूप में सुन्दरलाल बहुगुणा
तीन बेटों और दो बेटियों के बाद 9 जनवरी 1927 को टिहरी रियासत के वन अधिकारी अम्बादत्त बहुगुणा के घर एक बेटे का जन्म हुआ. अम्बादत्त बहुगुणा और पूर्णादेवी गंगा के भक्त थे सो उन्होंने अपने सबसे छ... Read more
हुड़के की गमक और हुड़किया बौल
उत्तराखण्ड में लोकगीतों की लम्बी परम्परा रही है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इसे लिखित रूप में सहेज कर रखने का प्रयास बहुत देर से तो हुआ ही लेकिन धीमा भी बहुत हुआ. लोकगीत मौखिक ही एक पीढ़ी से दू... Read more
कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 80
डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है – “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि वृहद हिंदी कोश का सन्दर्भ लिया जाए तो उस में लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई... Read more
गंदरायण: अंतर्राष्ट्रीय ठसक वाला पहाड़ी मसाला
गंदरायण, गंदरायणी, गंदरायन या छिप्पी नामों से जाना जाने वाला हिमालयी मसाला ठेठ पहाड़ी खान-पान का अहम मसाला है. राजमा, झोई (कढ़ी) और गहत, अरहर व भट के डुबके (फाणु) में इसका दखल व्यंजन की खुश्बू... Read more
आसमान टूट पड़ा
कहो देबी, कथा कहो – 27 पिछली कड़ी: कहो देबी, कथा कहो – 26 चंद्रशेखर लोहुमी को जानते हैं आप? उस साल बाज्यू फागुन आखीर तक पंतनगर में हमारे पास ही थे. उन्हें पहाड़ याद आने लगा था और वे कुछ दिन रु... Read more
पारंपरिक लोक-संगीत की धरोहर ‘हरदा सूरदास’
बात कुछ साल पुरानी होगी. संभवतः 1980-81 की. मई-जून का महीना. नैनीताल टूरिस्टों से खचा-खच भरा हुआ. शहर की माल रोड मोटर-कारों से त्रस्त. ऐसे वातावरण में स्टेट बैंक मल्लीताल के पास मेरे कान में... Read more
Popular Posts
- दिवाली के मौके पर गाँव में बिताए पुराने पलों की याद
- पंतनगर विश्वविद्यालय: हरित क्रांति की वह कहानी, जिस ने भारत के गाँवों की तस्वीर बदल दी
- मशीन को मनुष्य बनाते मनुष्य (`वी वर हियर’ ऐज़ ‘ह्यूमंस इन द लूप’!)
- उत्तराखंड के पहाड़ों का कटु सत्य है पायर “चिता”
- डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया: उत्तराखंड के इतिहास, समाज और अर्थव्यवस्था को समझने की एक दृष्टि
- पहाड़ का वह बूढ़ा पिता
- कुमाऊं में रामलीला की परम्परा
- ‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…
- हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें
- ‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है
- धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’
- गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी
- देवदार या देव दारु
- कसारदेवी : जहां स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है
- दुर्गम पहाड़ों तक कैसे पहुंचे महाराष्ट्र-गुजरात के पर्व
- पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता
- अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें
- अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक
- सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन
- उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज
- कामिनी तुम कौन?
- पूर्वी नयार नदी की वो बाढ़
- कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा
- बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार
- आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”
