जीवन अपने आप में एक दुर्घटना है : त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का अंतिम हिस्सा
(पिछली कड़ी: ब्रिटिश एयरफोर्स से जंगलात की नौकरी तक का सफ़र : त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का तीसरा हिस्सा) सब कुछ ठीक चल रहा था. 1962 के शरद में चीनियों ने हमारी सरहद पार कर कश्मीर और अरुणां... Read more
ब्रिटिश एयरफोर्स से जंगलात की नौकरी तक का सफ़र : त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का तीसरा हिस्सा
(पिछली कड़ी: बाबू का घर छोड़ना और अकेले बालक का संघर्ष – त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का दूसरा हिस्सा) मुझे तीसेक साल पहले अपने मकान की चार दीवारों के भीतर अपने पिताजी के साथ बैठकर बातच... Read more
बाबू का घर छोड़ना और अकेले बालक का संघर्ष – त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का दूसरा हिस्सा
(पिछली कड़ी – पिछली सदी के पहाड़ का दर्द जी उठता है त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा में) जब मैं छात्रावास में ही था, अगस्त 1938 के पहले हफ़्ते में मुझे एक हरकारे द्वारा छः पन्ने का पत्र प्... Read more
हल्द्वानी के रहने वाले श्री त्रिलोक सिंह कुंवर की यह जीवनगाथा मानवीय संवेदनाओं और संघर्षों का ऐतिहासिक बयान है. एक साधारण इंसान की यह साधारण आत्मकथा उतने ही नाटकीय घटनाक्रमों से बुनी हुई है... Read more
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