पहाड़ और मेरा बचपन – 6
Posted By: Kafal Treeon:
(पिछली क़िस्त से आगे. पिछली क़िस्त का लिंक – पहाड़ और मेरा बचपन दिल्ली की कुछ और यादें मेरे स्मृतिपटल पर इतनी साफ अंकित हैं कि उनका ब्योरा दिए बिना आगे बढ़ना अनुचित होगा. सिर्फ इसलिए नहीं... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 5
Posted By: Kafal Treeon:
पिछली क़िस्त – पहाड़ और मेरा बचपन – 4 गांव में उन बहुत बचपन के दिनों के बाद मुझे दिल्ली के दिन याद आते हैं. पर दिल्ली का बचपन विषय से बाहर का मामला हो गया. लेकिन अगर उस बचपन के बारे में... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 4
Posted By: Kafal Treeon:
पिछली क़िस्त पहाड़ और मेरा बचपन – 3 गांव की और भी कई धुंधली यादें हैं. मसलन यह कि मैं ज्यादातर अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलता था. दो के नाम मां आज भी लेती है. एक कल्यूरी और दूसरी आशा. दोनो... Read more
Popular Posts
- कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा
- चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार
- मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब
- पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे
- ‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है
- सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन
- मानव और प्रकृति का संबंध प्राचीन, गहरा और अविभाज्य है
- न रुकदि छै, न थकदि छै, नयार जन बगदि छै : संकट में है नयार
- कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा
- दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है
- उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी
- एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!
- रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन
- हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी
- भारतीय परम्परा और धरती मां
- शकटाल का प्रतिशोध
- एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता
- बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान
- बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है
- जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि
- आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’
- द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा
- हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता
- पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया
- कुमाऊँ की खड़ी होली
