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  1. nazim ansari

    मुझे रानीखेत के चेहल्लुम (मुहर्रम के चालीस दिन बाद मनाया जाने वाला ग़मी का पर्व) की उस समय की अच्छी याद है जब मैं तीन-साढ़े तीन साल का था पापा अल्मोड़े से मुझे चेहल्लुम दिखाने रानीखेत ले गए थे सन 1959-60 रहा होगा। पापा की गोद से जो नज़ारा देखा था आज भी याद है -बहुत बड़े और चौड़े ख़ूबसूरत ताज़िए ,बीच में स्टैंड पर रखा ताशा जिसके चारों तरफ़ ढोल वाले एक गोल घेरे में ढोल बजाते हुए चक्कर लगाते थे तीन का हाथ (तीन ताल ) बजता था जबकि अल्मोड़े में सात का हाथ (सात ताल ) चलता था। यह नज़ारा मैं ने ज़रूरी बाज़ार में देखा था। अब आप सोच सकते हैं कि एक बच्चे को ज़रूरी बाज़ार का पता कैसे चला तो इसका जवाब है 1973 से 1976 तक इस बच्चे ने रानीखेत के मिशन इंटर कॉलेज से पढ़ा ,मजखाली,गनियाद्योली,पिलखोली सब पैदल नापा ,पापा ने यहाँ ट्रेज़री में नौकरी की। सुदामापुरी का मकान न ० 617 और बग़ीचा जो राजपुर तक था मेरे दादा बशीर खान का पैतृक आवास था। मुझे खटीक बिल्डिंग,हवलदार की दुकान जहां दस पैसे रोज़ के हिसाब से उपन्यास किराए पर मिलते थे ,कैंट की लाइब्रेरी,सिविल अस्पताल से थोड़ा आगे कुंवर दा के छोले-चाय का स्वाद ,लाल सौदागर ,सदर बाज़ार में इमामबाड़ा , पोस्ट ऑफिस,ग्लोब सिनेना,लेक्चर हॉल की यादें आज पचास साल बाद भी कल की घटना की तरह लगती हैं। मैं ने अल्मोड़े में बचपन में मुहर्रम का धनिया खाया है इसमें रेता हुआ गोलऔर धनिया होता था। नई पीढ़ी तो इन नायाब चीज़ों के नाम तक नहीं जानती। इसकी याद दिलाने के लिए शुक्रिया।

  2. Nazim Ansari

    मुझे रानीखेत के चेहल्लुम (मुहर्रम के चालीस दिन बाद मनाया जाने वाला ग़मी का पर्व) की उस समय की अच्छी याद है जब मैं तीन-साढ़े तीन साल का था पापा अल्मोड़े से मुझे चेहल्लुम दिखाने रानीखेत ले गए थे सन 1959-60 रहा होगा। पापा की गोद से जो नज़ारा देखा था आज भी याद है -बहुत बड़े और चौड़े ख़ूबसूरत ताज़िए ,बीच में स्टैंड पर रखा ताशा जिसके चारों तरफ़ ढोल वाले एक गोल घेरे में ढोल बजाते हुए चक्कर लगाते थे तीन का हाथ (तीन ताल ) बजता था जबकि अल्मोड़े में सात का हाथ (सात ताल ) चलता था। यह नज़ारा मैं ने ज़रूरी बाज़ार में देखा था। अब आप सोच सकते हैं कि एक बच्चे को ज़रूरी बाज़ार का पता कैसे चला तो इसका जवाब है 1973 से 1976 तक इस बच्चे ने रानीखेत के मिशन इंटर कॉलेज से पढ़ा ,मजखाली,गनियाद्योली,पिलखोली सब पैदल नापा ,पापा ने यहाँ ट्रेज़री में नौकरी की। सुदामापुरी का मकान न ० 617 और बग़ीचा जो राजपुर तक था मेरे दादा बशीर खान का पैतृक आवास था। मुझे खटीक बिल्डिंग,हवलदार की दुकान जहां दस पैसे रोज़ के हिसाब से उपन्यास किराए पर मिलते थे ,कैंट की लाइब्रेरी,सिविल अस्पताल से थोड़ा आगे कुंवर दा के छोले-चाय का स्वाद ,लाल सौदागर ,सदर बाज़ार में इमामबाड़ा , पोस्ट ऑफिस,ग्लोब सिनेना,लेक्चर हॉल की यादें आज पचास साल बाद भी कल की घटना की तरह लगती हैं। मैं ने अल्मोड़े में बचपन में मुहर्रम का धनिया खाया है इसमें रेता हुआ गोला और धनिया होता था। नई पीढ़ी तो इन नायाब चीज़ों के नाम तक नहीं जानती। इसकी याद दिलाने के लिए शुक्रिया।

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