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  1. मोहम्मद नाज़िम अंसारी

    शमशेर दा जैसे नेता अब उत्तराखंड में पैदा होने बंद हो चुके हैं। वह स्वयं में एक आंदोलन थे क्योंकि जल,जंगल ज़मीन से लेकर हर राजनीतिक ,सामाजिक मुद्दे के लिए वे संघर्षरत रहे ,उन्हें कायर कहने /समझने वालों के लिए मैं अपने छात्र-जीवन की उस घटना का ज़िक्र कर रहा हूँ जिसने पहली बार शमशेर दा से मेरा परिचय कराया। संघटक महाविद्यालय ,अल्मोड़ा का आपातकाल के बाद पहला छात्र-संघ चुनाव था। मैं बी ० ए ० प्रथम वर्ष का छात्र था और कक्षा प्रतिनिधि जैसे मामूली पद का प्रत्याशी भी था। शाम का अँधेरा हो चुका था मतगणना जारी थी। हम सभी छात्र हॉल में चल रही इस प्रक्रिया को अंग्रेज़ी विभाग के सामने की दीवार के रोशनदान से देख रहे थे। अध्यक्ष पद की घोषणा होते ही गोली चलने की अवाज़ के साथ अफरा-तफरी और भय का माहौल हो गया। मैं भी बहुत डर गया था और मैंने अब कभी छात्र-राजनीति में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया। चुनाव परिणाम आने के बाद जुलूस कॉलेज से निकल कर बाज़ार से गुज़रता था लेकिन इस घटना के कारण उस शाम जुलूस नहीं निकल सका। जो प्रत्याशी हारा था वह हॉस्टल का छात्र था और गुंडा प्रवृति का भी था। तब कॉलेज का एक ही मुख्य गेट था जिससे प्रवेश करते ही कैंटीन भवन और हॉस्टल भवन पड़ते थे और जुलूस के यहाँ से गुज़रने पर किसी अनहोनी की आशंका थी। दूसरे दिन शमशेर दा को इस विजय-जुलूस का नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया (शमशेर दा उस समय महाविद्यालय के छात्र नहीं थे (1977 ) लेकिन एक दमदार,निडर भूतपूर्व छात्र -संघ अध्यक्ष थे और चिपको आंदोलन के अग्रणी नेता थे ) और उनके नेतृत्व में यह जुलूस बिना किसी बाधा के निकला। इस समय ही पहली बार उन्हें देखा यह पता नहीं था कि वे अपने ही मोहल्ले (थाना बाज़ार ) के रहने वाले है।

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