कला साहित्य

लिखा हुआ पत्ता : कुमाऊनी लोककथा

एक था गरीब ब्राह्मण. उसकी एक पत्नी थी – ब्राह्मणी. ब्राह्मणी घूम-घूम कर भीख माँगा करती थी. इसी तरह वे दोनों गुजारा कर रहे थे.
(Kumaoni Folklore by Ivan Minayev)

एक बार ब्राह्मणी ने सुना कि कोई राजा हर किसी को एक-एक स्वर्ण मुद्रा और एक-एक गाय दे रहा है. यह सुन कर ब्राह्मणी ने अपने पति से कहा –

तुम दिन भर घर में बैठे रहते हो. सोने और खाने के अलावा तुम्हारा और कोई काम नहीं है. तुम उस जगह जाओ जहाँ का राजा हर किसी को सोने का एक-एक सिक्का और एक-एक गाय बाँट रहा है. आज ही उधर जाओ! माँगने पर जो भी मिलेगा ले आना.

ब्राहमण ने उत्तर दिया –

मुझे कुछ भी नहीं मालूम है. मैं किसी अनजान जगह में कैसे जाऊँ? राजा से मैं क्या कहूँगा? कुछ कहने को है ही नहीं. ब्राह्मण की बात सुन कर ब्राह्मणी ने समझाया – रास्ते में जो कुछ भी देखोगे, वही सब वहाँ जाकर बता देना. ब्राह्मण घर से निकल पड़ा. उसने रास्ते में क्या-क्या देखा –

एक गड्ढे में छिपकली बैठी हुई थी जिसने अपना मुँह बाहर निकाल कर कहा – “कुट्! कुट्’.

ब्राह्मण ने जो भी देखा याद कर लिया. वह आगे बढ़ गया और रास्ते भर ‘कुट्! कुट्’ कहता जा रहा था.

इसके बाद उसने रास्ते में क्या देखा? एक साँप अपना फन उठा कर घिरौली को पकड़े हुए था.
(Kumaoni Folklore by Ivan Minayev)

ब्राह्मण ने जो भी देखा याद कर लिया कि बाहर को निकली हुई गर्दन देखने में बहुत सुन्दर थी. वह आगे बढ़ गया. आगे उसने रास्ते में क्या देखा?  

वह पानी से भरे एक गड्ढे के पास पहुँचा जिसमें एक सूअर बैठा हुआ था. बीच-बीच में वह पानी से बाहर आ रहा था, दीवार से अपने शरीर को रगड़ता था और फिर से पानी में चला जाता था.

ब्राह्मण ने जो भी देखा याद कर लिया – ‘खिस! खिस!’ (रगड़ने की आवाज) और आगे बढ़ गया.

इस तरह ब्राह्मण ने तीन बातें याद कर ली – कुट्-कुट्, बाहर को निकली हुई गर्दन देखने में सुन्दर लगती है और खिस्! खिस्! करके रगड़ा और फिर से भाग गया.

तुम क्या कर रहे हो, मैं जानता हूँ! तुम क्या कर रहे हो, मैं जानता हूं, ब्राह्मण ने अपने मन में इस तरह विचार किया और किसी व्यक्ति को यह सब एक पत्ते पर लिखवा कर ब्राह्मण ने पत्ता राजा को सौंप दिया. राजा ने उसके बदले ब्राह्मण को एक उपहार दिया.

राजा ने उस लिखे हुए पत्ते को बीच की मंजिल में शयन-कक्ष में अपने पलंग के पास और पलंग के नीचे की तरफ लगाने का आदेश दिया.

एक बार की बात है कि रात को राजा अपने तिमंजिला महल की बीच की मंजिल में सो रहा था. आधी रात को वहाँ चोर आए.  कुट्-कुट्, दीवार में छेद करते समय चोरों की आवाज सुनाई दी. चोर सबसे ऊपर के छज्जे पर चढ़ गए और गर्दन अन्दर करके देखने लगे कि राजा सो रहा है या जागा है.

‘खिस्स!’ आवाज करते हुए वे नीचे उतरे. फिर से ‘खिस्स’ करके वे ऊपर आ गए.

इतने में राजा की नींद खुल गई और उसने अपने पाँवों की देखा. राजा की नजर दीवार पर लगे हुए पत्ते पर गई जो ब्राह्मण का उपहार था. राजा ने लेटे-लेटे ही पढ़ा –

1. कुट्! कुट्! करके आवाज देता है.

2. बाहर को निकली हुई गर्दन देखने में अच्छी है!

3. खिस्! खिस्! रगड़ कर फिर से भाग गया!

तुम क्या कर रहे हो, मैं जानता हूँ! तुम क्या कर रहे हो, मैं जानता हूँ!

चोरों को इतने में रास्ता दिखाई दे गया और वे भीड़ में घुल-मिल कर भाग गए.

पहरेदारों को धम्म-धम्म की आवाज सुनाई दी. उन्होंने झट से दौड़ कर चोरों को पकड़ लिया और उन्हें कचहरी में बन्द कर दिया.

“तुम कौन हो? किस देश से आए हो?” – राजा ने चोरों से पूछा. चोरों ने उत्तर दिया –

“हमें मार डालो! काट डालो! जैसे आपकी मर्जी! हम तो आपके महल में चोरी करने के इरादे से आए थे. आपको पता चल गया हम भाग खड़े हुए. आपके पहरेदारों ने हमें पकड़ लिया.”

राजा ने उनसे पूछा – “मुझे क्या और कैसे पता चला?”

चोरों ने उत्तर दिया –

“हमने घर में छेद करना शुरू किया और आपको कुट्-कुट् की आवाज से पता चल गया. हमने गर्दन निकाल कर देखना चाहा कि आप सो रहे हैं या जागे हैं. तब आपने कहा कि ‘बाहर को निकली हुई गर्दन देखने में अच्छी है. हमने देखा कि आप सो नहीं रहे थे. इसलिए हम ऊपर-नीचे आने-जाने लगे और तब आपने कहा – ‘खिस्! खिस्! रगड़ कर फिर से भाग गया ‘ इस तरह आपको सब कुछ पता चलता रहा.“

इस प्रकार से ब्राह्मण का वह लिखा हुआ पत्ता राजा के बहुत काम आया.
(Kumaoni Folklore by Ivan Minayev)

ई. पा. मिनायेव द्वारा रूसी में लिखे कुमाऊनी लोक कथाओं के संकलन का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रूसी भाषा के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे प्रोफ़ेसर हेमचन्द्र पांडे द्वारा किया गया यह हिंदी अनुवाद उनकी किताब कुमाऊंनी की लोककथाएं से साभार किया गया है.

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