टिहरी राजवंश में कीर्ति शाह सबसे महत्वपूर्ण राजाओं में थे. कीर्ति शाह ने राज्य को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया. कीर्ति शाह को टिहरी का अशोक भी कहा गया. टिहरी रियासत के राजा कीर्ति शाह का शासन लोक हितों को प्राथमिकता देने वाला एसा शासन था.
(King Kirti Shah Tehri Dynasty)
1892 में आगरा में उत्तर भारत के देशी रियासतों के एक सम्मेलन में गवर्नर लॉर्ड लैंसडाउन ने अन्य रियासतों के शासकों से कीर्ति शाह को आर्दश बनाने की बात करते हुये कहा-
यह बड़े सौभाग्य की बात होगी कि भारत के नरेश गढ़वाल के राजा महाराजा कीर्ति शाह को अपना आदर्श बनाएं, उनके सदृश्य योग्यता प्राप्त करने का कार्य करें.
इस कथन का अभिप्राय यह है कि 1892 में टिहरी रियासत लोक प्रशासन के सामान्य उद्देश्य को पूरा कर रही थी. ब्रिटिश शासन का यह आश्चर्यजनक विरोधाभास दिखाई देता है कि जहां वह एक ओर भारत के प्राकृतिक संसाधनों का व्यवसायिक दोहन करना चाहते थे वहीं वह जानते थे कि इस दोहन प्रक्रिया को लंबा चलाने के लिए उन्हें लोक प्रशासन, लोक हितैषी बनाए रखना होगा ताकि विरोध के स्वरों को रोका जा सके. इसी उद्देश्य से ब्रिटिश शासन ने जगह-जगह लोक प्रशासन के कार्यों को बढ़ावा दिया भूमि की पैमाइश व बंदोबस्त किया. करों का ढांचा सरल किया, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया.
1886 में महाराजा प्रताप शाह की अकाल मृत्यु पर कीर्ति शाह 12 वर्ष के बालक थे. तब 6 वर्षों तक महारानी गुलेरिया द्वारा विद्वत परिषद की सहायता से रियासत के कार्यों को आगे बढ़ाया. इस अवधि में कीर्ति शाह बरेली में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. वह बेहद प्रतिभाशाली छात्र थे. उन्होंने 8776 /10000 अंक प्राप्त कर हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की और तीन गोल्ड मेडल प्राप्त किए.
1892 में राजगद्दी प्राप्त करते ही कीर्ति शाह ने अपने राज्य की दिशा एक कल्याणकारी राज्य के रूप में मोड़ दी. सर्वप्रथम शिक्षा के विस्तार के लिए प्रताप शाह द्वारा टिहरी में स्थापित प्रताप पाठशाला को प्रताप हाई स्कूल करने के साथ ही कैम्वल बोर्डिंग हाउस, हिंवेंट संस्कृत पाठशाला ,मौम्डन मदरसा के साथ ही कन्या पाठशाला की भी स्थापना की. शिक्षा के प्रसार की दृष्टि से अल्मोड़ा के रैमजे इंटर कॉलेज, द्वाराहाट के मिशन हाई स्कूल 1880, मिशन पौडी़ से टिहरी ज्यादा पीछे नहीं था. परिणाम स्वरूप 1901 की जनगणना में कुल दो लाख 68 हजार की आबादी में 6020 व्यक्ति साक्षर से अधिक पढना लिखना जानते थे.
(King Kirti Shah Tehri Dynasty)
नागरिक प्रशासन को आधुनिक बनाने की दृष्टि से कीर्ति शाह ने ट्रेजरी, जेल, पुलिस, पीडब्ल्यूडी तथा जंगलात महकमे को ब्रिटिश शासन की भांति आधुनिक बनाया. टिहरी में चीफ कोर्ट की स्थापना की और अपील के अधिकार को र्स्थापित किया. कतिपय मामलों में न्याय मित्र भी सुलभ कराए, कानूनों का संहिता करण किया. रजिस्ट्रेशन ऑफ एसोसिएशन एक्ट लागू किया जिसके उल्लंघन पर ही सर्वप्रथम श्रीदेव सुमन को गिरफ्तार किया गया. चीफ कंजरवेटर के पद पर सदानंद गैरोला को संयुक्त प्रान्त से आमंत्रित किया. गैरोला के बाद हरिदत्त रतूड़ी को कन्जरवेटर वन नियुक्त कर वनों की पैमाइश और जंगलात के करों पर अत्यधिक ध्यान दिया. इस कारण कीर्ति शाह के समय में ही वन के विद्रोह भी हुए. कीर्ति शाह ने 1906 में सपरमैना सेना स्थापित की जिसमें पैदल सैनिक के साथ घुड़सवार सैनिक और हर टुकड़ी के साथ ही आधुनिक तोपखाना भी स्थापित किया.
कीर्ति शाह ने गंगोत्री- यमुनोत्री की यात्रा को सुलभ बनाने के लिए जहां पैदल मार्गों का रखरखाव बेहतर कर उन्हें घोड़े एवं पालकी के लिए सुगम बनाया पुल बनाने के साथ ही महत्वपूर्ण पड़ाव पर डाक बंगले स्थापित किए, यात्रा मार्ग पर टिहरी, उत्तकाशी, पुरौला में अस्पताल स्थापित करने के साथ ही दूरदराज के क्षेत्रों में भी अस्पतालों का विस्तार किया, उत्तरकाशी में कोढ़ी खाना भी खोला.
राज्य में योग्यता को बढावा देने के लिए कीर्ति शाह ने इस पार और उस पार के भेदभाव को मिटाया. अपने शासन में ब्रिटिश गढ़वाल के नागरिकों को भी अवसर प्रदान किए. महत्वपूर्ण पदों पर ब्रिटिश गढ़वाल के व्यक्ति भी आसीन हुए कंजरवेटर सदानंद गैरोला, हरिदत्त रतूड़ी इनमें मुख्य थे.
श्रीनगर से बेहद प्रेम होने के कारण कीर्ति शाह ने श्रीनगर में हाई स्कूल बोर्डिंग की स्थापना के लिए ₹13हजार का चंदा दिया. श्रीनगर के नजदीक बने रहने की नियत से कीर्तिनगर की स्थापना की. कीर्ति शाह को संस्कृत हिंदी, अंग्रेजी, फ्रैंच भाषाओं का बहुत अच्छा ज्ञान था उन्होंने अपने शासन और इतिहास को लिपिबद्ध करने के लिए टिहरी में एक छापाखाना स्थापित किया. साथ ही टाइपराइटर का प्रयोग प्रारंभ किया. अपने वजीर हरिदत्त रतूड़ी से गढ़वाल का प्रमाणिक इतिहास लिखवाया जिसे अंग्रेजी में छपवाना चाहते थे लेकिन उससे पहले ही कीर्ति शाह की मृत्यु हो गई.
(King Kirti Shah Tehri Dynasty)
ब्रिटिश शासन ने 1903 में कीर्ति शाह को सर की उपाधि प्रदान की. 1903 में ही इंग्लैंड के नक्शे के आधार पर टिहरी शहर का आधुनिक घंटाघर बनाया गया जिसमें समुचित प्रकाश की व्यवस्था भी की गई. इसके अतिरिक्त टिहरी दरबार व नगर में वैज्ञानिक पद्धति से वाटर वर्क्स को कीर्ति शाह ने स्वयं डिजाइन किया, नगर में म्युन्सिपलटी बोर्ड का गठन किया.
विभिन्न भाषाओं में सिद्धहस्त होने के साथ ही कीर्ति शाह की विज्ञान में गहरी रुचि थी वह राजभवन में पहुंची नई विद्युत व्यवस्था को खुद देखते थे. मैकेनिक और इंजीनियर स्कोर उसके डिजाइन और फॉल्ट के विषय में समय-समय पर खुद ही जानकारी देते थे. उनके द्वारा स्वयं सर्च लाइट और बायोस्कोप का निर्माण किया गया. वह विज्ञान के साथ ज्योतिष में भी बराबर रुचि रखते थे बड़ी दूरबीन से नक्षत्र और तारे देखना उनका शौक था. इसके लिए उन्होंने नक्षत्र वेधशाला देवप्रयाग को भी काफी सहायता प्रदान की.
हिंदू सनातन धर्मावलंबियों के अलावा क्रिश्चियन मुस्लिम भी टिहरी राज्य में सम्मान और बराबरी से रह रहे थे. राज्य को आधुनिक स्वरूप देने की इच्छा के साथ ही धर्म दर्शन और मुक्ति में कीर्ति शाह की गहरी रुचि थी जिस कारण स्वामी रामतीर्थ को उनके द्वारा राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया. भिलंगना घाटी में मालदयोल में स्वामी रामतीर्थ के लिए आश्रम बनाया गया और टिहरी राज्य के संरक्षण में ही स्वामी रामतीर्थ ने जापान की सर्व धर्म सभा में भाग लिया था. भिलंगना तट पर ही पांव फिसलने पर स्वामी जी ने जल समाधि ले ली थी.
बहुत छोटे से शासनकाल में कीर्ति शाह द्वार लोक कल्याणकारी राज्य की दिशा में जो कदम उठाए थे उन कदमों के कारण कीर्ति शाह की तुलना सम्राट अशोक के साथ की जाती है और उन्हें प्रजापालक कहा जाता रहा. तमाम ज्योतिषी उपचारों के बाद भी टिहरी रियासत के महाराजाओं के साथ जुड़ी अकाल मृत्यु के मिथ से कीर्ति शाह भी मुक्त नहीं हो पाए. 1913 में उनकी भी 39 वर्ष की अल्पायु में मृत्यु हो गई फिर 6 वर्षों तक शासन कीर्ति शाह की महारानी नैपाल्या के पास रहा.
(King Kirti Shah Tehri Dynasty)
हल्द्वानी में रहने वाले प्रमोद साह वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं. एक सजग और प्रखर वक्ता और लेखक के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफलता पाई है. वे काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
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महोदय,
लेख अत्यंत ही रोचक तथ्यपरक और जानकारी से परिपूर्ण है, इसके लिए साधुवाद।
लेकिन स्वामी रामतीर्थ का आश्रम मालीद्यूल(मालदेवल) में नहीं था, न ही मालदेवल भिलंगना घाटी में था।
स्वामी रामतीर्थ का आश्रम, जिसे कोठी कहते थे, सेमलासू में था, जो टिहरी से पास ही, भिलंगना के किनारे स्थित था। वहाँ एक सुंदर कोठी थी, जो आम के बगीचे से घिरी थी। डूबने से पहले अंतिम बार मैं उसे देखने गया था, जब उसके खिड़की दरवाजे आदि कीमती सामान आदि निकाल लिया गया था। लेकिन अफसोस, तब मेरे पास कैमरा न था !