झरिया में है नोकिया का टावर
-शेफाली फ्रॉस्ट
तुम आयी हो
लपटती ज़मीन की गुफाओं से निकल,
तुम आयी हो
दो दिन तीन रात के सफर के बाद,
तुम उतर के इधर देखती हो
फिर उधर
बिछा देती हो नए शहर की नालियों में
अपना बिस्तर,
सुखा देती हो
नए मकानों के वॉल पर अपना स्वैटर,
बिखर जाती है गेट पर उनके
तुम्हारी हैरत से खुली आँख,
बाँध लेती हो संथाली कन्धों में अपनी
बाज़ुओं का फैलाव
उतर रहे हैं चौबिस मंज़िली लिफ़्ट से
मालिक के सजनित कुत्ते,
बंधे बाजू, सधे पाँव,
चमकदार पट्टों में,
पुरानी कंपनियों का नया नाम,
नए नक्शों का कथानक,
साढ़े तैंतीस आरपीएम का रिकॉर्ड,
मिला देती हो फटी हुई बिवाई
बूटों से इनकी,
खोंस लेती हो स्वैटर में अपने
नयी मंज़िलों का आतंक
खेल रही हैं चौहद्दी में
किरकेट, बास्केट बॉल
मालिक की संवर्धित औलाद,
भरे हैं विरासती पेट उनके
पेट के सहारे तुम्हारे,
तुम चढ़ाती हो
थोड़ी सी भूख
दबी छाती के नाराज़ कोने में,
झरिया में खनकता है टावर !
बजती है गले में तुम्हारे
नोकिआ की धुन,
खींच लेता है ज़ुबान से लोरी
तुम्हारे अपने का तोतला प्रतिरोध,
दबा देती हो स्वेटर तले सर अपना,
बुझने लगती है
आँखों में तुम्हारे
दबे कोयले की आग
चार कुत्तों वाली मालकिन
दरवाज़ों के अंदर
खा रही है
तुम्हें, तुम्हारे ही हाथ,
तुम करती हो दरकार
थोड़ी सी सांस,
मुंडारी बोलता है न सुनता है
चबाते मुंह का दांत वाला कोना,
बाँध कर कपड़ा नाक पर
खाती जा रही है वो
बजती है एक बार फिर
नोकिया की धुन
खाए हुए कानों में तुम्हारे,
तुम कलपती हो उलगुलान
झरिया की पहाड़ी में जलता है टावर,
दबाती हो बटन क्रांति का,
दौड़ के बुलाती हो उतरती हुई लिफ़्ट,
भौंकता है साढ़े तैंतीस आरपीएम में
लिफ़्ट वाला कुत्ता,
पकड़ लेता है स्वैटर तुम्हारा
चमकीले पट्टों का कथानक,
अधचबे नक्शों का आतंक
गिरती हो गुज़री हुई
शहर की नालियों में तुम,
फाड़ देती हो
कालका मेल का टिकिट
पट्टे वाले हाथ से,
बिछ जाती हो
चुके साये में,
उठ कर गुज़रने को
कल सुबह,
एक बार फिर
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