विविध

जड़ी-बूटियों का गढ़ है उत्तराखंड

रामायण भारतीय जनमानस के दिमाग में गहरे बैठी है. बच्चे से लेकर बूढ़े तक अक्सर इसके उद्धरण देकर जीवन के गहरे सूत्रों को सिखाते हैं, जैसे रावण का नहीं टिका तेरा घंमड कितने दिन टिकेगा. सबसे लोकप्रिय चरित्र हनुमान जी जब लक्ष्मण जी को मेघनाथ लगभग मार देता है तो सुषैण वैध को लंका से मय उनके घर उठा लाते हैं और सुषैण वैध लक्ष्मण जी की नाड़ी देखकर बताते हैं कि इनका बचना नामुमकिन है लेकिन यदि कोई संजीवनी बूटी ले आए तो शर्तिया ठीक हो जाएंगे. परंतु वह बूटी एक जगह मिलेगी और वह जगह है उत्तराखंड.

प्राचीन काल से ही उत्तराखंड जड़ी-बूटियों का गढ़ रहा है जो आदमी की बीमारियों में रामबाण औषधि का काम करती रही हैं. कई बार पहाड़ के बुजुर्ग ऐसे ही किस्से सुनाते हैं फलां आदमी दिल्ली गया था डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा अब कुछ नहीं हो सकता हैं फिर पधान ज्यू ने जड़ी पीस कर दी तो अगले ही दिन से दौडऩे लग गया था. पहाड़ों के परिवेश में की जाने वाली ऐसी आम बातें गुदगुदी मचा देती हैं.

निर्गुन्डी और हरसिंगार के पत्तों की चटनी, जिसको पहाड़ी लोग गठिया रोग का उपचार मानते हैं, से कइयों को काफी राहत मिली है. जटामांसी, वजृदंती, बाम्ही, अश्वगंधा, हिसालू, पिपली आदि आदि. किल्मोड़ा का प्रयोग शुगर टाइफाइड चर्मरोग उल्टी वगैरह में होता है. वनककड़ी,  मंजीठ, मरोड़फली, सर्पगंधा, सतावर, मुलैठी, सिपांलकाटा, इन्द्रायन नामों की फेरहिस्त लंबी है.

पहाड़ों की जड़ी-बूटियों ने घर-घर में वैद-हकीम भी पैदा कर दिए हैं जैसे कोई गिर जाए और गुम चोट लग जाए तो वहां पर हल्का पानी डालकर बिच्छू घास से पांच सात बार मार दो चोट की वजह से शुरू में घायल को पता नहीं चलता है, जैसे ही हल्की सी झनझनाहट हूई तो दर्द गायब. बिच्छू घास को सिसूण भी कहते हैं, वैसे अगर किसी को ये गलती से भी लग जाए तो वो खुजली व दर्द से कराह उठता है. ऐसे ही घर घर में महिला वैद भी मिल जाती हैं, यदि किसी को पेट काटने की दिक्कत है तो दाल में गंदनारायण का छौंका लगा दो समस्या समाप्त. दाल पीने वाला सोचता रह जाता है कि धन्यवाद किस चीज का करूँ पेट की राहत का या लाजवाब स्वाद का. ऐसे ही सैहुण की पत्तियों का सूजन व बवासीर में लेपन कर के लाभ उठाया जाता है.

उत्तराखंड के पहाड़ों ने आदिकाल से ही अपनी मधुर जलवायु हरे-भरे जंगलों ऊंची चोटियों नदियों व हिमप्रपातों से आकर्षित किया है. लेकिन जब लोग यहां आये और जड़ी-बूटियों की विविधता व अचूकता देखी तब उन्हें मानना पड़ा कि उत्तराखंड का सच्चा खजाना तो यही दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ हैं.

हल्द्वानी के रहने वाले नरेन्द्र कार्की हाल-फिलहाल दिल्ली में रहते हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

View Comments

Recent Posts

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

4 days ago

बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान…

5 days ago

शकटाल का प्रतिशोध

पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र…

6 days ago

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

1 month ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

1 month ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

1 month ago