हैडलाइन्स

मैं पहाड़ी हूं लेकिन गैरसैंण राजधानी का समर्थक नहीं

मैं पहाड़ी हूं बेरीनाग के बिनवा की तरह जिसने कुछ दिन पहले बेरोजगारी के कारण नुवान खाकर जान दे दी. ग्रेजुएशन करने के बाद भी मामूली रोजगार के लिए भटक रहा था.

मैं पहाड़ी हूं पुरानाथल के किसान सुरदा की तरह जिसने दो साल पहले कर्ज में डूबकर प्राण त्यागे. पहाड़ में खेती घाटे का सबसे बड़ा सौदा है.

मैं पहाड़ी हूं पिरदा की तरह जिसने अपने बेटे को दर्जी बनाया. पहाड़ में शिक्षा की हालत खस्ता है. गरीब बच्चों को पढ़ा नहीं सकते.

मैं पहाड़ी हूं खिमवा की तरह जिसकी ईजा पथरी का इलाज न मिलने के कारण मर गई. अस्पतालों का हाल बेहाल है.

मैं पहाड़ी हूं धनवा की तरह जिसके बाबू कच्ची पीकर मरे. पहाड़ में शराब ने न जाने कितने बच्चों को अनाथ किया है.

मैं पहाड़ी हूं भगवती आमा की तरह जो जानवरों के लिए पत्ते जमा करते पेड़ से गिर गईं. अस्पताल लाते वक्त डोली से भी गिरी और मर गई. पहाड़ में सड़कों से गांव आज भी मीलों दूर हैं.

पहाड़ की पीढ़ा के इतने उदाहरणों को छोड़कर गैरसैंण राजधानी मेरी प्राथमिकता में कैसे हो सकती है? क्या देहरादून से सत्ता चला रहे लोगों की मानसिकता गैरसैंण पहुचकर बदल जाएगी? यदि ऐसा होता तो अलग राज्य बनने के बाद ही पहाड़ की तस्वीर बदल जाती. अलग राज्य बनने के बाद युवाओं को रोजगार के लिए खुदकुशी नहीं करनी पड़ती. किसान कर्ज के कारण न मरता. गरीब का बेटा भी एमबीबीएस कर रहा होता. ईलाज के अभाव में ईजा पथरी से न मरती. शराब पीकर मौतों का सिलसिला रुक चुका होता.

दिल्ली, देहरादून के बौद्धिक गलियारों से निकलकर गैरसैंण के लिए चिल्ला रहे लोगों को अपने अगल-बगल देखना चाहिए कि उनके साथ कितने बिनवा, सुरदा, पिरदा, खिमवा, धनवा और भगवती हैं. मुझे उम्मीद ही नहीं भरोसा है इस बार इनके साथ कोई नहीं आएगा.

क्योंकि बिनवा के गांव के युवाओं को रोजगार चाहिए. गैरसैंण नहीं. सुरदा के गांव में लोगों को खेत खा रहे जंगली जानवरों से निजात चाहिए. गैरसैंण नहीं. पिरदा के गांव में बच्चों को अच्छी शिक्षा चाहिए. गैरसैंण नहीं. खिमवा के गांव में लोगों को अस्पताल चाहिए. गैरसैंण नहीं. धनवा को शराब मुक्त गांव चाहिए. गैरसैंण नहीं. भगवती के गांव को सड़क चाहिए. गैरसैंण नहीं. 

पहाड़ियों को गैरसैंण में दिल्ली से संचालित होने वाली सरकार नहीं चाहिए. देहरादून क्या दिल्ली राजधानी बना दो लेकिन मुख्यमंत्री भूगोल से नहीं दिल से पहाड़ी हो. जो बिनवा, सुरदा, पिरदा, खिमवा, धनवा और भगवती का दर्द समझता हो. दिन-रात काम में खट रहे कर्मचारियों का वेतन समय से देने की औकात रखे. आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर खड़े इस राज्य को बचा ले.

यह काम राजधानी बदलने या सत्ता बदलने से नहीं होंगे. क्योंकि प्रतीकों से दशा नहीं बदलती. ये काम नीतियां बदलने से होंगे. इसलिए गैरसैंण के लिए आंदोलन चलाकर अपनी आग ठंडी कर रहे लोगों को सोचना चाहिए कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की जनता ने उन्हें क्यों नकारा? हरीश रावत ने गैरसैंण आंदोलन एक दौरे में कैसे झटक लिया? इस पर भी सोचने की आवश्यकता है.

राजीव पांडे की फेसबुक वाल से, राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, कुमाऊं के सम्पादक  हैं.

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Sudhir Kumar

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