कथा

उत्तराखण्ड की लोककथा : गाय, बछड़ा और बाघ

एक गांव में गाय अपने बछड़े के साथ रहती थी. बछड़े को घर छोड़ गाय रोज हरी घास चरने जंगल जाया करती थी जिससे बछड़े को उसका दूध मिलता रहे. (Folklore of Uttarakhand)

बछड़े को और ज्यादा पौष्टिक दूध पिलाने की इच्छा गाय को बहुत दूर तक जंगलों में चरने की प्रेरणा देती. चरते-चरते गाय एक दिन जंगल में कुछ ज्यादा ही दूर निकल गयी. उसे ख्याल ही नहीं रहा कि कब वह एक बाघ के इलाके तक पहुंच गयी. हष्ट-पुष्ट गाय पर बाघ की नजर पड़ी वह उसका शिकार करने के इरादे से आगे बढ़ा. अपने सामने बाघ को देख गाय भय से थरथर कांपने लगी. वह बाघ से बोली— दाज्यू, घर पर मेरा बछड़ा इंतजार कर रहा है. उसने सुबह से दूध भी नहीं पिया है. आज मुझे जाने दो, मैं वादा करती हूं उसे दूध पिलाने के बाद वापस यहां आऊंगी तब तुम मुझे खा लेना.

गाय की बात सुनकर बाघ हंसने लगा. वह बोला— मुझे बेवकूफ समझ रखा है क्या? जो एक बार गया वह भला मेरा भोजन बनने के लिये वापस क्यों आने लगा. तुम सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए मुझे झांसा दे रही हो. मुझे तो जोरों की भूख लगी है, मैं तुम्हें खाकर अपनी भूख अभी मिटाना चाहता हूं.

गाय ने भूखे बछड़े की दुहाई दी. पर बाघ अपने इरादे से नहीं डिगा. गाय के लगातार मिन्नत करने के बाद आखिर बाघ का मन पसीज गया और उसने गाय को जाने दिया. उसने गाय को धमकी भी दी कि ‘अगर तू वापस न आयी तो तेरे घर आकर तुझे और तेरे बछड़े दोनों को चबा जाऊँगा.

गाय ने राहत की सांस ली और घर की तरफ चलने लगी. ज्यों-ज्यों घर के पास पहुँचती जाती बाघ को दिये वचन का ख्याल उसे उदास करता जा रहा था. जब गाय घर पहुंची तो बछड़ा मां को देखकर खुश हुआ और दूध पीकर भूख मिटने लगा. गाय उसे प्यार से चाटती जाती. उसकी उदासी बछड़े से छिपी न रह सकी. बछड़े ने मां से उसकी उदासी का कारण पूछा. गाय ने उसे बाघ वाली घटना बता दी.

बछड़े ने पूरी बात ध्यान से सुनी और कुछ देर सोचने के बाद बोला— मां इसमें उदास क्यूं होना हुआ, कल मुझे भी ले चलना मैं बाघ को मामा मन लूँगा और उन्हें समझा दूंगा कि किसी और को अपना भोजन बना लें, मेरी मां को नहीं.

गाय ने प्यार से बाघ को बताया कि इन खूंखार जंगली जानवरों में मोह-माया नहीं होती. लेकिन बछड़ा नहीं माना. गाय के लाख मना करने के बाद भी जब बछड़े ने साथ चलने की जिद नहीं छोड़ी तो गाय ने साथ ले चलने को कहा.

दूसरे दिन गाय बछड़े को साथ लेकर जंगल के उस तरफ चल दी जहां कल उसे बाघ मिला था. थोड़ी देर में दोनों बाघ के पास पहुंच गये. गाय को खुद से ज्यादा अपने बछड़े के मारे जाने की चिंता सता रही थी. गायने बाघ से कहा— बाघ दाज्यू! मैंने अपना वादा पूरा किया है अब आप मुझे खा सकते हो लेकिन मेरे बछड़े को वापस जाने देना.

बछड़ा बोला— नहीं मामा आप पहले मुझे खालो.

गाय ने बछड़े को डांटकर चुप कराया और बाघ से कहा— नहीं-नहीं आप कहाँ इस बच्चे की बात पर ध्यान देते हो. मुझे खा लो और इसे जाने दो.

नहीं-नहीं कहता बछड़ा बाघ के सामने खड़ा होकर खुद को खाने की गुहार लगाने लगा.

ये देखकर बाघ का मन पसीज गया. वह हंसते हुये बछड़े से बोला कि न मैं तुझे खाऊँगा न ही तेरी मां को. जो अपने वचन पर अपनी जान की परवाह न करते हुये वापस मेरे पास आयी है उसको मैं क्या हरा पाऊंगा. फिर दूसरी तरफ तू है जो मां के बदले अपनी जान देने के लिये तैयार है. मुझे गाय को खाना होता तो मैं कल ही खा लेता . मैं तो बस उसकी परीक्षा ले रहा था कि गाय अपना वचन निभाती है या नहीं.

बाघ ने बछड़े को भांजा बुलाकर बहुत प्यार किया. उसके बाद वह उन दोनों को घर तक छोड़ने भी गया.

Support Kafal Tree

.

बाघिन को मारने वाले खकरमुन नाम के बकरे की कुमाऊनी लोककथा

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

View Comments

Recent Posts

बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान…

45 minutes ago

शकटाल का प्रतिशोध

पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र…

24 hours ago

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

1 month ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

1 month ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

1 month ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

1 month ago