परम्परा

सातों-आठों में आज घर आयेंगी गौरा दीदी

पहाड़ में आज उत्सव का माहौल है. सुबह से ही घर की साफ-सफाई लिपा-पोती का जोर है क्योंकि आज गौरा दीदी अपने मायके आने वाली हैं. लोक की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि यहां के आराध्य भी मानवीय रितों से जुड़े होते हैं. पहाड़ के लोग भी अपनी आराध्य देवी को अपनी दीदी मानकर आज अपने घर में उनका स्वागत करते हैं. आज का दिन सातों कहलाता है.
(Festival Uttarakhnd Sataon Aathon)

कुमाऊं में आज महिलाएं सातों का उपवास रखती हैं. महिलाओं और लड़कियों का समूह गौरा के स्वागत में गीत गाता हुआ खेतों की ओर जाता है. यह समूह गाता है-

कां रे  उपजी लौली गमरा. दीदी कां भी छैय उज्यालो.
डांडा -कांडा हय उपजी गमरा. दीदी खेत भी छे उज्यालो.
सौं वोट धन वोट ह्यां उपजी गमरा. दीदी का भी छ उज्यालो.
कां रे उपजी…
अटकन ह्यां उपजी गमरी दीदी. पटकन भी छ उज्यालो.
बालू बोट तिल बोट ह्यां उपजी गमरा. दीदी पटकन भी छे उज्यालो.
खेत ह्यों उपजी गमरा. दीदी भीतर भी ह्यों उज्यालो.
कां रे उपजी…

प्रो. मृगेश पाण्डे

खेतों में पांच प्रकार के पौधों (सौं, धान, मक्का, धधूरी और पाती) से मां पार्वती यानी गौरा दीदी की आकृति बनाई जाती है. निगाल की डलिया में थोड़ी मिट्टी डालकर इस आकृति को स्थापित किया जाता है और गौरा दीदी का शृंगार किया जाता है. गौरा दीदी को वस्त्र पहनाये जाते हैं, पुष्प चढ़ाये जाते हैं और फल अर्पित किए जाते हैं. इस आकृति को ही गमरा कहते हैं. गमरा, मां पार्वती का ही एक रूप है.
(Festival Uttarakhnd Sataon Aathon)

महिलाओं और लड़कियों का यह समूह गमरा को अपने सिर पर रख गांव के किसी निश्चित घर में लाते हैं. इसी घर में गमरा की सामूहिक पूजा होती है. विवाहित महिलायें सातों के दिन बांह में में पीला धागा बांधती हैं इसे डोर कहा जाता है.         

आब होता है आनन्द और उत्सव का माहौल. गाँव के लोग मिलकर आंगन में खेल लगाते हैं और अनेक तरह के लोकगीत जैसे झोड़े, झुमटा, चांचरी आदि गाते हैं. महिलाएं और पुरुष गोल घेरे में एक दूसरे का हाथ पकड़कर नाचते-गाते हुए इस उत्सव का आनंद उठाते हैं. उत्सव का यह माहौल देर रात तक चलता है.
(Festival Uttarakhnd Sataon Aathon)

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