फोटो : मनु डफाली
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जिसे हम जेएनयू के नाम से जानते हैं. इस यूनिवर्सिटी को कुछ लोगों ने जान-बूझकर देशद्रोहियों का अड्डा और वामपंथ का किला नाम दिया है, ताकि इस यूनिवर्सिटी की खूबियों पर पानी फेर सकें. Equal Opportunities for Education
यहां फीस बढोतरी के विरोध में दमदार आंदोलन छात्र चला रहे हैं. प्रशासन ने फौरी तौर पर इनकी कुछ बाते मानी हैं, लेकिन अभी भी कई मांगों को लेकर ये अड़े हैं. यहां गरीब परिवार से निकले छात्रों का मजाक बनाया जा रहा है, उनकी गरीबी का मखौल उड़ाया जा रहा है. लेकिन कोई उस दर्द को महसूस नहीं कर रहा है जिसकी जरूरत है. Equal Opportunities for Education
ऐसा ही एक छात्र आंदोलन उत्तराखंड में चल रहा है. यहां 16 आयुर्वेदिक कॉलेजों के छात्र फीस बढ़ोतरी को लेकर पिछले 47 दिनों से सड़क पर हैं. उनकी सालाना फीस 80 हजार से बढ़ाकर करीब 2 लाख 15 हजार कर दी गई है. छात्र अदालतों से भी अपने पक्ष में फैसला ले आए हैं पर इसके बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली है.
सरकार इनकी कोई सुध नहीं ले रही है, मीडिया कवरेज का कोई असर होता नहीं दिख रहा है. इस बीच कल मेट्रो में सफर के दौरान एक वाकया मेरे साथ घटा, इसे आप लोगों के साथ शेयर करना चाहता हूं ताकि शिक्षा के मह्त्व को आप समझ सकें, नौकरी के अलावा भी शिक्षा वो हथियार है, जो व्यक्ति का जीवन स्तर बदल सकती है.
कल रात मैं गुड़गांव से वापस मेट्रो में दिल्ली लौट रहा था. तो मेट्रो में ये भाई टकरा गए. दरअसल इन्हें सरायकाले खां जाना था और आईएनए मेट्रो स्टेशन से पिंक लाइन लेनी थी. मुझसे मदद मांगने पर पर मैंने इन्हें अपने साथ ले लिया.
इनसे बातचीत में पता चला कि ये पढ़े लिखे नहीं हैं और उम्र 20 साल है. ये राजस्थान के गंगानहर के पास के रहने वाले हैं. पढ़ाई न करने की वजह पूछने पर बताया कि पिता का देहांत हो गया था. मां ने जेसे तैसे करके पाला,
बड़े भाई को याद करते हुए बोले शायद वो जिंदा होता तो ज़रूर पढ़ लेते. 30 साल की उम्र में उनका बीमारी की वजह से निधन हो गया. उसके बाद हम दो भाई बचे खेतों में काम करते थे. लेकिन वहां इतना पैसा नहीं तो यहां चला आए. सैलरी पूछने पर बोले 8 से 10 हजार कमा लेता हूं. इतने कम पैसों में गुजारा करने के सवाल पर बोले कि कमरा ठेकेदार ने दिया है. एक कमरे में 10 लोग रहते हैं. मिलकर खाना बनाते हैं. 2000 रुपये करीब खर्च आता है. बाकी पैसे घर भेजते हैं.
पढ़ाई न कर पाने का मलाल उनकी बातों से साफ झलक रहा था. कुछ लोग जो जेएनयू और अन्य संस्थानों में फीस बढ़ोतरी पर तंज कसते हैं उन्हें जरा इन लोगों के बारे में पढ़ना चाहिए और मिलना चाहिए. सबको शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए ताकि इन्हें बुनियादी हक मिल सके और उनका जीवन स्तर उठ सके और ये बराबरी पर खड़े हुए.
शिक्षा के निजीकरण की जो चाल चली जा रही है उस ट्रेप को समझें. ये ही सोच रहा हूँ कि ऐसे न जाने कितने लोग हैं जो शिक्षा हासिल नहीं कर पाए हैं गरीबी की वजह से.
विविध विषयों पर लिखने वाले हेमराज सिंह चौहान पत्रकार हैं और अल्मोड़ा में रहते हैं.
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