दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है, वह सांस लेती है, महसूस करती है और कभी कभी अपने भीतर की आवाज भी सुनाती है. भारत में भी धरती को माँ कहा जाता है. हम उसे धरती माँ कहते हैं, जो सबको जन्म देती है और सबको अपने आंचल में समेट लेती है. पहाड़ों में भी लोग मानते हैं कि धरती सब सुनती है, इसलिए बुग्यालों में शोर नहीं करना चाहिए. वहां की शांति को पवित्र माना जाता है, जैसे प्रकृति स्वयं ध्यान में बैठी हो. इन मान्यताओं को लोग आस्था से जोड़ते हैं, लेकिन विज्ञान ने भी एक ऐसी बात खोजी है जो इन भावनाओं को एक नया अर्थ देती है.
वैज्ञानिकों ने पाया है कि धरती वास्तव में एक निश्चित अंतराल पर बहुत हल्की कंपन करती है. लगभग हर 26 सेकंड में एक सूक्ष्म कंपन दर्ज होती है. इसे सामान्य व्यक्ति महसूस नहीं कर सकता, क्योंकि यह बहुत कमजोर होती है. यह कंपन इतनी हल्की है कि केवल अत्यंत संवेदनशील यंत्र ही इसे पकड़ पाते हैं. पहली बार 1962 में अमेरिकी भूवैज्ञानिक Jack Oliver और उनकी टीम ने इस रहस्यमय कंपन को दर्ज किया. उन्होंने देखा कि यह कंपन नियमित रूप से दोहराई जा रही है, जैसे कोई धीमी लय में धड़कन चल रही हो.
इस रहस्य को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने वर्षों तक अध्ययन किया. बाद में शोध से संकेत मिले कि इसका स्रोत संभवतः Africa के पश्चिमी तट के पास, विशेषकर Gulf of Guinea क्षेत्र में हो सकता है. माना गया कि जब समुद्री लहरें महाद्वीपीय किनारों से टकराती हैं, तो वे समुद्र की तलहटी और धरती की परतों में सूक्ष्म कंपन उत्पन्न करती हैं. यही कंपन पृथ्वी के भीतर से होकर यात्रा करती है और नियमित अंतराल पर दर्ज होती है. कुछ वैज्ञानिक इसे माइक्रोसेज्म कहते हैं, जो समुद्री गतिविधियों और धरती की ठोस परत के बीच की पारस्परिक क्रिया का परिणाम है.
इन कंपन को मापने के लिए सेस्मोमीटर नामक उपकरणों का उपयोग किया जाता है. ये यंत्र जमीन के भीतर होने वाली अत्यंत सूक्ष्म हलचलों को भी रिकॉर्ड कर लेते हैं. दुनिया भर में कई भूकंपीय वेधशालाएं स्थापित हैं जो चौबीसों घंटे धरती की गतिविधियों पर नजर रखती हैं. जब ये उपकरण बार बार एक समान अंतराल पर कंपन दर्ज करते हैं, तो वैज्ञानिक कंप्यूटर विश्लेषण के माध्यम से उसके स्रोत और प्रकृति का अध्ययन करते हैं. इस प्रक्रिया में आंकड़ों की तुलना, स्थान निर्धारण और तरंगों की दिशा का विश्लेषण शामिल होता है.
यह जानकर आश्चर्य होता है कि जिन लोक मान्यताओं में धरती को जीवंत माना गया, विज्ञान ने भी अपने तरीके से उसकी लय को पहचाना. फर्क केवल इतना है कि जहां लोक कथाएं इसे भावनाओं और आस्था से जोड़ती हैं, वहीं विज्ञान इसे प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम बताता है. फिर भी यह तथ्य मन में एक गहरी अनुभूति जगाता है कि हमारी पृथ्वी स्थिर नहीं है, वह भीतर ही भीतर गतिशील है. धरती की यह 26 सेकंड वाली धड़कन हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति में बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम सीधे महसूस नहीं कर पाते, पर वह निरंतर घटित हो रहा होता है. पहाड़ों की शांति, बुग्यालों की निस्तब्धता और समुद्र की लहरों की ताल के पीछे एक अदृश्य लय काम कर रही है. शायद इसी कारण हमारे पूर्वजों ने धरती को माँ कहा और उसके प्रति सम्मान रखना सिखाया. विज्ञान और परंपरा दोनों अपने अपने ढंग से हमें यही बताते हैं कि जिस धरती पर हम खड़े हैं, वह केवल मिट्टी नहीं, बल्कि एक जीवंत और सक्रिय संसार है.
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