पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम से जुड़े असंख्य लोगों के मन को गहरे दुःख से भर दिया. सबके चहेते डेविड हॉकिन्स, जिन्हें यहाँ सभी स्नेह से डेविड भाई कहकर पुकारते थे, 78 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कह गए. उनके जाने से ऐसा लगता है जैसे कौसानी की शांत-वादियों का एक आत्मीय स्वर हमेशा के लिए थम गया हो.
(Obituary for David Hawkins Uttarakhand)

डेविड भाई का जन्म इंग्लैंड में हुआ था. वहीं उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और कुछ समय नौकरी भी की. लेकिन उनके भीतर बचपन से ही प्रकृति और पहाड़ों के प्रति एक गहरा आकर्षण था. वे अक्सर अकेले पहाड़ों की ओर निकल जाते थे, जैसे किसी अनजानी खोज में हों, जैसे प्रकृति से कोई संवाद करना चाहते हों.

जब उन्होंने गांधीवादी विचारों से प्रेरित सरला बहन और कौसानी के लक्ष्मी आश्रम के बारे में सुना, तो उनके मन में भारत आने की तीव्र इच्छा जाग उठी. सत्तर के दशक में उन्होंने एक अद्भुत यात्रा शुरू की. सड़क मार्ग से टर्की और अफ़ग़ानिस्तान होते हुए, खैबर दर्रे को पार कर वे भारत पहुँचे. उस लंबी यात्रा के दौरान उन्होंने जो तस्वीरें खींचीं, वे आज भी एक अनमोल धरोहर हैं, इतिहास और यात्राओं का जीवंत दस्तावेज़.

तब कुछ वर्ष उन्होंने कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में बिताए और फिर वापस इंग्लैंड लौट गए. लेकिन पहाड़ों की पुकार शायद उन्हें चैन से बैठने नहीं देती थी. अस्सी के दशक में वे फिर भारत लौटे, इस बार हमेशा के लिए. बाद में उन्हें भारत की नागरिकता भी मिल गई और वे पूरी तरह इस देश के नागरिक बनकर यहीं के हो गए.

कौसानी में रहकर उन्होंने न केवल अपना जीवन बिताया, बल्कि यहीं अपना परिवार भी बसाया. उनकी शादी यहीं आश्रम की हंसी साह से हुई और उनकी बेटी दीपिका हॉकिन्स की शुरुआती पढ़ाई भी कौसानी में ही हुई. आज दीपिका विदेशों में रॉक क्लाइंबिंग की इंस्ट्रक्टर हैं, लेकिन उनके जीवन की जड़ें इसी पहाड़ की मिट्टी में हैं.

भूगोल के विद्यार्थी होने के कारण डेविड भाई को प्रकृति, पर्यावरण और पहाड़ों के बदलते स्वरूप का गहरा ज्ञान था. वे केवल प्रकृति के दर्शक नहीं थे, बल्कि उसके सजग प्रहरी भी थे. वर्षों तक उन्होंने कौसानी क्षेत्र में वर्षा, बर्फबारी और तापमान का नियमित और सटीक लेखा-जोखा रखा. उनके पास दशकों का ऐसा पर्यावरणीय डेटा मौजूद है, जो पहाड़ों के बदलते स्वरूप को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है.
(Obituary for David Hawkins Uttarakhand)

कुछ वर्ष पहले की एक छोटी-सी घटना आज भी याद आती है. एक दिन उन्होंने मुझे पिंडारी ग्लेशियर की अस्सी के दशक की कुछ पुरानी तस्वीरें दिखाईं. उन तस्वीरों में ग्लेशियर बहुत नीचे तक फैला हुआ दिखाई दे रहा था. तब मैंने उन्हें वर्तमान समय की पिंडारी ग्लेशियर की तस्वीरें दिखाईं. जब उन्होंने दोनों तस्वीरों की तुलना की, तो उनके चेहरे पर गहरी उदासी उतर आई. वे कुछ देर चुप रहे और फिर धीमी आवाज़ में बोले, “हमारा पर्यावरण बहुत तेजी से नष्ट हो रहा है.” उस क्षण उनकी आँखों में पहाड़ों के भविष्य को लेकर गहरी चिंता साफ दिखाई दे रही थी.

लक्ष्मी आश्रम के लिए डेविड भाई एक मजबूत स्तंभ की तरह रहे. आश्रम के कार्यालय और हिसाब-किताब की जिम्मेदारी उन्होंने अत्यंत ईमानदारी और अनुशासन के साथ निभाई. उनकी कार्यशैली में वही सादगी और व्यवस्थितता झलकती थी, जो सरला बहन के व्यक्तित्व की पहचान रही. वे खादी के सामान को जीप में लेकर दन्या और आसपास के क्षेत्रों तक पहुँचाया करते थे. यह उनके लिए केवल एक काम नहीं, बल्कि गांधीवादी विचारों को जीवन में उतारने का एक तरीका था.

उन्होंने सरला बहन की जीवनी का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी किया, जिससे उनके विचारों और कार्यों को देश-विदेश तक पहुँचाने में मदद मिली. राधा दीदी के साथ मिलकर उन्होंने लक्ष्मी आश्रम के संचालन में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी दिनचर्या अत्यंत अनुशासित थी. प्रतिदिन समय पर कार्यालय पहुँचना, आश्रम की छात्राओं को पढ़ाना और शाम को प्रार्थना में शामिल होना—यह सब उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था. पिछले कुछ समय से उम्र के कारण उनकी चाल थोड़ी धीमी हो गई थी, लेकिन अपने कामों के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ.

डेविड भाई के पास अपने जीवन की यात्राओं, पहाड़ों और पर्यावरण से जुड़े अनुभवों का एक बड़ा खज़ाना था. उनके यात्रा संस्मरण और पर्यावरण से जुड़े नोट्स अत्यंत ज्ञानवर्धक हैं. अफसोस है कि उनका पूरा उपयोग अभी तक नहीं हो पाया.

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो लगता है जैसे पहाड़ों ने अपना एक सच्चा मित्र खो दिया है. कौसानी की हवा, लक्ष्मी आश्रम का आँगन और शाम की प्रार्थना, इन सबमें शायद अब भी उनकी सादगी और शांत मुस्कान की स्मृति हमेशा जीवित रहेगी.

डेविड भाई चले गए, लेकिन पहाड़ों के प्रति उनका प्रेम, उनकी सादगी और उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा.

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…

2 days ago

चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार

चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये…

2 days ago

मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब

2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब 'मेरी यादों का पहाड़' छापकर सराहनीय…

2 days ago

पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे

नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी…

6 days ago

‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है

देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत…

6 days ago

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

1 week ago