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कॉमनसेंस बोले तो दुर्लभ विवेक

इधर जहाँ-तहाँ क़ानून पेले जा रहे हैं जिससे जन-जन में बड़ा कन्फ्यूजन हो गया है. PM का मानें, HM का, CJ का या CM का? ऐसी अवस्था में कॉमनसेंस का होना बहुत ज़रूरी है, वही माना जाए जो कॉमनसेंस से ठीक लगता हो. पढ़े-लिखे तो हर गली में हैं पर कॉमनसेंस वालों का टोटा 73 साल बाद भी है. Commonsense Satire by Umesh Tewari Vishwas

PM ने कहा ताली बजाना बालकनी में, थाली लिए आप उतर आए गली में. जलूस निकाल कर दिनभर के क्वारेन्टाइन का आइंस्टाइन कर दिया. आर्डर था मेल-मुलाकात, ख़रीद-फ़रोख़्त में दूर-दूर रहें. सब्ज़ी के ठेले वाले को आपने गले तो नहीं लगाया पर अठन्नी के लिए मोलभाव करते थूक के इतने फव्वारे छोड़े कि सूखती सब्ज़ियों में हरियाली आ गई. टमाटर छाँटते आपके हाथों ने हर किसान के जैसे गाल थपथपा दिए. कमीज़ में छुपी आपकी तौंद ने ठेले का कोना-कोना रगड़ मारा. अगर कोरोना वहाँ छुपा होगा तो अब आपके कपड़ों पर विराजमान होगा. दो रुपल्ली का डिस्काउंट लेकर जो तीर आपने मारा वो कॉमनसेंस की अर्थी निकालने को काफ़ी था…

तालाबंदी के बीच सरकार में कोई कॉमनसेंस वाला रहा होगा जिसने 6 घंटे दुकानें खुलवाने का आर्डर करवाया. मगर उसके भिंज्यू ने 4 पहिया सवारी को चलने की अनुमति नहीं दी. अड़ गए होंगे, “ना ! कार नहीं चलेगी, उसमें 4-5 सीटें होती हैं.” भिना ! टायरों को घर पर रहना है या आदमी को ? चार पहियों पर शर्मा जी अकेले जाकर बिल्डिंग वालों का सामान एक चक्कर में ला सकते थे, अब तक स्कूटर से मॉल के 10 फेरे लगा चुके हैं बिचारे…

मित्रो सोशल डिस्टेंसिङ्ग की आवश्यकता है, कॉमनसेंस डिस्टेंसिङ्ग की थोड़ी ना. और इस्तेमाल करना है तो पूरा करिए बचा हुआ क्या कुम्भ में काम लाएंगे ?

आप ये मत समझाइए कि यू पी पुलिस के शानदार अतीत का बदायूं पुलिस अपवाद है. आज वो पैदलों को मुर्ग़ा बना रही है, जिनकी वो मुर्गी बनाती आई है. पुलिस का कॉमनसेंस कहता है ‘लक्ष्मण रेखा पार कर आया है, दंड तो मिलना ही चाहिए’, मिलना चाइये कि नइँ ? अरे भाई, दंडकारण्य में उसकी कोई कुटिया हो, तो रेखा होगी ना ? कुटिया भी हवाई, रेखा भी हवाई, बस बनवास असली ! Commonsense Satire by Umesh Tewari Vishwas

कॉमनसेंस हो तो बात करें. प्रोमोशन इच्छाधारी अच्छे काम करने को निकलते हैं तो कैमरा साथ ले लेते हैं या अपने चमचे टी वी चैनल को फ़ोन कर देते हैं. बदायूँ के डंडाधारी पुलिसमैन ने वीडियो बनाने वाले को धर क्यों न लिया ? वो मौक़ा ए वारदात पर दवाई लेने आया था क्या ? धर काहे लें जनाब, बहादुरी का रिकार्डिंग चैये कि नहीं. ग़लती उसके कॉमनसेंस की है जो पिछले दिनों से यू पी में ख़राब चल्लिया है.

अगर आपको जानने की खुजली है कि सर्वश्री 144, CAA, NRC, NPR, IPC, CRPC कैसे कनून हैं तो कॉमनसेंस युक्त ठेले वाले से पूछ लीजिये. और अगर क़ानून बनाने वाले ऐं वैं ई जानना चाहें तो अपने कॉमनसेंस का इस्तेमाल करें, अगर हो. Commonsense Satire by Umesh Tewari Vishwas

उमेश तिवारी ‘विश्वास

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हल्द्वानी में रहने वाले उमेश तिवारी ‘विश्वास‘ स्वतन्त्र पत्रकार एवं लेखक हैं. नैनीताल की रंगमंच परम्परा का अभिन्न हिस्सा रहे उमेश तिवारी ‘विश्वास’ की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘थियेटर इन नैनीताल’ हाल ही में प्रकाशित हुई है.

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Girish Lohani

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